अंत नहीं, आरंभ का नाम है गांधी…विचित्र विडंबना, भारत ने गांधी को सबसे कम पढ़ा और जाना….

गांधी

गांधी जयंती पर पढ़िए गांधी के विचार, सत्याग्रह, अहिंसा और विश्व पर उनके प्रभाव की तथ्यपूर्ण कहानी

निष्कर्ष भारत, संवाददाता ( नई दिल्ली)। 2 अक्टूबर केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह उस व्यक्ति को याद करने का दिन है जिसने राजनीति को नैतिकता से, संघर्ष को सत्य से और विरोध को अहिंसा से जोड़ने का असाधारण प्रयोग किया। दुनिया उन्हें महात्मा गांधी के नाम से जानती है, लेकिन गांधी को केवल चश्मे, लाठी, धोती और तीन बंदरों के प्रतीक तक सीमित कर देना शायद गांधी को जानना नहीं, बल्कि गांधी की स्मृति को औपचारिकता में बदल देना है।

गांधी जयंती पर सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या हमने गांधी को वास्तव में पढ़ा है?

भारत में गांधी का नाम शायद ही किसी ने न सुना हो, लेकिन नाम जानना और विचार समझना दो अलग बातें हैं। गांधी ने स्वयं अपने जीवन को किसी अंतिम सत्य का प्रमाण नहीं बताया। उन्होंने अपने प्रयोगों, गलतियों, आत्मसंघर्ष और विचारों को सार्वजनिक किया। उनकी आत्मकथा का नाम ही है—‘सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा’। यानी गांधी अपने जीवन को भी एक प्रयोगशाला की तरह देखते थे।

गांधी को जानने का सबसे पहला रास्ता—गांधी को पढ़ना

गांधी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति ने इतना लिखा कि आज भी उनके विचारों पर दुनिया भर में शोध होता है, उन्हें भारत में अक्सर कुछ लोकप्रिय नारों और प्रसंगों के माध्यम से समझा जाता है।

गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार गांधी ने सात प्रमुख पुस्तकें लिखीं और गुजराती में भगवद्गीता का अनुवाद किया। उनके प्रमुख ग्रंथों में ‘हिन्द स्वराज’, ‘दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’, ‘सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा’, ‘रचनात्मक कार्यक्रम’, ‘आरोग्य की कुंजी’ आदि शामिल हैं।

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भारत सरकार के Collected Works of Mahatma Gandhi (CWMG) प्रोजेक्ट के तहत गांधी के उपलब्ध लेखन का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण 1956 से किया गया। आज गांधी हेरिटेज पोर्टल पर उनके जीवन, पत्रों, लेखों, भाषणों, आंदोलनों और प्रमुख पुस्तकों का विशाल डिजिटल संग्रह उपलब्ध है। इसका अर्थ यह है कि गांधी केवल इतिहास की किताब का एक अध्याय नहीं हैं। वे एक विशाल बौद्धिक संसार हैं।

गांधी का भारत: राजनीति से पहले मनुष्य

गांधी की राजनीति को समझने के लिए उनके संघर्षों को केवल ब्रिटिश शासन के विरोध के रूप में देखना अधूरा होगा। 1917 का चंपारण सत्याग्रह इसका बड़ा उदाहरण है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के डिजिटल अभिलेख के अनुसार चंपारण गांधी के नेतृत्व में भारत का पहला सत्याग्रह आंदोलन था। नील की खेती से परेशान किसानों के प्रश्न को गांधी ने केवल आर्थिक समस्या नहीं माना, बल्कि उसे न्याय और मानव गरिमा के प्रश्न में बदल दिया। और यह घटना बिहार से जुड़ी है।

चंपारण में गांधी ने जिस रास्ते को अपनाया, उसमें हथियार नहीं थे, लेकिन सत्य था; हिंसा नहीं थी, लेकिन प्रतिरोध था; सत्ता हासिल करने की लालसा नहीं थी, बल्कि अन्याय को चुनौती देने का साहस था।

यही गांधी की राजनीति की बुनियादी विशेषता थी।

गांधी का सबसे बड़ा हथियार क्या था?

