जब चेहरा संस्थान से बड़ा हो गया: लल्लनटॉप और सौरभ द्विवेदी के अलगाव के पीछे की असली वजह
लल्लनटॉप की शुरुआत की कहानी
बंद कमरे से ब्रांड बनने तक: लल्लनटॉप की शुरुआत की कहानी
डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में ‘लल्लनटॉप’ एक ऐसा नाम बन चुका है जिसने बेहद कम समय में करोड़ों दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। एक बंद कमरे से शुरू हुआ यह प्रयोग जब प्रचंड सफलता में बदला, तो यह आम दर्शकों की आवाज़ बन गया। हालांकि, इसकी लोकप्रियता के बावजूद ‘आजतक’ या ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ ने कभी भी लल्लनटॉप को अपने नाम के साथ आक्रामक रूप से ब्रांड नहीं किया। यही दूरी धीरे-धीरे इस धारणा को मजबूत करती गई कि लल्लनटॉप का चेहरा और सर्वेसर्वा सौरभ द्विवेदी ही हैं।
लेकिन हकीकत इससे अलग है। लल्लनटॉप पूरी तरह से टीवी टुडे नेटवर्क के स्वामित्व वाला डिजिटल प्लेटफॉर्म है। सौरभ द्विवेदी वहां केवल संपादक की भूमिका में थे, मालिक नहीं। लगभग एक साल पहले ही उनसे यह जिम्मेदारी लेकर कुलदीप मिश्र को हेड बनाया गया था, जो आजतक रेडियो के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘तीन ताल’ से भी जुड़े हैं। पूरे डिजिटल वर्टिकल की कमान इंडिया टुडे ग्रुप में कमलेश सिंह के हाथों में है।

सौरभ द्विवेदी का कद और संस्थान की सीमा
सूत्रों के अनुसार, सौरभ द्विवेदी की विदाई अचानक लिया गया फैसला नहीं थी, बल्कि इसकी पटकथा काफी पहले लिखी जा चुकी थी। कॉर्पोरेट संस्थानों का एक स्थापित नियम है कि कोई भी कर्मचारी संस्थान से बड़ा नहीं हो सकता। बताया जाता है कि सौरभ के मामले में यही सिद्धांत टकराव का कारण बना।
एक समय ऐसा भी था जब मैनेजमेंट उनकी लेखनी और प्रस्तुति से प्रभावित होकर उन्हें ‘इंडिया टुडे’ (हिंदी) पत्रिका का संपादक नियुक्त करता है। यह निर्णय इसलिए भी ऐतिहासिक माना गया क्योंकि प्रभु चावला, एम.जे. अकबर और कावेरी बामजई जैसे दिग्गजों के बाद इतनी कम उम्र में यह जिम्मेदारी मिलना असाधारण था।
हालांकि, संस्थान से जुड़े कुछ लोगों का मानना है कि इसी उपलब्धि के बाद सौरभ के व्यवहार में बदलाव आया। सूत्र बताते हैं कि वे खुद को अपने मार्गदर्शकों से ऊपर समझने लगे थे और टीम के भीतर उनके व्यवहार को लेकर असंतोष बढ़ने लगा था।

अनुशासन और नियमों को लेकर विवाद
टीवी टुडे ग्रुप में यह स्पष्ट नियम है कि कोई भी वरिष्ठ पत्रकार, चाहे वह कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो, किसी बाहरी मंच या विदेश यात्रा के लिए टॉप मैनेजमेंट की अनुमति के बिना हिस्सा नहीं ले सकता। श्वेता सिंह, अंजना ओम कश्यप, शम्स ताहिर खान और विक्रांत गुप्ता जैसे स्थापित नामों ने इस मर्यादा का हमेशा पालन किया।
लेकिन सूत्रों के मुताबिक, सौरभ द्विवेदी ने इस नियम को चुनौती दी। वे बिना अनुमति विदेश यात्राएं करने लगे और कार्यक्रमों में शामिल हुए। जब उन्हें टोका गया, तो कथित तौर पर उनका जवाब था कि उन्हें किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
आमिर खान इंटरव्यू और ‘सिनेर्जी’ विवाद

विवादों की कड़ी यहीं नहीं रुकी। कुछ महीने पहले अभिनेता आमिर खान अपनी टीम के साथ टीवी टुडे के दफ्तर पहुंचे और लल्लनटॉप को लगभग तीन घंटे का विशेष इंटरव्यू दिया। संस्थान में ‘सिनेर्जी’ का नियम है कि ऐसे मौकों पर सभी विभागों को सूचित किया जाए ताकि समूह को अधिकतम लाभ मिल सके।
आरोप है कि इस इंटरव्यू को गुप्त रखा गया। जब मैनेजमेंट ने जवाब मांगा, तो फिर वही रुख अपनाया गया—“मैं किसी को जवाबदेह नहीं हूं।”
‘Does God Exist?’ डिबेट बना निर्णायक मोड़
20 दिसंबर 2025 को मामला निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया। सौरभ द्विवेदी बिना अनुमति एक कार्यक्रम में मॉडरेटर के रूप में शामिल हुए, जहां ‘Does God Exist?’ जैसे संवेदनशील विषय पर जावेद अख्तर और मुफ्ती शमैल नदवी के बीच बहस हो रही थी। इस पूरी बहस को कथित तौर पर बिना अनुमति लल्लनटॉप के प्लेटफॉर्म पर प्रसारित कर दिया गया।

सूत्रों के अनुसार, यह कंटेंट न केवल समाज के एक वर्ग को आपत्तिजनक लगा, बल्कि इसकी शिकायत मैनेजमेंट और सरकारी स्तर तक भी पहुंची। संस्थान के लिए यह एक बड़ा जोखिम बन गया।
विदाई और संदेश
इसके बाद कई स्तरों पर बातचीत हुई, फोन कॉल्स हुए और बीच का रास्ता तलाशने की कोशिश की गई। अंततः फैसला विदाई का हुआ। मैनेजमेंट यह संदेश देना चाहता था कि जैसे प्रभु चावला इंडिया टुडे के मालिक नहीं थे, वैसे ही सौरभ द्विवेदी लल्लनटॉप के मालिक नहीं हैं।
सूत्र बताते हैं कि विदाई समारोह को लेकर मौन निर्देश था कि कोई भी वरिष्ठ अधिकारी उसमें शामिल नहीं होगा। यही कारण है कि केक कटिंग के वीडियो में टीम के सदस्यों के अलावा केवल कमलेश सिंह ही नजर आते हैं।

आगे की राह
हालांकि सौरभ द्विवेदी ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे ‘अध्ययन’ के लिए जा रहे हैं, लेकिन मीडिया जगत में चर्चा है कि भविष्य की रणनीति पर काम काफी पहले से शुरू हो चुका था। फिलहाल, लल्लनटॉप अपने नए नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है और यह प्रकरण एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि डिजिटल मीडिया में व्यक्ति बड़ा होता है या संस्थान।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
