जहानाबाद की बेटी के मौत मामले में पटना पुलिस की भूमिका पर सवाल, जांच की दिशा बदलने के आरोप तेज

जहानाबाद

जहानाबाद की बेटी

जहानाबाद केस में पोस्टमार्टम से पहले आत्महत्या घोषित करने पर सवाल

जहानाबाद की छात्रा की संदिग्ध मौत मामले में पटना पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पोस्टमार्टम, जांच की दिशा और साक्ष्य मिटाने के आरोपों के बीच निष्पक्ष जांच की मांग तेज।

पटना।
जब किसी संवेदनशील आपराधिक मामले की जांच सत्ता के गलियारों या प्रभावशाली रसूखदारों तक पहुंचने लगती है, तब अक्सर यह आरोप लगते रहे हैं कि प्रशासनिक स्तर पर जांच की दिशा मोड़ दी जाती है। जहानाबाद जिले की रहने वाली 18 वर्षीय छात्रा की संदिग्ध मौत—जिसे परिजन कथित बलात्कार और हत्या बता रहे हैं—अब इसी आशंका को और गहरा कर रही है। इस पूरे मामले में पटना पुलिस की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिससे आम जनता का भरोसा डगमगाने लगा है।

NEET की तैयारी कर रही यह छात्रा पटना के चित्रगुप्त नगर थाना क्षेत्र स्थित शंभु गर्ल्स हॉस्टल में रह रही थी। 6 जनवरी को वह अपने कमरे में अचेत अवस्था में मिली थी और 11 जनवरी को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। शुरुआती जांच में पुलिस ने मामले को आत्महत्या और नींद की गोलियों के ओवरडोज से जोड़ दिया, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आने के बाद पूरे केस की तस्वीर बदल गई।

पोस्टमार्टम से पहले आत्महत्या की घोषणा क्यों?

सबसे पहला और अहम सवाल यही उठता है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने से पहले ही पुलिस ने छात्रा की मौत को आत्महत्या क्यों घोषित कर दिया। क्या यह जांच को एक निश्चित दिशा में मोड़ने का प्रयास नहीं था? परिजनों का कहना है कि बिना वैज्ञानिक और मेडिकल पुष्टि के इस तरह का निष्कर्ष निकालना न केवल जल्दबाजी थी, बल्कि संदेह को भी जन्म देता है।

चोटों को अफवाह बताने पर सवाल

दूसरा बड़ा सवाल पुलिस के उस बयान पर है, जिसमें छात्रा के शरीर पर मौजूद जख्मों और चोटों को अफवाह बताया गया था। जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से शरीर पर कई जगह चोट, खरोंच और नाखून से बने निशानों की पुष्टि हुई है। रिपोर्ट के अनुसार ये निशान संघर्ष की ओर इशारा करते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पुलिस ने इन तथ्यों को पहले क्यों नकारा?

पीएमसीएच की रिपोर्ट पर संदेह क्यों?

तीसरा सवाल मेडिकल प्रक्रिया से जुड़ा है। पीएमसीएच के मेडिकल बोर्ड द्वारा विधिवत पोस्टमार्टम किया गया, लेकिन इसके बावजूद पटना पुलिस अब उस रिपोर्ट से असंतुष्ट नजर आ रही है और उसे दूसरी राय के लिए AIIMS भेजने की बात कही गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि सेकेंड ओपिनियन मेडिकल प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन परिजन इसे जांच को अनावश्यक रूप से लंबा करने और समय खींचने की कोशिश मान रहे हैं। उनका आरोप है कि इससे साक्ष्य कमजोर हो सकते हैं।

दाह संस्कार में जल्दबाजी क्यों?

चौथा और बेहद संवेदनशील सवाल मृतका के दाह संस्कार को लेकर है। परिजनों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि पटना पुलिस दाह संस्कार को लेकर असामान्य रूप से जल्दबाजी कर रही थी। कारगिल चौक, पटना के वायरल वीडियो फुटेज इस जल्दबाजी की गवाही देते बताए जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या इतनी जल्दी अंतिम संस्कार कराने की कोशिश साक्ष्य मिटाने की आशंका को जन्म नहीं देती?

‘सब कुछ सामान्य’ से गिरफ्तारी तक

पांचवां और सबसे अहम सवाल पुलिस की बदलती भूमिका पर है। एसएसपी पटना के अनुसार शुरुआत में शंभु गर्ल्स हॉस्टल में सब कुछ सामान्य बताया गया था। लेकिन अब उसी मामले में साक्ष्य मिटाने के आरोप में हॉस्टल संचालक की गिरफ्तारी की गई है। यदि शुरुआत में सब कुछ सामान्य था, तो बाद में साक्ष्य मिटाने की बात कैसे सामने आई? इस विरोधाभास ने पटना पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

परिजनों का आरोप और जनता का भरोसा

मृतका के परिजन लगातार आरोप लगा रहे हैं कि मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि छात्रा मानसिक रूप से कमजोर नहीं थी और आत्महत्या का कोई कारण नहीं था। परिवार का दावा है कि सच्चाई सामने आने से पहले ही केस को खत्म करने की कोशिशें की गईं।

इन तमाम परिस्थितियों में अब जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या पटना पुलिस की जांच पर भरोसा कायम रह सकता है? सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, लोग निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।

डीजीपी से उच्चस्तरीय जांच की मांग

मामले की गंभीरता को देखते हुए नागरिक समाज और परिजनों की ओर से बिहार के पुलिस महानिदेशक विनय कुमार से अपील की गई है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्चस्तरीय जांच स्वयं उनकी निगरानी में कराई जाए। साथ ही दोषियों को कठोर से कठोर सजा दिलाने की मांग की जा रही है, ताकि भविष्य में किसी भी बेटी के साथ अन्याय होने पर व्यवस्था पर सवाल न उठे।

यह मामला अब सिर्फ एक छात्रा की मौत का नहीं रह गया है। यह न्याय व्यवस्था, पुलिस की विश्वसनीयता और बेटियों की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है। आखिरकार, न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

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