पटना में फिर गूंजेगी चरखे की घर्र-घर्र, 25 महिलाओं को मिलेगा प्रशिक्षण; जानिए प्रभावती देवी की विरासत
पटना की महिला चरखा समिति में नई शुरुआत
निष्कर्ष भारत संवाददाता- पटना के कदमकुआं स्थित महिला चरखा समिति में एक बार फिर चरखे की घर्र-घर्र सुनाई देने की तैयारी है। कभी महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन और महिला आत्मनिर्भरता से जुड़ा यह परिसर अब महिलाओं को चरखा चलाने का प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। समिति की ओर से चरखा प्रशिक्षण शुरू करने के लिए भारत सरकार के खादी बोर्ड में पंजीकरण को लेकर पत्र भेजा गया है। योजना के तहत शुरुआती चरण में 11 नए चरखे लगाए जाएंगे और 25 महिलाओं को प्रशिक्षण देने की तैयारी है।
इस पहल का उद्देश्य केवल पुरानी परंपरा को दोबारा शुरू करना नहीं, बल्कि महिलाओं को हुनर सिखाकर उनकी आजीविका के अवसर बढ़ाना भी है। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं के हाथों से तैयार सूत और कपड़े को बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था करने पर भी काम किया जा रहा है। इसके लिए बिहार खादी माल से बातचीत की गई है।
86 साल पुरानी विरासत को फिर मिलेगी नई पहचान
महिला चरखा समिति का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन और महिला सशक्तीकरण से जुड़ा है। समिति के अनुसार, लोकनायक जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी ने महात्मा गांधी के आशीर्वाद और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के मार्गदर्शन में 26 जून 1940 को ‘बिहार महिला चरखा क्लास’ की स्थापना की थी।
उस दौर में महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलना आसान नहीं था। पर्दा प्रथा और सामाजिक बंदिशों के बीच चरखा सीखना महिलाओं के लिए अपनी क्षमता पहचानने और आत्मनिर्भर बनने का माध्यम बना। यहां महिलाएं सूत कातने का हुनर सीखती थीं और समूह में काम करके सामाजिक गतिविधियों से भी जुड़ती थीं।
समय के साथ महिला चरखा समिति की गतिविधियां प्रभावित हुईं और यहां चरखा चलना बंद हो गया। अब नए प्रशिक्षण कार्यक्रम के जरिए इस ऐतिहासिक परंपरा को फिर से आगे बढ़ाने की तैयारी है।
11 चरखों से होगी शुरुआत, 25 महिलाओं को प्रशिक्षण
महिला चरखा समिति की सचिव मृदुला सिन्हा के मुताबिक, चरखा प्रशिक्षण को दोबारा शुरू करने के लिए खादी बोर्ड में पंजीकरण की प्रक्रिया के संबंध में पत्र भेजा गया है। योजना के शुरुआती चरण में 11 नए चरखे लगाए जाएंगे और 25 महिलाओं को प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है।
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प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को चरखा चलाने और सूत तैयार करने की जानकारी दी जाएगी। इसके बाद तैयार सूत और कपड़े की बिक्री के लिए बाजार से जोड़ने की कोशिश होगी। बिहार खादी माल के साथ हुई बातचीत को इसी दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
इस पहल से महिलाओं को पारंपरिक कौशल सीखने के साथ रोजगार का अवसर मिलने की उम्मीद है। हालांकि, प्रशिक्षण शुरू होने की अंतिम तारीख और बाजार से जुड़ी व्यवस्था की विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है।
भारत छोड़ो आंदोलन में भी महिलाओं ने निभाई थी भूमिका
