अनिल अग्रवाल का बड़ा संकल्प: बेटे के निधन के बाद कमाई का 75% से ज्यादा दान करेंगे, सादगी से जिएंगे आगे की जिंदगी

अनिल अग्रवाल का भावुक चित्र, जिसमें वे बेटे अग्निवेश अग्रवाल के निधन के बाद समाज सेवा और अपनी संपत्ति का 75 फीसदी से अधिक दान करने के संकल्प पर बात करते हुए नजर आ रहे

अनिल अग्रवाल का भावुक चित्र, जिसमें वे बेटे अग्निवेश अग्रवाल के निधन के बाद समाज सेवा और अपनी संपत्ति का 75 फीसदी से अधिक दान करने के संकल्प पर बात करते हुए नजर आ रहे

बेटे के निधन से टूटे अनिल अग्रवाल, फिर भी लिया बड़ा फैसला

वेदांता ग्रुप के चेयरमैन और देश के जाने-माने उद्योगपति अनिल अग्रवाल इस वक्त अपनी जिंदगी के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। बेटे अग्निवेश अग्रवाल के अचानक निधन ने उन्हें और उनके पूरे परिवार को अंदर से तोड़ दिया है। इस असहनीय दुख के बीच अनिल अग्रवाल ने एक ऐसा फैसला दोहराया है, जिसने न सिर्फ कॉरपोरेट जगत बल्कि आम लोगों का भी ध्यान खींचा है। उन्होंने ऐलान किया है कि वह अपनी कुल कमाई का 75 फीसदी से ज्यादा हिस्सा दान करेंगे और आगे की जिंदगी पूरी सादगी के साथ समाज सेवा में बिताएंगे।

बेटे से किया था वादा, अब और मजबूत हुआ संकल्प

अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर साझा किए अपने भावुक संदेश में लिखा कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है। उन्होंने यह वादा अपने बेटे अग्निवेश अग्रवाल से किया था कि जो भी उन्होंने कमाया है, उसका बड़ा हिस्सा समाज को लौटाएंगे। बेटे के निधन के बाद यह संकल्प और भी मजबूत हो गया है। उन्होंने लिखा कि अब उनकी बाकी जिंदगी इसी उद्देश्य के लिए समर्पित रहेगी।

49 साल की उम्र में बेटे का निधन, परिवार पूरी तरह टूट गया

अग्निवेश अग्रवाल का 49 वर्ष की उम्र में अमेरिका में इलाज के दौरान कार्डियक अरेस्ट से निधन हो गया। एक पिता के लिए जवान बेटे को खोना सबसे बड़ा दुख होता है। अनिल अग्रवाल ने लिखा कि वह और उनकी पत्नी किरण अग्रवाल पूरी तरह टूट चुके हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वेदांता ग्रुप में काम करने वाला हर कर्मचारी उन्हें अपने बच्चों जैसा लगता है और यही सोच उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देती है।

अनिल अग्रवाल कौन हैं?

अनिल अग्रवाल वेदांता रिसोर्सेज के फाउंडर और चेयरमैन हैं। उन्होंने साल 1976 में वेदांता ग्रुप की नींव रखी थी। आज वेदांता ग्रुप मेटल, माइनिंग, पावर और ऑयल जैसे बड़े सेक्टर में काम कर रहा है। भारत के साथ-साथ विदेशों में भी कंपनी की मजबूत मौजूदगी है। अनिल अग्रवाल को देश के प्रमुख सेल्फ-मेड बिजनेसमैन में गिना जाता है।

कबाड़ के कारोबार से अरबों की कंपनी तक का सफर

1954 में पटना, बिहार में जन्मे अनिल अग्रवाल ने बहुत कम उम्र में अपने पिता के साथ कबाड़ के छोटे से कारोबार से शुरुआत की थी। 19 साल की उम्र में वह मुंबई पहुंचे। जेब में पैसे कम थे, लेकिन सपने बड़े और हौसले मजबूत थे। शुरुआती दौर में कई बिजनेस में उन्हें नुकसान झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगातार संघर्ष, जोखिम और मेहनत के बाद यही सफर आगे चलकर वेदांता ग्रुप के रूप में सामने आया।

परिवार में कौन-कौन हैं?

अनिल अग्रवाल की पत्नी किरण अग्रवाल हमेशा लाइमलाइट से दूर रहीं, लेकिन हर बड़े फैसले में उन्होंने अनिल अग्रवाल का पूरा साथ दिया। बेटी प्रिया अग्रवाल अब परिवार और बिजनेस की अहम जिम्मेदारियां संभाल रही हैं। वह हिंदुस्तान जिंक की चेयरपर्सन हैं और वेदांता ग्रुप के कई महत्वपूर्ण काम देखती हैं। इसके अलावा, अनिल अग्रवाल के भाई नवीन अग्रवाल भी ग्रुप के वाइस चेयरमैन हैं।

बिजनेस में भी सक्रिय थे अग्निवेश अग्रवाल

अग्निवेश अग्रवाल सिर्फ एक उद्योगपति के बेटे नहीं थे, बल्कि वे खुद भी बिजनेस में अहम भूमिका निभा रहे थे। वह वेदांता की कंपनी तलवंडी साबो पावर लिमिटेड के बोर्ड में शामिल थे। इसके अलावा उन्होंने Fujairah Gold जैसी कंपनी की भी स्थापना की थी। इतने बड़े कारोबारी परिवार से होने के बावजूद अग्निवेश सादा जीवन पसंद करते थे। उनका अचानक यूं चले जाना परिवार के लिए गहरा सदमा बन गया।

कितनी है अनिल अग्रवाल की संपत्ति?

फोर्ब्स के मुताबिक, अनिल अग्रवाल और उनके परिवार की कुल नेटवर्थ करीब 4.2 अरब डॉलर है, जो भारतीय रुपये में लगभग 35,000 करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। बेटे के निधन से पहले ही उन्होंने ऐलान किया था कि इस संपत्ति का 75 फीसदी हिस्सा समाज को दान किया जाएगा। बेटे के जाने के बाद, गहरे शोक में डूबे अनिल अग्रवाल ने इस फैसले को एक बार फिर दोहराते हुए इसे अपने जीवन का लक्ष्य बताया है।

बेटे के सपनों को करेंगे पूरा

अनिल अग्रवाल ने अपने संदेश में लिखा कि उनका और उनके बेटे का सपना एक जैसा था—भारत को आत्मनिर्भर बनाना। उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य है कि कोई बच्चा भूखा न सोए, हर बच्चे को शिक्षा मिले, महिलाएं आत्मनिर्भर बनें और युवाओं को रोजगार के अवसर मिलें। उन्होंने भावुक शब्दों में लिखा कि बेटे के बिना उनकी जिंदगी अधूरी जरूर है, लेकिन उसके सपने अधूरे नहीं रहेंगे।

अनिल अग्रवाल का यह फैसला न सिर्फ एक पिता के दर्द को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि दुख की घड़ी में भी समाज के लिए कुछ बड़ा करने का जज्बा कैसे पैदा हो सकता है। उनका यह संकल्प आने वाले समय में देश की सामाजिक और विकासात्मक तस्वीर बदलने में अहम भूमिका निभा सकता है।

Nishkarsh Bharat

पटना से मनोज चतुर्वेदी रिपोर्ट

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