एनडीए के 2 दलों में ठनी, संतोष सुमन बोले- चिराग पहले अपनी सत्ता का हिसाब दे, हमारी किताब खुली, आप जबाब दीजिये

संतोष सुमन

संतोष सुमन ने चिराग पासवान से राजनीतिक हिसाब मांगने को कहा

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। संतोष सुमन ने एससी-एसटी आरक्षण में वर्गीकरण और ‘कोटे में कोटा’ के मुद्दे पर जारी सियासी बहस के बीच केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान पर निशाना साधा है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के नेता ने शुक्रवार को सोशल मीडिया पर एक लंबा पोस्ट जारी कर कहा कि जो लोग लंबे समय तक सत्ता में रहे हैं, उन्हें दूसरों से हिसाब मांगने से पहले अपना राजनीतिक हिसाब भी जनता के सामने रखना चाहिए। उन्होंने अपने पोस्ट में महादलितों के लिए किए गए कामों का ब्योरा साझा करते हुए कहा कि “हमारी किताब खुली है”, अब दूसरे लोग भी अपनी किताब जनता के सामने रखें।

संतोष सुमन ने हालांकि अपने पोस्ट में चिराग पासवान का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को मौजूदा सियासी बहस से जोड़कर देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि दलित और महादलित समाज के अधिकारों को लेकर उनकी पार्टी का रुख स्पष्ट है और इस मुद्दे को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

संतोष सुमन ने गिनाईं महादलित योजनाएं

अपने बयान में संतोष सुमन ने अपने पिता और HAM नेता जीतन राम मांझी के सरकार में रहने के दौरान महादलितों के लिए किए गए कामों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सत्ता उनके लिए सिर्फ पद हासिल करने का माध्यम नहीं रही, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों के जीवन में बदलाव लाने का जरिया रही है।

उन्होंने दावा किया कि भूमिहीन महादलित परिवारों को आवासीय जमीन उपलब्ध कराने की योजना के तहत 1,95,177 परिवारों को प्लॉट दिए गए। पोस्ट में उन्होंने 5,717 एकड़ से अधिक भूमि के वितरण का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, महादलित आवास योजना, शौचालय निर्माण और बच्चों को पोशाक देने जैसी योजनाओं के जरिए भी इस वर्ग तक सरकारी सहायता पहुंचाई गई।

पोशाक से कौशल विकास तक का किया जिक्र

संतोष सुमन ने मुख्यमंत्री महादलित पोशाक योजना का उल्लेख करते हुए दावा किया कि इसके तहत करीब 14.71 लाख बच्चों को पोशाक उपलब्ध कराई गई। उनका कहना है कि इन योजनाओं का उद्देश्य महादलित परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने और उनके सामाजिक जीवन में सुधार लाने की दिशा में काम करना था।

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उन्होंने दशरथ मांझी कौशल विकास योजना का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, इस योजना के तहत करीब 2.19 लाख महादलित परिवारों के सदस्यों को अलग-अलग ट्रेड में प्रशिक्षण दिया गया। संतोष सुमन ने कहा कि कौशल विकास जैसी योजनाओं के जरिए युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार के अवसरों से जोड़ने की कोशिश की गई।

विकास मित्र व्यवस्था का भी उल्लेख

संतोष सुमन ने सरकार और महादलित परिवारों के बीच संपर्क स्थापित करने के लिए विकास मित्र व्यवस्था का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस व्यवस्था के तहत 9,875 पद निर्धारित किए गए थे। बाद में इसमें 50 प्रतिशत महिला आरक्षण का प्रावधान किए जाने की बात भी उन्होंने अपने पोस्ट में कही।

उनके अनुसार, विकास मित्रों के जरिए सरकारी योजनाओं की जानकारी और उसका लाभ जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई। उन्होंने सामुदायिक भवन-सह-वर्कशेड, विकास रजिस्टर, रेडियो वितरण, आंगनबाड़ी, क्रेच, मोबाइल चिकित्सा सुविधा और महिलाओं के सशक्तीकरण से जुड़ी योजनाओं को भी अपने दावे के समर्थन में सामने रखा।

संतोष सुमन बोले- हमारी किताब खुली है

संतोष सुमन ने अपने पोस्ट में कहा कि महादलितों के विकास के लिए किए गए कामों का पूरा रिकॉर्ड जनता के सामने रखा जा सकता है। इसी क्रम में उन्होंने कहा कि “हमारी किताब खुली है”। उनके इस बयान का सीधा राजनीतिक संदेश यह है कि दलित और महादलित समाज के लिए किस सरकार या नेता ने क्या काम किया, इसका मूल्यांकन जनता के सामने होना चाहिए।