महिला चरखा समिति का महत्व सूत कातने तक सीमित नहीं रहा। इसकी स्थापना ऐसे समय में हुई थी, जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो रहा था और महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही थी।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान चरखा क्लास से जुड़ी महिलाओं ने भी भागीदारी निभाई। चरखे ने उन्हें एक ओर स्वदेशी और स्वावलंबन के विचार से जोड़ा, वहीं दूसरी ओर सामाजिक सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय गतिविधियों में शामिल होने का अवसर दिया।
महात्मा गांधी के स्वदेशी विचार में स्थानीय स्तर पर उत्पादन और अपने श्रम के महत्व पर जोर दिया गया था। चरखा इसी विचार का प्रतीक बना। कदमकुआं की महिला चरखा समिति ने इस विचार को महिलाओं के प्रशिक्षण और सामूहिक काम से जोड़ने का प्रयास किया।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर जेपी तक का रहा जुड़ाव
महिला चरखा समिति का संबंध देश के कई प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों और गांधीवादी नेताओं से रहा है। उपलब्ध संस्थागत जानकारी के अनुसार, डॉ. राजेंद्र प्रसाद 1940 से 1946 तक इसके संचालन मंडल के अध्यक्ष रहे। उनके दिल्ली जाने के बाद जयप्रकाश नारायण ने संस्था की जिम्मेदारी संभाली।
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आजादी के बाद 1948 में कदमकुआं में महिला चरखा समिति के लिए जमीन खरीदी गई। वर्ष 1951 में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने यहां नए भवन का उद्घाटन किया। इसके बाद 1952 में सोसाइटी एक्ट, 1860 के तहत संस्था का पंजीकरण हुआ।
1974 के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान भी कदमकुआं का यह परिसर महत्वपूर्ण रहा। प्रभावती देवी का निधन 1973 में हो गया था, लेकिन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने से जुड़ा उनका विचार समिति की पहचान का अहम हिस्सा बना रहा।
चरखे के साथ कुटीर उद्योगों को भी बढ़ावा
महिला चरखा समिति की गतिविधियां समय के साथ कुटीर उद्योगों तक भी पहुंचीं। यहां महिलाओं को अचार, पापड़, सत्तू और अन्य घरेलू उत्पाद तैयार करने जैसे कामों से जोड़ने की पहल की गई। इसका उद्देश्य महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर उनकी बनाई सामग्री की बिक्री के जरिए आय के अवसर उपलब्ध कराना है।
महिला चरखा समिति के पुराने और जर्जर भवन की जगह नया भवन तैयार किया गया है। यहां महिलाओं को घरेलू उत्पादों से जुड़े प्रशिक्षण देने और उनके बनाए सामान की बिक्री की व्यवस्था विकसित की जा रही है।
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इस तरह चरखा प्रशिक्षण की नई योजना समिति की पुरानी विरासत को आधुनिक आजीविका के अवसरों से जोड़ने की कोशिश है।
जेपी और प्रभावती देवी की स्मृतियों से जुड़ा परिसर
कदमकुआं स्थित यह परिसर प्रभावती देवी के साथ-साथ जयप्रकाश नारायण की स्मृतियों के लिए भी जाना जाता है। यहां जेपी के जीवन से जुड़े कक्ष और स्मृति स्थल मौजूद हैं। वर्ष 1974 के आंदोलन के दौरान उनका निवास राजनीतिक विचार-विमर्श और गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना था। इसी आवास में 8 अक्टूबर 1979 को जेपी का निधन हुआ था।
अब महिला चरखा समिति में चरखा प्रशिक्षण फिर शुरू करने की योजना अतीत की यादों को वर्तमान की जरूरतों से जोड़ती है। अगर यह पहल निर्धारित योजना के अनुसार आगे बढ़ती है, तो महिलाओं को पारंपरिक हुनर सीखने और उससे आजीविका कमाने का अवसर मिल सकता है।
पटना के कदमकुआं में चरखे की वापसी इसलिए खास है, क्योंकि यह केवल एक पुराने उपकरण को फिर चलाने की कोशिश नहीं, बल्कि स्वदेशी, महिला सशक्तीकरण और आत्मनिर्भरता के विचार को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल भी है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