गांधी के लिए सत्याग्रह केवल धरना या आंदोलन करने की तकनीक नहीं था। यह सत्य के प्रति आग्रह और अन्याय के सामने आत्मबल का प्रयोग था।

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गांधी का विश्वास था कि किसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था को बदलने के लिए केवल विरोधी को पराजित करना पर्याप्त नहीं है। संघर्ष का उद्देश्य मनुष्य को नष्ट करना नहीं, अन्याय को समाप्त करना होना चाहिए। यही कारण है कि गांधी की विचारधारा भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुँची।

अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन के महान नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने गांधी के अहिंसक प्रतिरोध को गंभीरता से पढ़ा और अपनाया। Stanford University के Martin Luther King, Jr. Research and Education Institute के अनुसार किंग ने गांधी को अपने अहिंसक सामाजिक परिवर्तन की पद्धति का “guiding light” माना। 1959 में किंग भारत आए और गांधी के सहयोगियों तथा भारतीय नेताओं से मिले।

भारत यात्रा के बाद किंग ने कहा कि अहिंसक प्रतिरोध के प्रति उनका विश्वास और गहरा हुआ। यानी गांधी का प्रयोग केवल भारत की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रहा।

गांधी भारत के थे, लेकिन उनका प्रभाव वैश्विक था

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध संघर्षों में गांधी की पद्धतियों की चर्चा हुई। Nelson Mandela से संबंधित O’Malley Archives के साक्षात्कारों में दक्षिण अफ्रीकी संघर्ष के संदर्भ में गांधी की passive resistance और civil disobedience की विरासत का उल्लेख मिलता है। हालांकि दक्षिण अफ्रीकी नेताओं और आंदोलनों ने गांधी की पद्धतियों को अलग-अलग रूपों में अपनाया—इसलिए इतिहास को केवल “गांधी की नकल” कहना उचित नहीं होगा।

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यूरोप में भी गांधी पर गंभीर विचार हुआ। नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर गांधी के प्रशंसक थे, हालांकि दोनों के बीच राष्ट्रवाद, विज्ञान, आधुनिकता और सामाजिक विकास जैसे विषयों पर गंभीर मतभेद भी थे। यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है—क्योंकि गांधी को समझना केवल उनकी प्रशंसा करना नहीं है। गांधी को पढ़ने का अर्थ उनके साथ असहमति के अधिकार को भी स्वीकार करना है।

गांधी के आलोचक भी कम महत्वपूर्ण नहीं थे

गांधी को समझने के लिए केवल गांधी के समर्थकों को पढ़ना पर्याप्त नहीं है। ब्रिटिश राजनेता विंस्टन चर्चिल गांधी के प्रबल आलोचक थे। Churchill Archives Centre के अभिलेखों में गांधी के प्रति चर्चिल की कठोर भाषा दर्ज है। गांधी ने भी 1944 में चर्चिल को पत्र लिखते हुए उनके द्वारा प्रयुक्त “naked fakir” संबोधन का उल्लेख किया और उसे अपने ढंग से स्वीकार किया। यह प्रसंग बताता है कि गांधी ब्रिटिश साम्राज्य के लिए केवल एक भारतीय नेता नहीं थे। वे औपनिवेशिक सत्ता की नैतिक वैधता को चुनौती देने वाले राजनीतिक व्यक्तित्व बन चुके थे।

गांधी और नेहरू: केवल श्रद्धा नहीं, प्रभाव भी

स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू गांधी के राजनीतिक सहयोगी और अनुयायी रहे। 1957 में गांधी पर लिखे अपने एक आलेख में नेहरू ने स्वीकार किया कि गांधी के साथ लंबे समय तक काम करने के दौरान वे उनसे गहराई से प्रभावित और निर्मित हुए। नेहरू ने गांधी के संदेश को एशिया, यूरोप और अमेरिका के लिए भी महत्वपूर्ण बताया।

इससे गांधी की एक दूसरी तस्वीर सामने आती है—वह गांधी जो केवल स्वतंत्रता आंदोलन के नेता नहीं, बल्कि एक ऐसी नैतिक-राजनीतिक बहस के केंद्र में थे जिसमें आधुनिक भारत की दिशा तय हो रही थी।

