पटना में जमीन रिकॉर्ड की खुली पोल, जमाबंदी का बड़ा खेल, जानें पूरा मामला

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बिहार में जमीन रिकॉर्ड की खुली पोल, 5.33 लाख जमाबंदी में गड़बड़ी

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। बिहार में जमीन के रिकॉर्ड को दुरुस्त करने के लिए चलाए जा रहे विशेष अभियान के बीच पटना जिले के आंकड़ों ने राजस्व व्यवस्था की जटिल तस्वीर सामने रखी है। जिले के सभी 26 अंचलों में जमाबंदी रिकॉर्ड की जांच की जा रही है। इस दौरान नाम, खाता, खेसरा, प्लॉट, रकबा और लगान जैसी जानकारियों में कई तरह की विसंगतियां सामने आई हैं।

सरकार ने जमाबंदी सुधार और उत्तराधिकार नामांतरण को लेकर विशेष अभियान शुरू किया है, जो 31 अक्टूबर 2026 तक चलना है। अभियान में डिजिटाइज्ड जमाबंदी का मिलान मूल जमाबंदी पंजी की स्कैन प्रति से किया जा रहा है। रिकॉर्ड में अंतर मिलने पर उसे दुरुस्त करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

लेकिन पटना के सामने चुनौती बड़ी है। बड़ी संख्या में रिकॉर्ड में सुधार की जरूरत बताई जा रही है और ऐसे में सवाल उठ रहा है कि वर्षों से चली आ रही खामियों को निर्धारित समय सीमा में किस हद तक ठीक किया जा सकेगा।

जमीन रिकॉर्ड में 5.33 लाख जमाबंदी में खामी

पटना जिले में कुल 19,87,545 वैध जमाबंदियों में से 14,53,962 को आदर्श यानी सही स्थिति में बताया गया है। वहीं 5,33,583 जमाबंदियां इनवैलिड श्रेणी में दर्ज हैं। यह आंकड़ा बताता है कि जमीन रिकॉर्ड को पूरी तरह साफ और त्रुटिरहित बनाने की चुनौती कितनी बड़ी है।

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त्रुटिपूर्ण जमाबंदियों के मामले में पालीगंज सबसे ऊपर बताया गया है, जहां 53,081 मामले दर्ज हैं। इसके बाद बिहटा में 34,870 और पंडारक में 34,233 जमाबंदियों में गड़बड़ी बताई गई है।

यहां इनवैलिड जमाबंदी का अर्थ हर मामले में जमीन पर किसी व्यक्ति का अधिकार गलत होना नहीं है। कई बार रिकॉर्ड के डिजिटाइजेशन के दौरान मूल अभिलेख और ऑनलाइन विवरण में अंतर, अधूरी जानकारी या तकनीकी त्रुटियां भी सामने आ सकती हैं।

खाता नंबर 0 और प्लॉट नंबर 0 ने बढ़ाई चिंता

जमीन रिकॉर्ड की जांच में कुछ ऐसी प्रविष्टियां भी सामने आई हैं जिनमें खाता संख्या या प्लॉट संख्या शून्य दर्ज है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1,05,549 जमाबंदियों में खाता संख्या ‘0’ दर्ज है। वहीं 3,01,306 जमाबंदियों में प्लॉट नंबर ‘0’ दर्ज किया गया है।

शून्य खाता संख्या वाले मामलों में पंडारक 14,411 मामलों के साथ आगे बताया गया है। दूसरी ओर शून्य प्लॉट संख्या के मामले में पालीगंज में 42,770 और बिहटा में 27,438 मामले दर्ज हैं।

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ऐसी प्रविष्टियां जमीन मालिकों के लिए आगे चलकर परेशानी का कारण बन सकती हैं। खरीद-बिक्री, दाखिल-खारिज, भूमि सत्यापन या अन्य राजस्व कार्यों के दौरान रिकॉर्ड का सही होना जरूरी होता है।

जमीन की खरीद-बिक्री में क्यों आती है परेशानी?

