भोजपुर में 5 जुलाई को होगी बहुजन महापंचायत, सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों को लेकर उठेंगी 13 प्रमुख मांगें
बहुजन समाज के सम्मान, सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकारों और समान अवसरों के मुद्दों को लेकर आगामी 5 जुलाई को भोजपुर जिले के जगदीशपुर प्रखंड स्थित लाल बिहारी सिंह टोला हाई स्कूल मैदान में जिला स्तरीय बहुजन महापंचायत आयोजित की जाएगी।
पटना। बहुजन समाज के सम्मान, सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकारों और समान अवसरों के मुद्दों को लेकर आगामी 5 जुलाई को भोजपुर जिले के जगदीशपुर प्रखंड स्थित लाल बिहारी सिंह टोला हाई स्कूल मैदान में जिला स्तरीय बहुजन महापंचायत आयोजित की जाएगी। इसकी घोषणा बहुजन महापंचायत आयोजन समिति ने पटना स्थित अंबेडकर शोध संस्थान में आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान की।
समिति ने बताया कि इस महापंचायत का उद्देश्य बहुजन समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाकर उनके अधिकारों, सम्मान, स्वाभिमान और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा करना है। साथ ही सरकार के समक्ष विभिन्न सामाजिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक मांगों को मजबूती से रखना भी कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य होगा।
सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों पर रहेगा फोकस
प्रेस वार्ता में आयोजन समिति के सदस्यों ने कहा कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार और सम्मान प्रदान करता है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर आज भी समाज के कई वर्गों को जातिगत भेदभाव और सामाजिक पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है।
समिति का कहना था कि बहुजन समाज के लोग जब अपने अधिकारों, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, तब कई बार उन्हें जातिसूचक टिप्पणियों और अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों पर समाज और सरकार दोनों को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
समिति के अनुसार महापंचायत का उद्देश्य किसी वर्ग के खिलाफ माहौल बनाना नहीं, बल्कि संविधान में निहित समानता, न्याय और बंधुत्व के मूल्यों को मजबूत करना है।
कई नेताओं के उदाहरण देकर उठाया मुद्दा
प्रेस वार्ता के दौरान आयोजन समिति ने कहा कि देश और बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय की आवाज उठाने वाले कई प्रमुख नेताओं को अलग-अलग समय पर जातिसूचक और अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा।
समिति ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर, बी.पी. मंडल, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और जीतन राम मांझी के अलावा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव, मुलायम सिंह यादव और मायावती का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय कई नेताओं के साथ इस प्रकार की घटनाएं सामने आई हैं।
समिति ने सामाजिक न्याय के प्रखर नेता जगदेव प्रसाद के संघर्ष और उनके योगदान का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि सामाजिक समानता और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए अनेक महापुरुषों ने लंबा संघर्ष किया है, जिसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्मान का मुद्दा भी उठा
प्रेस वार्ता में समिति ने भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने देश को ऐसा संविधान दिया, जो समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की भावना पर आधारित है। उनके विचारों और संविधान का सम्मान देश ही नहीं, दुनिया के कई हिस्सों में किया जाता है।
हालांकि समिति ने यह भी कहा कि समय-समय पर डॉ. आंबेडकर की प्रतिमाओं के साथ तोड़फोड़ और उनके अनुयायियों के साथ कथित अपमानजनक व्यवहार की घटनाएं सामने आती रही हैं। समिति के अनुसार ऐसी घटनाएं सामाजिक समरसता और संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं हैं।
सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा बनाए रखने की अपील
समिति ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारों का मतभेद स्वाभाविक है, लेकिन किसी भी व्यक्ति या समुदाय के खिलाफ जाति के आधार पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
प्रेस वार्ता में कहा गया कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों, राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों को अपनी भाषा और व्यवहार में संवैधानिक मूल्यों का पालन करना चाहिए, ताकि समाज में सौहार्द और समानता का वातावरण बना रहे।
सरकार के सामने रखीं 13 प्रमुख मांगें
बहुजन महापंचायत आयोजन समिति ने केंद्र और राज्य सरकार के समक्ष 13 प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें बहुजन समाज के महापुरुषों और समाज के लोगों के खिलाफ जातिसूचक एवं घृणास्पद टिप्पणियां करने वालों के विरुद्ध कड़ा कानून बनाने की मांग प्रमुख है।
इसके अलावा मॉब लिंचिंग पर प्रभावी रोक लगाने के लिए सख्त कानून, यूजीसी रेगुलेशन एक्ट-2026 को लागू करने, बिहार में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए निर्धारित 65 प्रतिशत आरक्षण को पूरी तरह लागू करने तथा सरकारी सेवाओं में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के रिक्त पदों को बैकलॉग भर्ती के माध्यम से भरने की मांग की गई है।
समिति ने एससी-एसटी के साथ ओबीसी वर्ग को भी पदोन्नति में आरक्षण का लाभ देने, सरकारी संस्थानों के निजीकरण पर रोक लगाने तथा सरकारी सहायता प्राप्त निजी संस्थानों और कंपनियों में भी आरक्षण लागू करने की मांग उठाई है।
इसके अतिरिक्त कॉलेजियम व्यवस्था के स्थान पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा आयोग के गठन, अंधविश्वास और अवैज्ञानिक मान्यताओं के प्रचार-प्रसार पर प्रभावी रोक, भारतीय सेना में जाति आधारित नाम वाले रेजिमेंटों के नाम बदलने पर विचार, अमीर दास आयोग की पुनर्बहाली तथा सभी जातियों के लिए समान भारतीय नाम अपनाने की दिशा में पहल करने जैसी मांगें भी समिति ने सरकार के सामने रखी हैं।
प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की अपील
आयोजन समिति ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से इन मांगों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने की अपील की है।
समिति का कहना है कि सामाजिक न्याय और समान अवसर केवल संवैधानिक प्रावधानों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
‘यह किसी एक जाति की नहीं, पूरे बहुजन समाज की महापंचायत’
प्रेस वार्ता के दौरान समिति ने उन दावों का भी खंडन किया, जिनमें इस आयोजन को किसी एक जाति विशेष का कार्यक्रम बताया जा रहा है। समिति ने स्पष्ट किया कि यह बहुजन समाज के सभी वर्गों की भागीदारी वाला कार्यक्रम है और इसमें विभिन्न समुदायों के लोग शामिल होंगे।
समिति के अनुसार यह किसी राजनीतिक दल या संगठन के बैनर तले आयोजित कार्यक्रम नहीं है। इसे भोजपुर जिले के बहुजन समाज के सामूहिक सहयोग से जिला स्तरीय सामाजिक कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया जा रहा है।
सामाजिक विमर्श का मंच बनने की उम्मीद
आयोजन समिति का मानना है कि 5 जुलाई को आयोजित होने वाली बहुजन महापंचायत केवल एक सभा नहीं होगी, बल्कि सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकारों, शिक्षा, रोजगार, आरक्षण और सामाजिक समानता जैसे विषयों पर व्यापक संवाद का मंच बनेगी।
अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि इस महापंचायत में कितनी भागीदारी होती है और समिति द्वारा उठाए गए मुद्दों तथा मांगों पर सरकार और अन्य संबंधित पक्षों की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
