‘इक्कीस’ फिल्म: यह वॉर मूवी नहीं, बल्कि युद्ध के खिलाफ एक गहरी मानवीय कहानी है

इक्कीस फिल्म

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‘इक्कीस’ क्यों एक ज़रूरी फिल्म है

‘इक्कीस’ फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध की कहानी कहते हुए जिंगोइज्म से दूर एक संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण पेश करती है। पढ़िए पूरी समीक्षा।

आज के दौर में जब वॉर फिल्म का मतलब तेज़ बैकग्राउंड म्यूज़िक, सीना ठोकते डायलॉग, दुश्मन को रौंदता सुपरहीरो और आक्रामक राष्ट्रवाद मान लिया गया है, ऐसे समय में फिल्म ‘इक्कीस’ एक असहज करने वाला सवाल खड़ा करती है। यह फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए सबसे युवा परम वीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन पर आधारित है, लेकिन यह फिल्म युद्ध का जश्न नहीं मनाती—यह युद्ध की कीमत दिखाती है।

न जिंगोइज्म, न ‘हाऊ इज़ द जोश’

‘इक्कीस’ को देखने से पहले अगर आप उरी, फाइटर या गदर टाइप फिल्म की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो शायद आप निराश हों। इसमें न तो “ये नया हिंदुस्तान है” जैसे डायलॉग हैं, न “मैं अकेला ही पूरी दुश्मन फौज के लिए काफी हूं” जैसी अतिरंजित बहादुरी। यह फिल्म जिंगोइज्म यानी आक्रामक राष्ट्रवाद से दूर रहकर सैनिकों की खामोश, वास्तविक और मानवीय बहादुरी दिखाती है।

हिंसा नहीं, संवेदना है केंद्र में

फिल्म युद्ध की पृष्ठभूमि में होते हुए भी हिंसा को ग्लोरिफाई नहीं करती। न वीभत्स मारपीट, न स्लो-मो में उड़ते शरीर, न चमत्कारी एक्शन। यहां टैंक चलाने वाला हीरो भी इंसान है, सुपरमैन नहीं। वह अकेला पूरी आर्मी को खत्म नहीं करता। यही वजह है कि फिल्म कई दर्शकों को असहज कर सकती है, क्योंकि यह वह सिनेमाई फॉर्मूला नहीं अपनाती जिससे हम अभ्यस्त हो चुके हैं।

युद्ध के बीच भी इंसानियत

फिल्म का सबसे बड़ा साहस यह है कि यह दुश्मन को भी एक इंसान के रूप में दिखाती है। पाकिस्तानी सैनिक को केवल खलनायक नहीं बनाया गया, बल्कि उसे सोचने-समझने वाला व्यक्ति बताया गया है। जयदीप अहलावत द्वारा निभाया गया पाकिस्तानी फौजी किरदार इसका उदाहरण है। यही नहीं, फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि युद्ध के मैदान में भी सैनिक एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, जबकि हम शांति के समय में अपने ही देशवासियों से नफरत करने से नहीं चूकते।

आज के समाज पर आईना

‘इक्कीस’ सिर्फ एक वॉर फिल्म नहीं, बल्कि आज के भारतीय समाज पर भी सवाल उठाती है। फिल्म देखने के बाद कई दर्शकों को यह हीन भावना हो सकती है कि जिन सैनिकों ने देश के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया, उसी देश में हम भ्रष्टाचार, जातिवाद, भाई-भतीजावाद और हिंसा में उलझे हुए हैं। जहां फिल्म दुश्मन को सम्मान देना सिखाती है, वहीं असल ज़िंदगी में हम लिंचिंग जैसी घटनाओं से शर्मिंदा होते हैं।

ओवर-ग्लोरिफिकेशन से दूरी

आजकल की कई फिल्मों में सैनिकों की बहादुरी को भावनात्मक उन्माद में बदल दिया जाता है। ‘इक्कीस’ इससे बचती है। इसमें देशभक्ति शोर नहीं मचाती, बल्कि चुपचाप दिल में उतरती है। दूसरे हाफ और क्लाइमेक्स में भावनाएं चरम पर जरूर पहुंचती हैं, लेकिन बिना इमोशनल मैनिपुलेशन के।

तकनीकी पक्ष और रियलिज़्म

फिल्म के युद्ध दृश्य रियलिस्टिक और इंटेंस हैं। वीएफएक्स और सिनेमेटोग्राफी प्रभावशाली हैं, लेकिन दिखावे के लिए नहीं। एक्शन सीन ऐसे नहीं हैं कि हीरो अकेला दुश्मनों की लाइन लगा दे। यह यथार्थ के करीब है—और शायद यही बात कुछ दर्शकों को खटक सकती है।

कास्टिंग पर उठे सवाल

फिल्म की कास्टिंग को लेकर भी बहस हुई है। अमिताभ बच्चन के नाती अगस्त्य नंदा, अक्षय कुमार की भतीजी सिमर भाटिया, नसीरुद्दीन शाह के बेटे विवान शाह और किरण खेर के बेटे सिकंदर खेर—इन नामों ने ‘नेपोटिज्म’ की चर्चा को हवा दी। हालांकि, फिल्म इन कलाकारों की मौजूदगी से ज्यादा अपनी कहानी और भावनात्मक गहराई के कारण चर्चा में रहती है।

क्या यह फिल्म सबके लिए है?

शायद नहीं। अगर आप ऐसी वॉर फिल्म देखना चाहते हैं जिसमें हीरो फाइटर प्लेन को ऑटो-रिक्शा की तरह उड़ाए, एक हथियार से दर्जनों दुश्मन गिरा दे और कभी मरे ही नहीं—तो ‘इक्कीस’ आपके लिए नहीं है। लेकिन अगर आप युद्ध को एक मानवीय त्रासदी के रूप में देखना चाहते हैं, तो यह फिल्म जरूरी हो जाती है।

‘इक्कीस’ एक एंटी-वॉर फिल्म है जो बहादुरी को शोर नहीं, बल्कि संवेदना से परिभाषित करती है। यह फिल्म देखने के बाद तालियां कम और सवाल ज्यादा उठते हैं। शायद यही इसका सबसे बड़ा योगदान है।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

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