ऑनलाइन जमाबंदी में गलत या अधूरी जानकारी होने पर जमीन मालिकों को कई बार रिकॉर्ड सुधार की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अगर विक्रेता की जमाबंदी में जमीन का विवरण ही सही तरीके से दर्ज नहीं है तो दाखिल-खारिज की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।

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बिहार सरकार के भूमि पोर्टल पर भी नागरिकों को सलाह दी गई है कि दाखिल-खारिज से पहले विक्रेता या पूर्व जमाबंदी रैयत की ऑनलाइन जमाबंदी जांच लें। यदि जमीन का विवरण गलत है तो पहले परिमार्जन के माध्यम से सुधार कराया जाए और उसके बाद दाखिल-खारिज के लिए आवेदन किया जाए। यही वजह है कि जमीन रिकॉर्ड में छोटी दिखने वाली गलती भी बाद में बड़ी कानूनी या प्रशासनिक परेशानी का कारण बन सकती है।

सरकारी जमीन के रिकॉर्ड ने भी बढ़ाई चिंता

जांच के दौरान सरकारी जमीन से जुड़े रिकॉर्ड भी विशेष निगरानी में हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पटना जिले के 26 अंचलों में 24,087 सरकारी जमीनों की जमाबंदी निजी व्यक्तियों यानी रैयतों के नाम दर्ज बताई गई है।

इसके उलट शुद्ध सरकारी जमीन के नाम से केवल 802 जमाबंदियां दर्ज होने की बात कही गई है। इस अंतर ने राजस्व विभाग के सामने रिकॉर्ड की वास्तविक स्थिति की जांच को महत्वपूर्ण बना दिया है।

मसौढ़ी में 2,336, फतुहा में 2,156, खुशरूपुर में 1,865, पुनपुन में 1,775 और बाढ़ में 1,384 ऐसी प्रविष्टियां बताई गई हैं, जिनमें सरकारी जमीन की जमाबंदी रैयतों के नाम दर्ज है।

हालांकि, किसी जमीन की सरकारी श्रेणी में दर्ज होने और किसी व्यक्ति के नाम जमाबंदी होने के बीच का मामला सीधे तौर पर अवैध साबित नहीं करता। राजस्व विभाग ने भी स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में मूल दस्तावेजों की जांच जरूरी है।

सरकारी जमीन की जमाबंदी पर होगी दस्तावेजी जांच

राजस्व विभाग के निर्देश के अनुसार सरकारी जमीन से जुड़ी जमाबंदियों की जांच में खतियान, सरकारी भूमि पंजी, बंदोबस्ती, रैयतीकरण, पट्टा आदेश, पूर्व राजस्व आदेश और न्यायालयीय आदेश जैसे दस्तावेजों को देखा जाएगा। केवल जमीन की श्रेणी देखकर किसी जमाबंदी को स्वत: अवैध नहीं माना जाएगा।

अगर जांच में यह सामने आता है कि किसी जमाबंदी का निर्माण कानून या लागू निर्देशों के खिलाफ हुआ है, तभी सक्षम स्तर पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। संबंधित पक्ष को अपने दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत करने तथा सुनवाई का अवसर भी दिया जाएगा।

यानी सरकार का अभियान केवल रिकॉर्ड हटाने या नाम काटने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य पुराने दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड का मिलान करके वास्तविक स्थिति सामने लाना है।

जमीन रिकॉर्ड सुधार के लिए क्या कर सकते हैं लोग?

