आनंद मोहन का बड़ा बयान: ‘मैं नीतीश कुमार का चमचा नहीं, बड़ा भाई हूं’, भरत तिवारी एनकाउंटर पर भी उठाए सवाल

आनंद मोहन

बिहार की राजनीति में अपने बेबाक बयानों के लिए चर्चित पूर्व सांसद आनंद मोहन ने एक बार फिर कई अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी है।

बिहार की राजनीति में अपने बेबाक बयानों के लिए चर्चित पूर्व सांसद आनंद मोहन ने एक बार फिर कई अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी है। नालंदा जिले के मोरा तालाब में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ अपने रिश्ते, पार्टी कार्यकर्ताओं की स्थिति, सवर्ण समाज की राजनीतिक भागीदारी और हाल के चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामले पर विस्तार से टिप्पणी की।

अपने संबोधन में आनंद मोहन ने स्पष्ट किया कि उनका मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ संबंध राजनीतिक स्वार्थ का नहीं, बल्कि पुराने संघर्ष और वैचारिक जुड़ाव का है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में न्याय की प्रक्रिया अदालत के माध्यम से ही पूरी होनी चाहिए और किसी भी मामले में अंतिम फैसला पुलिस नहीं, बल्कि न्यायपालिका को करना चाहिए।

‘मैं नीतीश कुमार का चमचा नहीं, उनका भाई हूं’

अपने भाषण में आनंद मोहन ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ अपने रिश्ते को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं का राजनीतिक जीवन 1974 के जेपी आंदोलन से शुरू हुआ और उसी आंदोलन ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में पहचान दिलाई।

उन्होंने कहा कि कुछ लोग उन्हें मुख्यमंत्री का समर्थक या ‘चमचा’ कहकर संबोधित करते हैं, लेकिन यह धारणा गलत है। उनके अनुसार, नीतीश कुमार उनके बड़े भाई की तरह हैं और दोनों के बीच संबंध वर्षों पुराने संघर्ष और राजनीतिक यात्रा पर आधारित हैं।

आनंद मोहन ने कहा कि भाईचारे का रिश्ता किसी राजनीतिक लाभ से कहीं बड़ा होता है और उनका समर्थन किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और जनहित के मुद्दों को लेकर है।

‘पुत्र और पत्नी मोह’ के आरोपों का दिया जवाब

हाल के दिनों में उन पर लगाए जा रहे ‘पुत्र मोह’ और ‘पत्नी मोह’ के आरोपों का भी आनंद मोहन ने जवाब दिया।

उन्होंने कहा कि यदि उनका उद्देश्य केवल अपने परिवार के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करना होता, तो उन्हें सक्रिय राजनीति में संघर्ष करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा कि उनके परिवार में पहले से ही उनकी पत्नी सांसद हैं और उनका बेटा विधायक है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी राजनीतिक सक्रियता किसी पारिवारिक महत्वाकांक्षा के लिए नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा और जनता के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए है।

कार्यकर्ताओं की उपेक्षा पर जताई नाराजगी

आनंद मोहन ने राजनीतिक दलों में कार्यकर्ताओं की स्थिति पर भी चिंता जताई।

उन्होंने कहा कि वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाने, आंदोलनों में भाग लेने और लाठियां खाने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को अक्सर उचित सम्मान और अवसर नहीं मिलता। इसके विपरीत, पर्दे के पीछे रहकर सत्ता का लाभ उठाने वाले कुछ लोग राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर भारी आर्थिक संपत्ति खड़ी कर लेते हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोगों ने बिहार से लेकर दिल्ली, मुंबई, सिंगापुर और दुबई तक आर्थिक साम्राज्य स्थापित कर लिया, जबकि जमीनी कार्यकर्ता आज भी संघर्ष कर रहे हैं।

हालांकि, उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में किसी व्यक्ति या संस्था का नाम नहीं लिया।

मगध के इतिहास का किया उल्लेख

अपने संबोधन के दौरान आनंद मोहन ने इतिहास का भी उल्लेख किया।

उन्होंने मगध के इतिहास में राजा बृहद्रथ और पुष्यमित्र शुंग की घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास स्वयं को दोहराता है। उन्होंने संकेत दिया कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में भी सत्ता और नेतृत्व से जुड़े घटनाक्रमों को इतिहास के संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।

हालांकि उन्होंने अपने इस संदर्भ को किसी विशेष राजनीतिक घटना या व्यक्ति से सीधे नहीं जोड़ा।

सवर्ण समाज की राजनीतिक भागीदारी पर टिप्पणी

आनंद मोहन ने सवर्ण समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी का मुद्दा भी उठाया।

उन्होंने कहा कि समाज के सभी वर्गों को समान राजनीतिक अवसर मिलना चाहिए और किसी भी समुदाय की भागीदारी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

राजपूत समाज का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राजपूत गद्दार नहीं होता, बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाला बागी होता है। उनके अनुसार, समाज के हर वर्ग की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है और अन्याय को जातीय आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।

विभागों के आवंटन पर भी उठाए सवाल

अपने भाषण में आनंद मोहन ने सरकार में विभागों के वितरण को लेकर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि कुछ विशेष विभाग ही बार-बार एक वर्ग या समूह के हिस्से में क्यों आते हैं। उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियंत्रण (PHED), खेल-कला, आपूर्ति और सहकारिता जैसे विभागों का उल्लेख करते हुए कहा कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में संतुलन और समान अवसर सुनिश्चित होना चाहिए।

भरत तिवारी एनकाउंटर पर कही यह बात

कार्यक्रम के दौरान आनंद मोहन ने चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामले पर भी अपनी राय रखी।

उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस का दायित्व अपराधी को गिरफ्तार कर अदालत के सामने पेश करना होता है। दोष तय करना और सजा सुनाना न्यायपालिका का अधिकार है।

उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति आत्मसमर्पण करता है या न्यायिक हिरासत में आता है, तो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य की होती है। ऐसे मामलों में पुलिस को कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करनी चाहिए।

आनंद मोहन ने सवाल उठाया कि यदि पुलिस ही सजा तय करने लगे, तो न्यायालयों की संवैधानिक भूमिका कमजोर पड़ जाएगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में कानून का शासन सर्वोपरि होना चाहिए।

मीडिया की भूमिका पर भी जताई चिंता

पूर्व सांसद ने मीडिया की भूमिका पर भी टिप्पणी की।

उन्होंने कहा कि कई बार मीडिया किसी व्यक्ति को अपराधी के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि किसी एनकाउंटर के बाद उसी व्यक्ति को अलग नजरिए से दिखाया जाता है। उनके अनुसार, किसी भी मामले में मीडिया को तथ्यों के आधार पर संतुलित और जिम्मेदार रिपोर्टिंग करनी चाहिए।

बिहार की राजनीति में बयान के मायने

आनंद मोहन का यह बयान ऐसे समय आया है जब बिहार की राजनीति में आगामी चुनावों को लेकर गतिविधियां तेज हो रही हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में जुटे हैं।

नीतीश कुमार के साथ अपने संबंधों को लेकर दिया गया उनका बयान, सवर्ण समाज की राजनीतिक भागीदारी की मांग, कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का मुद्दा और भरत तिवारी एनकाउंटर पर उठाए गए सवाल आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकते हैं।

हालांकि, उनके अधिकांश बयान राजनीतिक और वैचारिक टिप्पणी के रूप में सामने आए हैं। इन पर विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया आने के बाद ही इनके व्यापक राजनीतिक प्रभाव का स्पष्ट आकलन किया जा सकेगा।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

You may have missed