यह सिर्फ इस्तीफ़ा नहीं, व्यवस्था पर सवाल है: आलोक राज का फैसला और बिहार का सिस्टम
बिहार के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आलोक राज का तीन दिन में दिया गया इस्तीफ़ा सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि व्यवस्था की कार्यशैली पर गंभीर सवाल है। यह इस्तीफ़ा ईमानदारी, दबाव और संवैधानिक संस्थाओं की सच्चाई को उजागर करता है।
आलोक राज का इस्तीफ़ा: एक प्रशासनिक फैसला या व्यवस्था पर सवाल?

बिहार के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आलोक राज का इस्तीफ़ा महज़ एक प्रशासनिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है, जिसे अक्सर “सुशासन” के नाम पर पेश किया जाता रहा है। किसी संवैधानिक संस्था के अध्यक्ष का महज़ तीन दिन में पद छोड़ देना सामान्य प्रक्रिया नहीं कही जा सकती। यह एक संकेत है कि सिस्टम के भीतर कुछ ऐसा है, जिसे एक अनुभवी और ईमानदार अधिकारी भी सहन नहीं कर सका।
सरकार भले ही इसे “व्यक्तिगत कारणों” से जोड़कर देखे, लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक गहरी और असहज है। आलोक राज का पद छोड़ना दरअसल उस तंत्र से इनकार है, जहां ईमानदारी को सहयोग नहीं, बल्कि बाधा समझा जाता है।
तीन दिन में इस्तीफ़ा: सामान्य नहीं, असामान्य संकेत
किसी संवैधानिक संस्था के प्रमुख का महज़ तीन दिनों में इस्तीफ़ा देना यह बताता है कि मामला बेहद गंभीर रहा होगा। सवाल यह नहीं कि उन्होंने क्यों छोड़ा, बल्कि यह है कि ऐसा क्या सामने आया जो इतना असहनीय था कि सुधार या प्रतीक्षा की कोई गुंजाइश ही नहीं बची।
यह मान लेना आसान होगा कि उन पर “दबाव” था, लेकिन असली सवाल यह है कि दबाव किसका था और किस उद्देश्य से। क्या अब चयन आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं भी इतनी प्रभावित हो चुकी हैं कि वहां रहना ही समझौते का दूसरा नाम बन गया है?
बिहार का ‘सॉफ्ट सिस्टम’, जो चुपचाप तोड़ देता है

उत्तर प्रदेश में अमिताभ ठाकुर जैसे अधिकारियों के साथ जो हुआ, वह सत्ता की खुली कठोरता का उदाहरण था—सवाल पूछने पर कार्रवाई, असहमति पर दंड। बिहार में तस्वीर थोड़ी अलग दिखती है। यहां न तो हथकड़ी दिखाई देती है, न ही गोली चलती है, लेकिन सिस्टम अपना काम बेहद चुपचाप कर देता है।
आलोक राज का इस्तीफ़ा इसी “सॉफ्ट वर्ज़न” का उदाहरण है, जहां अधिकारी को सीधे नहीं हटाया जाता, बल्कि हालात ऐसे बना दिए जाते हैं कि बाहर निकलना ही सबसे सम्मानजनक रास्ता रह जाता है।
यह एक व्यक्ति का नहीं, पूरी व्यवस्था का मामला है
आलोक राज कोई नए या अनुभवहीन अधिकारी नहीं थे। उनका करियर नक्सल विरोधी अभियानों, कठिन जिलों की तैनाती और राष्ट्रपति पदक जैसी उपलब्धियों से भरा रहा है। ऐसे अधिकारी से यह उम्मीद करना कि वह किसी चयन प्रक्रिया या संस्थागत अनियमितता को चुपचाप स्वीकार कर लेगा, सत्ता की बड़ी गलतफहमी कही जा सकती है।
यह इस्तीफ़ा दरअसल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी संरचना पर आरोप है। यह बताता है कि संस्थान आज भी व्यक्तियों की नैतिकता पर टिके हैं, न कि मजबूत नियमों और पारदर्शिता पर।
ईमानदारी आज भी व्यक्तिगत गुण क्यों?
आलोक राज के फैसले ने एक कड़वी सच्चाई को उजागर किया है—ईमानदारी आज भी इस देश में व्यक्तिगत गुण है, संस्थागत मूल्य नहीं। जब तक कोई अधिकारी नियमों को कागज़ पर निभाता है, सब ठीक रहता है। जैसे ही वही अधिकारी नियमों को ज़मीनी स्तर पर लागू करने की कोशिश करता है, उसे “अव्यावहारिक” घोषित कर दिया जाता है।
यही वह बिंदु है, जहां से व्यवस्था का असली चरित्र सामने आता है और यहीं से उसका नैतिक पतन भी शुरू होता है।
क्या चुप रहना ही अब अनुशासन है?
अक्सर यह सवाल उठता है कि सेवा के दौरान ऐसे अधिकारी चुप क्यों रहते हैं। इसका जवाब भी इसी सिस्टम में छिपा है। नौकरी में रहते हुए चुप्पी को “अनुशासन” कहा जाता है, और सेवानिवृत्ति के बाद उसी चुप्पी को “समझौता” कहा जाता है।
संभव है कि आलोक राज उस मोड़ पर पहुंच गए हों, जहां चुप रहना भी उन्हें अपराध जैसा लगने लगा हो। यही वह स्थिति होती है, जिससे व्यवस्था सबसे ज्यादा डरती है।
क्या यह किसी राजनीतिक भविष्य की तैयारी है?
कुछ लोग इस इस्तीफ़े को संभावित राजनीतिक भविष्य से जोड़कर भी देख सकते हैं। लेकिन आलोक राज का अब तक का रिकॉर्ड बताता है कि यह सत्ता की ओर कदम नहीं, बल्कि सत्ता से दूरी का संकेत है। ऐसे फैसले आसान नहीं होते। यह रास्ता अकेलापन, उपेक्षा और संदेह से भरा होता है।
सिस्टम ऐसे लोगों को नायक बनने नहीं देता। या तो उन्हें भुला दिया जाता है, या फिर उनके इरादों पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।
असली सवाल जनता से है

सरकार की ओर से बयान आएंगे—स्वास्थ्य कारण, निजी वजहें, पारिवारिक जिम्मेदारियां। यह सब पहले भी सुना जा चुका है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जनता अब भी इन आधिकारिक कारणों पर भरोसा करती है?
अगर एक वरिष्ठ अधिकारी का तीन दिन में पद छोड़ देना हमें विचलित नहीं करता, तो यह लोकतंत्र की नहीं, बल्कि समाज की हार है। क्योंकि जब समाज सवाल पूछना छोड़ देता है, तब सत्ता को जवाब देने की ज़रूरत भी नहीं रहती।
आगे क्या?
आलोक राज का इस्तीफ़ा यह साफ कहता है कि व्यवस्था के भीतर कुछ ऐसा है, जिसे हर कोई सहन नहीं कर सकता। सवाल यह नहीं कि उन्होंने इस्तीफ़ा क्यों दिया। उससे बड़ा सवाल यह है कि ऐसी कौन-सी व्यवस्था है, जहां टिके रहने के लिए इस्तीफ़ा ही सबसे ईमानदार विकल्प बचता है।
अब यह समाज पर निर्भर करता है कि वह इसे “बिहार में सामान्य” मानकर आगे बढ़ जाए, या सच में यह जानने की कोशिश assumes करे कि सिस्टम के भीतर आखिर सड़ क्या रहा है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