उन्होंने सवाल उठाया कि लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने अपने कार्यकाल के दौरान दलितों और वंचित वर्गों के लिए क्या किया। उनका कहना है कि किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति को दूसरों से सवाल करने से पहले अपने काम का हिसाब भी जनता को देना चाहिए।

‘कोटे में कोटा’ पर रुख साफ

मौजूदा विवाद का एक प्रमुख मुद्दा एससी आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण और ‘कोटे में कोटा’ है। संतोष सुमन ने अपने बयान में इस मांग को सामाजिक न्याय से जोड़ते हुए कहा कि इसका उद्देश्य किसी का अधिकार छीनना नहीं, बल्कि आरक्षण का लाभ उन वर्गों तक पहुंचाना है जो लंबे समय से अपेक्षाकृत अधिक वंचित रहे हैं।

उन्होंने स्पष्ट किया कि महादलितों के लिए पहले लागू की गई योजनाओं का स्वरूप सरकारी नौकरियों में एससी आरक्षण के भीतर अलग कोटा निर्धारित करना नहीं था। उनके अनुसार, उस समय महादलित मॉडल का मुख्य आधार लक्षित कल्याणकारी योजनाएं और विकास कार्यक्रम थे।

उन्होंने मौजूदा ‘कोटे में कोटा’ की मांग को अलग संवैधानिक और नीतिगत विषय बताया। उनका कहना है कि आरक्षण के लाभ का वितरण किस तरह हो, इस पर व्यापक चर्चा जरूरी है और इसका अंतिम उद्देश्य सामाजिक रूप से पिछड़े तथा सबसे वंचित लोगों तक अधिकारों की पहुंच सुनिश्चित करना होना चाहिए।

चिराग पासवान से क्या कहा?

संतोष सुमन ने अपने पोस्ट में बिना नाम लिए उन नेताओं पर सवाल उठाया जो इस मुद्दे पर उनसे जवाब मांग रहे हैं। उन्होंने कहा कि जनता के सामने केवल सवाल रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने राजनीतिक कार्यकाल और उपलब्धियों का हिसाब भी सार्वजनिक करना चाहिए।

उनके बयान में बार-बार हिसाब और राजनीतिक कामकाज की बात सामने आई। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि यदि उनसे महादलितों के लिए किए गए कार्यों का हिसाब मांगा जाता है तो उनकी ओर से योजनाओं और आंकड़ों के माध्यम से जवाब दिया जा सकता है। उन्होंने विरोधियों से भी इसी तरह अपने काम का विवरण जनता के सामने रखने की अपील की। हालांकि, उनके बयान में किसी नेता का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया है।

एनडीए के भीतर सियासी बहस का संकेत

आरक्षण का मुद्दा बिहार की राजनीति में लंबे समय से संवेदनशील विषय रहा है। ऐसे में एनडीए के घटक दलों से जुड़े नेताओं के बीच इस मुद्दे पर अलग-अलग बयान सामने आना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संतोष सुमन के ताजा बयान ने इस बहस को और चर्चा में ला दिया है।

एक तरफ आरक्षण के भीतर लाभ के समान वितरण की बात हो रही है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार से जोड़कर देख रहे हैं। संतोष सुमन ने अपने बयान में इसे गरीबों और सामाजिक न्याय से जुड़ा विषय बताया है।

‘कोटे में कोटा’ से पीछे हटने का संकेत नहीं

संतोष सुमन ने स्पष्ट किया कि ‘कोटे में कोटा’ की मांग से उनका संकल्प पीछे हटने वाला नहीं है। उन्होंने इसे समाज के वंचित हिस्सों तक अधिकार पहुंचाने की लड़ाई बताया। साथ ही उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष या राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है। उनका तर्क है कि संविधान में मिले अधिकारों का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण को लेकर अपनी स्थिति दोहराई।

एससी-एसटी आरक्षण में वर्गीकरण का मुद्दा बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है। संतोष सुमन के बयान ने एनडीए के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद की चर्चा को भी हवा दी है। अब देखना होगा कि चिराग पासवान या उनकी पार्टी की ओर से इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया सामने आती है। इस पूरे राजनीतिक विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि आरक्षण के लाभ का वितरण किस तरह किया जाए और सामाजिक न्याय के लक्ष्य को किस तरीके से प्रभावी बनाया जाए।

Nishkarsh Bharat

राजकुमार सिंह की रिपोर्ट

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