गांधी को पढ़ना इसलिए जरूरी है क्योंकि गांधी स्वयं पूर्णता का दावा नहीं करते थे शायद गांधी की सबसे आधुनिक विशेषता यही है कि उन्होंने स्वयं को अचूक नहीं माना।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने गांधी पर अपने भाषण में गांधी की आत्मालोचना और अपनी गलतियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने की क्षमता का उल्लेख किया था। किंग ने गांधी को ऐसा व्यक्ति बताया जो स्वयं को ईश्वर या अचूक व्यक्ति के रूप में स्थापित नहीं करना चाहता था। इसलिए गांधी को मूर्ति बनाकर पूजना आसान है, लेकिन गांधी को पढ़ना कठिन। क्योंकि गांधी से मिलने पर हमें अपने भीतर के प्रश्नों से भी मिलना पड़ता है।

दुनिया ने गांधी को राजनीतिक नेता से अधिक एक विचार के रूप में देखा

गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला, लेकिन उन्हें कई बार नामांकित किया गया। Nobel Prize के आधिकारिक अभिलेख में 1939 और 1947-48 की उनकी नामांकन प्रविष्टियां उपलब्ध हैं। 1948 में उनकी हत्या के बाद उन्हें मरणोपरांत पुरस्कार देने का प्रावधान नहीं था और उस वर्ष शांति पुरस्कार प्रदान नहीं किया गया।

2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2 अक्टूबर को International Day of Non-Violence घोषित किया। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यह दिन गांधी के जन्मदिन पर मनाया जाता है और इसका उद्देश्य शिक्षा तथा जन-जागरूकता के माध्यम से अहिंसा का संदेश फैलाना है।

विडंबना देखिए—गांधी के जन्मदिन को पूरी दुनिया “अहिंसा दिवस” के रूप में याद करती है, लेकिन गांधी को पढ़ने का प्रश्न आज भी भारत के सामने खड़ा है।

गांधी अंत नहीं, आरंभ क्यों हैं?

गांधी का निधन 30 जनवरी 1948 को हुआ, लेकिन गांधी का विचार वहीं समाप्त नहीं हुआ।

उनका प्रश्न आज भी जीवित है—

क्या विकास मनुष्य के बिना संभव है?

क्या राजनीति नैतिकता से अलग हो सकती है?

क्या विरोध बिना हिंसा के हो सकता है?

क्या सत्य केवल भाषण का शब्द है या जीवन की पद्धति भी?

क्या स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन है या व्यक्ति की गरिमा का विस्तार भी?

इन प्रश्नों के उत्तर गांधी को स्वीकार करने से नहीं, गांधी को पढ़ने से मिलेंगे।

इसलिए 2 अक्टूबर को केवल गांधी की तस्वीर पर माला चढ़ाना पर्याप्त नहीं है। कभी ‘हिन्द स्वराज’ खोलिए। कभी उनकी आत्मकथा पढ़िए। चंपारण के दस्तावेज देखिए। गांधी और टैगोर के मतभेद पढ़िए। नेहरू की गांधी पर टिप्पणियां पढ़िए। मार्टिन लूथर किंग के गांधी संबंधी विचार पढ़िए। गांधी के आलोचकों को भी पढ़िए।

तभी शायद गांधी एक प्रतिमा से निकलकर फिर एक जीवंत प्रश्न बनेंगे।

गांधी की हत्या 1948 में हुई थी; लेकिन गांधी का विचार आज भी समाप्त नहीं हुआ।

क्योंकि कुछ व्यक्तित्व इतिहास में समाप्त नहीं होते—वे हर पीढ़ी के सामने एक नया प्रश्न बनकर खड़े हो जाते हैं।

गांधी शायद इसी अर्थ में अंत नहीं, आरंभ का नाम हैं।

और गांधी जयंती का सबसे सार्थक उत्सव शायद यही है—

गांधी को पूजने से पहले गांधी को पढ़ा जाए, गांधी को मानने से पहले गांधी को समझा जाए और गांधी से सहमत होने से पहले गांधी से सवाल पूछा जाए।

महात्मा गांधी की जयंती पर Nishkarsh Bharat उन्हें सादर नमन करता है।

राज कुमार की रिपोर्ट