भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर: क्या अपराध नियंत्रण का रास्ता कानून से होकर जाता है या बंदूक से?

भरत भूषण तिवारी

बिहार में भरत भूषण तिवारी की मौत के बाद एक बार फिर एनकाउंटर की राजनीति और उसकी वैधता पर बहस तेज हो गई है

बिहार में भरत भूषण तिवारी की मौत के बाद एक बार फिर एनकाउंटर की राजनीति और उसकी वैधता पर बहस तेज हो गई है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक लोग इस घटना पर अपनी-अपनी राय दे रहे हैं। कोई इसे गलत बता रहा है, कोई पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठा रहा है, तो कुछ लोग भरत तिवारी को समाजसेवी या शहीद बताने में जुटे हैं। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच एक बड़ा सवाल पीछे छूटता दिखाई दे रहा है—क्या किसी भी परिस्थिति में अपराध नियंत्रण के लिए एनकाउंटर एक स्वीकार्य तरीका हो सकता है?

यह सवाल सिर्फ भरत भूषण तिवारी के मामले तक सीमित नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था से जुड़ा है, जिसमें पुलिस, सरकार, अदालत और जनता सभी की भूमिका तय होती है।

भरत तिवारी की मौत और उठते सवाल

भरत भूषण तिवारी की मौत के बाद उनके गांव और शहर में लोगों का गुस्सा दिखाई दिया। प्रदर्शन हुए, पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठे और सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। लेकिन इन प्रतिक्रियाओं का बड़ा हिस्सा सिर्फ इस बात पर केंद्रित था कि भरत तिवारी के साथ गलत हुआ।

कम ही लोगों ने यह सवाल उठाया कि अगर किसी व्यक्ति के साथ एनकाउंटर गलत है, तो क्या सिद्धांत के तौर पर किसी भी व्यक्ति का एनकाउंटर सही माना जा सकता है?

यही वह बिंदु है जहां से बहस व्यक्तिगत घटना से निकलकर नीति और कानून के दायरे में प्रवेश करती है।

राजनीति में एनकाउंटर का समर्थन नया नहीं

देश में एनकाउंटर को लेकर बहस नई नहीं है। उत्तर प्रदेश में कई वर्षों से इसे अपराध नियंत्रण के एक तरीके के रूप में पेश किया जाता रहा है। खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में पुलिस एनकाउंटर और बुलडोजर कार्रवाई राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गए।

इससे पहले भी उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के दौर में एनकाउंटर नीति चर्चा में रही थी। हालांकि इसके समर्थक इसे अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई बताते हैं, जबकि विरोधियों का तर्क है कि यह कानून के शासन की भावना के खिलाफ है।

बिहार में लंबे समय तक ऐसी नीति खुलकर देखने को नहीं मिली। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने शुरुआती कार्यकाल में अपराध नियंत्रण के लिए कानूनी उपायों पर अधिक जोर दिया। स्पीडी ट्रायल, आर्म्स एक्ट के प्रभावी इस्तेमाल और बेहतर पुलिसिंग के जरिए अपराधियों पर कार्रवाई की गई।

उस दौर में बिहार पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी रहे अभयानंद जैसे अधिकारियों ने कानून के दायरे में रहकर अपराध नियंत्रण की रणनीति को आगे बढ़ाया।

कानून बनाम पुलिस का विवेक

एनकाउंटर पर सबसे बड़ा सवाल इसकी कानूनी वैधता को लेकर है। भारतीय कानून पुलिस को अपराधी घोषित करने या सजा देने का अधिकार नहीं देता। पुलिस का काम जांच करना, अपराधी को गिरफ्तार करना और अदालत के सामने पेश करना है।

सजा देना अदालत का अधिकार है।

यही वजह है कि हर एनकाउंटर के बाद पुलिस को यह साबित करना पड़ता है कि उसने आत्मरक्षा में गोली चलाई। कई मामलों में पुलिस की कहानी स्वीकार कर ली जाती है, जबकि कई बार जांच के दौरान सवाल खड़े हो जाते हैं।

अगर सरकारें एनकाउंटर को अपराध नियंत्रण का एक औपचारिक तरीका मानती हैं, तो क्या इसके लिए कानून बनाया जाना चाहिए? यह बहस वर्षों से चल रही है।

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कोई नीति विधायिका से पारित होकर कानून का रूप नहीं लेती, तब तक पुलिस को ऐसे मामलों में व्यापक विवेकाधिकार देना खतरनाक हो सकता है।

क्या पुलिस के पास बहुत ज्यादा ताकत आ जाती है?

