यूपी में दुनिया के अनोखे वकील जो 41 सालों से लड़ते हैं संस्कृत में मुकदमा, समाज में बने आदर्श
वाराणसी के वकील श्याम उपाध्याय 41 साल से संस्कृत में करते हैं वकालत
निष्कर्ष भारत संवाददाता वाराणसी। अदालत में आमतौर पर हिंदी और अंग्रेजी में वकील को बहस और कानूनी दस्तावेजों का इस्तेमाल होते हुए आपने देखा होगा। लेकिन उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक ऐसे वकील भी हैं, जिन्होंने संस्कृत को अपनी वकालत की भाषा बना लिया है। आचार्य श्याम उपाध्याय पिछले 41 वर्षों से संस्कृत में ही मुकदमों की पैरवी करने का दावा करते हैं। उनका कहना है कि संस्कृत के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करने और देववाणी के संरक्षण के उद्देश्य से उन्होंने न्यायालय में इसी भाषा का इस्तेमाल करने का रास्ता चुना।
वकील आचार्य श्याम उपाध्याय का यह प्रयास उन्हें सामान्य वकालत से अलग पहचान देता है। उनका दावा है कि वह अदालत में वकालतनामा, शपथ पत्र और प्रार्थना पत्र जैसे कानूनी दस्तावेज भी संस्कृत में प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा न्यायालय में बहस और जिरह के दौरान भी वह संस्कृत का ही प्रयोग करने का प्रयास करते हैं।
41 साल से संस्कृत को बनाया वकालत की भाषा
वकील आचार्य श्याम उपाध्याय के अनुसार, संस्कृत केवल धार्मिक या साहित्यिक भाषा नहीं है, बल्कि इसमें कानून और न्याय से जुड़े विषयों को भी प्रभावी ढंग से व्यक्त किया जा सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने करीब चार दशक पहले संस्कृत में वकालत करने की शुरुआत की।
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वकील का कहना है कि जब उन्होंने इस दिशा में कदम बढ़ाया, तब संस्कृत में न्यायालयीन कामकाज करना सामान्य बात नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने अपनी भाषा बदलने के बजाय संस्कृत में ही काम जारी रखा। धीरे-धीरे यह उनकी पहचान बनती चली गई।
वकील के तौर पर उनका प्रयास सिर्फ अदालत में संस्कृत बोलने तक सीमित नहीं है। वह कानूनी प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग दस्तावेजों को भी संस्कृत में तैयार करने पर जोर देते हैं। वकील का मानना है कि किसी भाषा को जीवित और उपयोगी बनाए रखने के लिए उसका इस्तेमाल केवल किताबों तक सीमित नहीं होना चाहिए।
वकील की संस्कृत में दलील सुनकर लोग होते हैं हैरान
अदालत में जब अधिकांश वकील हिंदी या अंग्रेजी में अपनी दलील रखते हैं, ऐसे माहौल में संस्कृत में बहस करना अपने आप में अलग अनुभव है। वकील आचार्य श्याम उपाध्याय के अनुसार, उन्होंने लगातार अभ्यास और अध्ययन के जरिए न्यायालय में संस्कृत के इस्तेमाल को अपनी कार्यशैली का हिस्सा बनाया।
उनके मुताबिक, जब वह संस्कृत में जिरह करते हैं तो अदालत में मौजूद लोग भी उनका ध्यानपूर्वक पक्ष सुनते हैं। उनके इस अंदाज ने उन्हें स्थानीय स्तर पर अलग पहचान दिलाई है। संस्कृत को न्यायिक कार्य से जोड़ने की उनकी कोशिश को भाषा संरक्षण के एक अनोखे प्रयास के तौर पर भी देखा जाता है।

हालांकि, न्यायालयों में कामकाज के लिए निर्धारित भाषाई और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन जरूरी होता है। ऐसे में किसी दस्तावेज या दलील को स्वीकार किए जाने की प्रक्रिया संबंधित न्यायालय के नियमों और प्रचलित व्यवस्था पर निर्भर करती है।
