बिहार में बढ़ता प्रदूषण: जहरीली हवा, बिगड़ती सेहत और सरकारी अनदेखी

बिहार में बढ़ता प्रदूषण

बिहार में बढ़ता प्रदुषण

बिहार में बढ़ता प्रदूषण: हालात क्यों हो रहे हैं बेकाबू

बिहार में बढ़ता प्रदूषण गंभीर जनस्वास्थ्य संकट बन चुका है। पटना समेत कई शहरों में AQI खतरनाक स्तर पर, लेकिन दिल्ली के मुकाबले बिहार को सरकारी प्राथमिकता नहीं मिल रही।

पटना।
बिहार में बढ़ता प्रदूषण अब केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह जनस्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। राज्य के कई शहरों में वायु गुणवत्ता मानक से कई गुना अधिक दर्ज की जा रही है, लेकिन इसके बावजूद हालात को लेकर सरकार की गंभीरता सवालों के घेरे में है। राजधानी पटना से लेकर गया, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर और आरा तक, लोग हर दिन जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।

पटना समेत कई शहरों में AQI खतरनाक स्तर पर

सर्दियों के मौसम में बिहार के शहरों में Air Quality Index (AQI) लगातार “खराब” और “अत्यंत खराब” श्रेणी में पहुंच रहा है। कई मौकों पर पटना का AQI 300 के पार दर्ज किया गया है, जो सीधे तौर पर स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों में गहराई तक जाकर गंभीर बीमारियों को जन्म दे रहे हैं।

चौंकाने वाली बात यह है कि कई बार बिहार के शहरों की हवा दिल्ली से भी ज्यादा प्रदूषित पाई गई, लेकिन न तो कोई आपात चेतावनी जारी हुई और न ही बड़े स्तर पर सख्त कदम उठाए गए।

प्रदूषण के पीछे क्या हैं असली कारण

बिहार में बढ़ते प्रदूषण के पीछे कई स्पष्ट कारण सामने आते हैं—

1.तेजी से बढ़ते वाहनों का धुआं और पुराने वाहन
2.निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, जिस पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं
3.खुले में कचरा और कृषि अवशेष जलाना
4.बिना मानकों के चल रहे ईंट भट्ठे
5.सर्दियों में कम हवा की गति और कोहरा, जिससे प्रदूषक तत्व नीचे ही फंसे रहते हैं

इन सभी कारणों को जानने के बावजूद कार्रवाई का अभाव स्थिति को और गंभीर बना रहा है।

स्वास्थ्य पर पड़ता सीधा असर

बिहार में प्रदूषण का सबसे बड़ा असर आम लोगों की सेहत पर पड़ रहा है। अस्पतालों में दमा, सांस की बीमारी, एलर्जी, आंखों में जलन और हृदय रोग से पीड़ित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। डॉक्टरों का कहना है कि अब नॉन-स्मोकर्स में भी फेफड़ों की गंभीर बीमारियां सामने आ रही हैं।

बच्चे, बुजुर्ग और पहले से बीमार लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। इसके बावजूद न तो स्वास्थ्य आपात स्थिति घोषित की जाती है और न ही व्यापक स्तर पर बचाव अभियान चलाए जाते हैं।

ग्रामीण बिहार भी सुरक्षित नहीं

यह समस्या केवल शहरी इलाकों तक सीमित नहीं है। ग्रामीण बिहार में भी बायोमास जलाने, ईंट भट्ठों और प्रदूषित हवा के कारण हालात चिंताजनक हैं। कई रिपोर्ट्स में सामने आया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी PM2.5 का स्तर खतरनाक बना हुआ है, लेकिन वहां मॉनिटरिंग और जागरूकता लगभग न के बराबर है।

दिल्ली के लिए अलार्म, बिहार के लिए खामोशी

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब दिल्ली में प्रदूषण बढ़ता है तो पूरा सिस्टम हरकत में आ जाता है, लेकिन बिहार के मामले में चुप्पी क्यों?
दिल्ली में GRAP लागू होता है, स्कूल बंद होते हैं, निर्माण कार्य रुकते हैं और सुप्रीम कोर्ट तक सख्ती दिखती है। वहीं बिहार में हालात उतने ही खराब होने के बावजूद प्रदूषण को अक्सर “मौसमी समस्या” बताकर टाल दिया जाता है।

क्या बिहार की आबादी कम महत्वपूर्ण है? या फिर यह मान लिया गया है कि यहां के लोग चुपचाप जहरीली हवा सहते रहेंगे?

पर्यावरण विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि यह संसाधनों की नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। राजधानी होने का फायदा दिल्ली को मिलता है, जबकि बिहार जैसे राज्य उपेक्षा के शिकार बने रहते हैं।

सरकारी कदम: कागजों तक सीमित

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की बैठकें होती हैं, निर्देश जारी होते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर असर न के बराबर दिखता है। न तो बड़े स्तर पर वाहन नियंत्रण होता है, न निर्माण स्थलों पर सख्ती और न ही ईंट भट्ठों पर प्रभावी कार्रवाई।

निष्कर्ष

बिहार में बढ़ता प्रदूषण अब चेतावनी नहीं, बल्कि खतरे की घंटी है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है। जरूरत है कि बिहार के प्रदूषण को भी दिल्ली जितनी ही गंभीरता से लिया जाए।

जब तक सरकार की प्राथमिकता सूची में बिहार शामिल नहीं होगा, तब तक यहां के लोग जहरीली हवा में जीने को मजबूर रहेंगे।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

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