अगर किसी जमीन मालिक को अपनी ऑनलाइन जमाबंदी में नाम, पिता का नाम, खाता, खेसरा, रकबा या लगान से संबंधित गलती दिखाई देती है तो वह सुधार की प्रक्रिया अपना सकता है। बिहार भूमि विभाग के परिमार्जन प्लस पोर्टल पर डिजिटाइज्ड जमाबंदी में सुधार के लिए ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध है।

बिहार भूमि पोर्टल पर जमाबंदी को नाम, खाता नंबर, प्लॉट नंबर और जमाबंदी संख्या सहित अलग-अलग माध्यमों से खोजने की सुविधा उपलब्ध है। इससे जमीन मालिक अपने रिकॉर्ड की प्राथमिक जांच खुद भी कर सकते हैं।

विशेष अभियान में जमीन की मापी भी राहत वाली प्रक्रिया के तहत कराई जा सकती है। विभाग के मुताबिक, जरूरत पड़ने पर विशेष सर्वेक्षण अमीनों की सहायता से मापी कराई जाएगी और अभियान के दौरान इसके लिए आवेदन और मापी शुल्क नहीं लिया जाएगा।

बिचौलियों की भूमिका पर भी नजर

जमीन के रिकॉर्ड में सुधार की प्रक्रिया जटिल होने के कारण कई जगह बिचौलियों की भूमिका को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। रिकॉर्ड की गलती सुधारने, नामांतरण कराने या दस्तावेजों का सत्यापन कराने के नाम पर अनावश्यक पैसे मांगने जैसी स्थिति से बचने के लिए लोगों को आधिकारिक पोर्टल और संबंधित अंचल कार्यालय की निर्धारित प्रक्रिया का इस्तेमाल करना चाहिए।

विभाग ने अभियान की निगरानी के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की है। अंचल अधिकारी को दैनिक प्रगति रिपोर्ट देनी है और उच्च अधिकारी नियमित समीक्षा करेंगे। गुणवत्ता जांच के लिए अलग-अलग स्तर पर मामलों का रैंडम सत्यापन भी किया जाना है।

31 अक्टूबर तक कितनी बदलेगी जमीन की तस्वीर?

अब सबसे बड़ी परीक्षा अभियान की समय सीमा है। 15 सितंबर से शुरू हुए इस विशेष अभियान को 31 अक्टूबर तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इतने कम समय में लाखों रिकॉर्ड की जांच, मूल दस्तावेजों से मिलान, आपत्तियों की सुनवाई और आवश्यक सुधार करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है।

राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग का जोर इस बात पर है कि रिकॉर्ड केवल ऑनलाइन दिखाई देने लायक नहीं, बल्कि वास्तविक दस्तावेजों से भी मेल खाता हो। सरकारी जमीन से जुड़ी संदिग्ध प्रविष्टियों में भी जल्दबाजी के बजाय दस्तावेजी जांच को प्राथमिकता देने का निर्देश है।

आखिर जमीन मालिकों के लिए इसका क्या मतलब?

पटना के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि जमीन रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने के बाद भी रिकॉर्ड की शुद्धता अपने आप सुनिश्चित नहीं होती। पुरानी प्रविष्टियां, डिजिटाइजेशन की त्रुटियां, अधूरी जानकारी और वास्तविक स्थिति से रिकॉर्ड का अंतर अब प्रशासन के सामने प्रमुख चुनौती है।

अगर अभियान सही तरीके से लागू होता है तो जमीन मालिकों को भविष्य में दाखिल-खारिज, लगान, खरीद-बिक्री और रिकॉर्ड सत्यापन से जुड़ी परेशानियों में राहत मिल सकती है। वहीं सरकारी जमीन से जुड़ी गलत प्रविष्टियों की जांच से सरकारी संपत्ति के रिकॉर्ड को भी अधिक स्पष्ट बनाया जा सकता है।

फिलहाल 31 अक्टूबर की समय सीमा पर सबकी नजर है। असली सवाल यही है कि पटना के लाखों रिकॉर्ड में दर्ज इन खामियों में से कितनों का समाधान तय समय में दस्तावेजी और कानूनी प्रक्रिया के साथ हो पाता है।

Nishkarsh Bharat

राज कुमार की रिपोर्ट

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