मधुबनी बना पेपरलेस प्रशासन का मॉडल: ई-ऑफिस से बदली बिहार के एक जिले की तस्वीर
बिहार के मधुबनी जिले ने प्रशासनिक कामकाज में एक नई मिसाल कायम की है। जहां आमतौर पर सरकारी दफ्तरों की पहचान भीड़, फाइलों के ढेर और दलालों के नेटवर्क से होती है,
बिहार के मधुबनी जिले ने प्रशासनिक कामकाज में एक नई मिसाल कायम की है। जहां आमतौर पर सरकारी दफ्तरों की पहचान भीड़, फाइलों के ढेर और दलालों के नेटवर्क से होती है, वहीं मधुबनी के प्रखंड और जिला कार्यालय आज शांति, पारदर्शिता और तेज़ कामकाज के लिए पहचाने जा रहे हैं। इसकी वजह है—पूरे जिले में ई-ऑफिस प्रणाली को प्रभावी ढंग से लागू करना और प्रशासन को लगभग पूरी तरह पेपरलेस बनाना।

मधुबनी जिले के पंडौल प्रखंड कार्यालय का दृश्य इस बदलाव की साफ तस्वीर पेश करता है। कामकाजी दिन होने के बावजूद वहां न तो लोगों की भीड़ दिखती है और न ही सरकारी काम करवाने वालों का हुजूम। बाहर सन्नाटा जरूर है, लेकिन अंदर अधिकारी और कर्मचारी कंप्यूटर व लैपटॉप पर पूरी मुस्तैदी से काम कर रहे हैं। फाइलें अब हाथों में नहीं, बल्कि ऑनलाइन सिस्टम में आगे बढ़ रही हैं।
भीड़ से राहत, सिस्टम पर भरोसा
पहले प्रखंड कार्यालयों में इंदिरा आवास, मनरेगा जॉब कार्ड, पेंशन, राशन कार्ड या अन्य सरकारी योजनाओं के लिए लोग बार-बार चक्कर लगाते थे। शुक्रवार को तो हालात और भी खराब होते थे, क्योंकि अधिकारियों को जिला मुख्यालय में जिलाधिकारी के जनता दरबार में जाना पड़ता था। अब यह समस्या खत्म हो चुकी है।
पंडौल के प्रभारी बीडीओ और प्रशिक्षु आईएएस अधिकारी वीरूपाक्ष विक्रम सिंह बताते हैं कि अब न तो अधिकारियों को बार-बार बाहर जाना पड़ता है और न ही लोगों को प्रखंड या जिला कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं। आवेदन पंचायत स्तर पर जमा हो जाता है और उसकी पूरी ट्रैकिंग ऑनलाइन होती है। अगर फाइल कहीं अटकती है, तो उसकी जानकारी भी सिस्टम में साफ दिखती है।
388 दफ्तर, 40 हजार फाइलें, एक डिजिटल प्लेटफॉर्म
जिला आईटी अधिकारी आशीष कुमार के अनुसार मधुबनी जिले के 388 सरकारी दफ्तरों को ई-ऑफिस से जोड़ा जा चुका है। इसके लिए 1240 यूजर अकाउंट बनाए गए हैं और लगभग 40 हजार सरकारी फाइलों को स्कैन कर डिजिटल रूप में सुरक्षित किया गया है।
इससे न केवल फाइलों के गुम होने या खराब होने की समस्या खत्म हुई है, बल्कि काम में देरी और लापरवाही पर भी रोक लगी है। हर फाइल का पूरा रिकॉर्ड सिस्टम में दर्ज रहता है—कब बनी, किस अधिकारी के पास कितनी देर रही और किस कारण से रुकी। अगर कोई अधिकारी बेवजह फाइल रोकता है, तो उसकी जानकारी सीधे वरिष्ठ अधिकारियों और जिलाधिकारी तक पहुंच जाती है।
आम लोगों को मिला सीधा लाभ
ई-ऑफिस का सबसे बड़ा फायदा आम नागरिकों को मिला है। गजानंद राज पिछले कई सालों से अपनी मां के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति के लिए प्रयास कर रहे थे। जैसे ही सिस्टम ऑनलाइन हुआ, महज 15 दिनों में उन्हें नौकरी मिल गई। इसी तरह 230 से अधिक लोगों को इस योजना का लाभ मिला।

बलदेव साह दो साल से वृद्धावस्था पेंशन के लिए भटक रहे थे, लेकिन नए सिस्टम में उनका काम चार दिन में पूरा हो गया। रामकुमार सिंह, जो वर्षों से राशन कार्ड के लिए परेशान थे, उन्हें 15 दिनों में राशन कार्ड मिल गया। यहां तक कि सरकारी कर्मचारियों की छुट्टियों और वेतन वृद्धि जैसे काम, जो पहले हफ्तों लगते थे, अब 45 मिनट से एक घंटे में निपट रहे हैं।
जिलाधिकारी आनंद शर्मा की पहल
इस पूरे डिजिटल परिवर्तन के पीछे मधुबनी के जिलाधिकारी आनंद शर्मा की अहम भूमिका है। टेक्नोलॉजी बैकग्राउंड से आने वाले आनंद शर्मा पहले भी सहरसा जिले में प्रशासन को पेपरलेस बना चुके हैं। मधुबनी में पदभार संभालते ही उन्होंने जिले को पूरी तरह ई-गवर्नेंस से जोड़ने का लक्ष्य रखा।
इसके लिए आईटी टीम को मजबूत किया गया, 22 मास्टर ट्रेनर नियुक्त किए गए और जिला से लेकर प्रखंड स्तर तक लगातार प्रशिक्षण चलाया गया। ई-ऑफिस के अलावा कई लोकल सॉफ्टवेयर भी विकसित किए गए, जिनमें ‘मधुबनी फर्स्ट’ प्रमुख है। इस पोर्टल से जिले के 45 विभाग जुड़े हैं और जिलाधिकारी कभी भी देख सकते हैं कि कौन सा काम किस स्तर पर चल रहा है।
इसके अलावा ऑनलाइन जनता दरबार, विजिटर मैनेजमेंट ऐप और कोर्ट से जुड़े मॉड्यूल भी तैयार किए गए हैं, जिससे प्रशासन और जनता के बीच सीधा और पारदर्शी संवाद संभव हो सका है।
करोड़ों की बचत, पर्यावरण को फायदा
मधुबनी जिले के इस पेपरलेस अभियान से आर्थिक लाभ भी हुआ है। जिला समाहरणालय में पहले हर साल कागज और कार्टिज पर लगभग 25 लाख रुपये खर्च होते थे। अगर जिले के सभी 388 दफ्तरों को जोड़ें, तो यह खर्च 7.5 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच जाता था। ई-ऑफिस लागू होने के बाद यह खर्च लगभग खत्म हो गया है।

साथ ही, कागज की खपत कम होने से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिला है।
बिहार के लिए एक मॉडल
फिलहाल बिहार में गिने-चुने जिले ही ई-ऑफिस का सही उपयोग कर पा रहे हैं, जिनमें मधुबनी प्रमुख है। यहां का अनुभव बताता है कि अगर नेतृत्व मजबूत हो और तकनीक का सही इस्तेमाल किया जाए, तो सरकारी कामकाज को पारदर्शी, तेज़ और जनता के अनुकूल बनाया जा सकता है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मधुबनी के इस सफल प्रयोग को बिहार सरकार पूरे राज्य में कब और कैसे लागू करती है। अगर ऐसा होता है, तो यह न सिर्फ प्रशासनिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम होगा, बल्कि आम लोगों के भरोसे को भी मजबूत करेगा।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