संस्कृत के प्रचार-प्रसार को मानते हैं अपना उद्देश्य
आचार्य श्याम उपाध्याय का कहना है कि उनका उद्देश्य सिर्फ मुकदमे जीतना या वकालत में अलग पहचान बनाना नहीं है। वह संस्कृत को लोगों के दैनिक और पेशेवर जीवन से जोड़ना चाहते हैं। उनके अनुसार, अगर संस्कृत का इस्तेमाल न्यायालय जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में किया जा सकता है तो इससे नई पीढ़ी में भी इस भाषा को लेकर रुचि बढ़ सकती है।
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वह संस्कृत को देववाणी बताते हुए इसके प्रति लोगों को जागरूक करने की बात करते हैं। उनका मानना है कि भाषा के संरक्षण के लिए केवल सरकारी योजनाएं या शैक्षणिक संस्थान पर्याप्त नहीं हैं। समाज में ऐसे लोग भी होने चाहिए जो अपने कामकाज में भाषा का इस्तेमाल कर उसके महत्व को सामने रखें।
इसी सोच के कारण उन्होंने अपनी पेशेवर जिंदगी में संस्कृत को प्रमुख स्थान दिया है। करीब 41 वर्षों तक एक ही भाषा में कानूनी काम करने का उनका दावा उनके लंबे भाषाई समर्पण को दिखाता है।
वकील की पहल से संस्कृत को मिला अलग मंच
संस्कृत को आम तौर पर धार्मिक ग्रंथों, शास्त्रों, साहित्य और शिक्षा से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन आचार्य श्याम उपाध्याय इसे न्यायालय की भाषा के रूप में इस्तेमाल कर एक अलग उदाहरण पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।
उनकी पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने संस्कृत को केवल भावनात्मक या सांस्कृतिक विषय बनाकर नहीं रखा, बल्कि अपने पेशे के साथ जोड़ दिया। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या पारंपरिक भाषाओं को आधुनिक पेशेवर क्षेत्रों में अधिक जगह दी जा सकती है।
उनका प्रयास भाषा प्रेम और पेशेवर प्रतिबद्धता के बीच एक अनोखा मेल दिखाता है। अदालत में कानूनी शब्दावली और जटिल तथ्यों को संस्कृत में प्रस्तुत करने के लिए भाषा पर गहरी पकड़ की जरूरत होती है। यही वजह है कि उनकी कार्यशैली लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
चार दशक से जारी है संस्कृत के लिए संघर्ष
आचार्य श्याम उपाध्याय का कहना है कि वह करीब चार दशक से संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं। उनके लिए संस्कृत में वकालत करना केवल पेशे की जरूरत नहीं, बल्कि एक अभियान का हिस्सा है।
उनका मानना है कि यदि संस्कृत का इस्तेमाल आधुनिक जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में होगा तो इसके प्रति नई पीढ़ी की रुचि भी बढ़ेगी। न्यायालय में अपने काम के जरिए वह इसी संदेश को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।

वाराणसी की अदालतों में संस्कृत के माध्यम से वकालत करने वाले आचार्य श्याम उपाध्याय की कहानी इसलिए भी अलग है, क्योंकि उन्होंने चार दशक से ज्यादा समय तक अपनी भाषाई पसंद को कायम रखा है। उनका दावा है कि वह मुकदमों से जुड़े दस्तावेजों से लेकर अदालत में बहस तक संस्कृत का इस्तेमाल करते हैं।
भले ही न्यायालयों में हिंदी और अंग्रेजी का इस्तेमाल व्यापक रूप से होता हो, लेकिन संस्कृत को अपने पेशे की भाषा बनाने की उनकी कोशिश ने एक अलग उदाहरण जरूर पेश किया है। भाषा संरक्षण और पेशेवर जीवन के इस अनोखे मेल के कारण आचार्य श्याम उपाध्याय की वकालत चर्चा में बनी हुई है।
राज कुमार की रिपोर्ट