एनकाउंटर नीति के विरोध में सबसे बड़ा तर्क यही दिया जाता है कि इससे पुलिस के पास अत्यधिक शक्ति आ जाती है।

अगर पुलिस यह तय करने लगे कि कौन अपराधी है और किसे गोली मारनी है, तो न्यायपालिका की भूमिका कमजोर पड़ सकती है। इसके अलावा यह आशंका भी बनी रहती है कि कहीं व्यक्तिगत दुश्मनी, राजनीतिक दबाव या अन्य कारणों से इस शक्ति का दुरुपयोग न होने लगे।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस, सरकार और अदालत की भूमिकाएं अलग-अलग तय की गई हैं। अगर इनमें से कोई एक संस्था दूसरे के अधिकार क्षेत्र में प्रवेश करने लगे तो व्यवस्था का संतुलन बिगड़ सकता है।

यही कारण है कि मानवाधिकार संगठनों और कई पूर्व न्यायाधीशों ने समय-समय पर एनकाउंटर संस्कृति पर चिंता जताई है।

जनता एनकाउंटर का समर्थन क्यों करती है?

इसके बावजूद यह भी सच है कि देश के एक बड़े वर्ग में एनकाउंटर के प्रति समर्थन दिखाई देता है।

इसकी सबसे बड़ी वजह न्याय व्यवस्था की धीमी गति है। कई मामलों में मुकदमे वर्षों तक चलते रहते हैं। पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने में लंबा समय लगता है। कई बार प्रभावशाली लोग कानूनी प्रक्रियाओं का फायदा उठाकर सजा से बच निकलते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में जनता का एक हिस्सा त्वरित न्याय की मांग करने लगता है और एनकाउंटर को उसी रूप में देखने लगता है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या त्वरित न्याय और न्यायपूर्ण न्याय एक ही चीज हैं?

अगर किसी निर्दोष व्यक्ति को अपराधी मानकर गोली मार दी जाए तो उसके अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? अगर पुलिस की कार्रवाई गलत साबित हो जाए तो क्या खोई हुई जिंदगी वापस लाई जा सकती है?

यही वजह है कि लोकतंत्र में कानून की प्रक्रिया को सर्वोच्च माना गया है, भले ही वह धीमी क्यों न हो।

बिहार में बदलता माहौल

पिछले कुछ वर्षों में बिहार में भी पुलिस कार्रवाई को लेकर नई चर्चाएं शुरू हुई हैं। अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग लगातार बढ़ी है। कई मामलों में पुलिस मुठभेड़ों और तथाकथित “हाफ एनकाउंटर” की खबरें भी सामने आई हैं।

समर्थकों का कहना है कि इससे अपराधियों में डर पैदा होता है। वहीं आलोचकों का तर्क है कि इससे कानून का शासन कमजोर होता है।

भरत भूषण तिवारी का मामला इसी बहस के केंद्र में आ गया है। अब सवाल सिर्फ एक व्यक्ति की मौत का नहीं है, बल्कि उस सोच का है जिसमें अपराध नियंत्रण के लिए पुलिस कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन तलाशा जा रहा है।

समाधान क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि अपराध नियंत्रण का स्थायी समाधान न्याय व्यवस्था को मजबूत करने में है। अदालतों में लंबित मामलों का तेजी से निपटारा, पुलिस सुधार, वैज्ञानिक जांच व्यवस्था और पारदर्शी न्याय प्रणाली ही अपराध पर प्रभावी नियंत्रण का रास्ता हो सकती है।

एनकाउंटर एक त्वरित समाधान की तरह दिखाई दे सकता है, लेकिन इसके साथ कई संवैधानिक और नैतिक प्रश्न जुड़े हुए हैं।

लोकतंत्र में किसी भी व्यवस्था की मजबूती इस बात से तय होती है कि वह सबसे कठिन परिस्थितियों में भी कानून के दायरे में रहकर काम करती है या नहीं।

भरत भूषण तिवारी के मामले में जांच क्या निष्कर्ष निकालती है, यह समय बताएगा। लेकिन यह घटना एक बार फिर हमें उस मूल प्रश्न के सामने खड़ा करती है—क्या अपराध से लड़ने के लिए कानून का रास्ता छोड़कर बंदूक का रास्ता अपनाया जाना चाहिए, या फिर न्याय व्यवस्था को इतना मजबूत बनाया जाए कि किसी एनकाउंटर की जरूरत ही न पड़े?

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

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