दिल्ली हाईकोर्ट में नेहा बोरा के बयान से बवाल, CJP प्रदर्शन से किया किनारा, जानें ऐसा हुआ क्यों….
नेहा बोरा ने CJP प्रदर्शन से किया किनारा, हाईकोर्ट में सुनवाई
निष्कर्ष भारत, संवाददाता (नई दिल्ली)। दिल्ली हाईकोर्ट में छात्र नेता नेहा बोरा की याचिका पर सुनवाई के दौरान कनॉट प्लेस में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से बुलाए गए प्रदर्शन को लेकर अहम बयान सामने आया। वामपंथी छात्र संगठन AISA से जुड़ी नेहा बोरा ने अदालत में अपनी ओर से रखे गए पक्ष के जरिए स्पष्ट किया कि वह कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में आयोजित अलग प्रदर्शन से जुड़ी नहीं थीं। उनके वकील ने कहा कि नेहा बोरा मंडी हाउस में अपने संगठन के आह्वान पर आयोजित कार्यक्रम से संबंधित थीं।
मामला दिल्ली पुलिस की ओर से जारी नोटिस को चुनौती देने वाली नेहा बोरा की याचिका से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान उनके वकील ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों और कार्यकारी मजिस्ट्रेट की भूमिका पर सवाल उठाए। बचाव पक्ष का कहना था कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में कानूनी शर्तों का पालन नहीं किया गया और संबंधित अधिकारी ने स्वतंत्र रूप से अपनी राय नहीं बनाई।
अदालत ने सुनवाई के दौरान मजिस्ट्रेट के विवेकाधिकार और न्यायिक समीक्षा की सीमा पर भी सवाल किए। ऐसे में इस मामले में एक तरफ प्रदर्शन से जुड़ाव को लेकर नेहा बोरा का पक्ष चर्चा में है, तो दूसरी तरफ पुलिस की कार्रवाई की वैधानिकता पर कानूनी बहस जारी है।
नेहा बोरा ने CJP के प्रदर्शन से क्यों बनाई दूरी?
दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान नेहा बोरा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने स्पष्ट किया कि उनकी मुवक्किल कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में CJP की ओर से बुलाए गए प्रदर्शन में शामिल नहीं थीं। वकील ने कहा कि यह एक अलग संगठन का आह्वान था और नेहा बोरा का उससे संबंध नहीं था।
उन्होंने अदालत को बताया कि नेहा बोरा मंडी हाउस में अपने अलग आह्वान के तहत आयोजित कार्यक्रम से जुड़ी थीं। इस स्पष्टीकरण का उद्देश्य दोनों आयोजनों के बीच अंतर स्पष्ट करना था, ताकि नेहा बोरा की भूमिका को किसी दूसरे संगठन के कार्यक्रम से जोड़कर न देखा जाए।
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यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि याचिका दिल्ली पुलिस के नोटिस को चुनौती देने से संबंधित है और सुनवाई में प्रदर्शन से जुड़े तथ्यों का संदर्भ सामने आया। हालांकि, किसी प्रदर्शन से जुड़ाव या उससे दूरी का अंतिम कानूनी महत्व मामले के तथ्यों और अदालत के सामने रखे गए रिकॉर्ड पर निर्भर करेगा।
दिल्ली हाईकोर्ट में नेहा बोरा की याचिका पर क्या सुनवाई हुई?
नेहा बोरा ने दिल्ली पुलिस की ओर से जारी नोटिस को चुनौती दी है। उनके वकील ने अदालत में दलील दी कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 के तहत कार्रवाई करने के लिए जिस जानकारी पर भरोसा किया गया, उसकी संबंधित पूछताछ के दौरान जांच होनी चाहिए।
वकील ने कहा कि BNSS की धारा 126 और धारा 130 सहित प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में संबंधित कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना जरूरी है। उनके मुताबिक, कानूनी प्रक्रिया में पारदर्शिता और उचित आधार का होना आवश्यक है।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। वकील ने इसे असंवैधानिक और कानून की दृष्टि से गलत बताया। हालांकि, ये याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में रखी गई दलीलें हैं। इन पर अंतिम निर्णय अदालत को संबंधित कानून और रिकॉर्ड के आधार पर करना है।
BNSS की धारा 126 और 130 पर क्या है विवाद?
सुनवाई के दौरान BNSS की धारा 126 और 130 का उल्लेख करते हुए नेहा बोरा के वकील ने प्रक्रिया से जुड़े सवाल उठाए। धारा 126 आम तौर पर शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा संबंधी कार्रवाई से जुड़ी है। ऐसी कार्रवाई में संबंधित व्यक्ति से निर्धारित प्रक्रिया के तहत जवाब मांगा जा सकता है और परिस्थितियों के अनुसार आगे की कार्यवाही की जाती है।
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वकील ने दलील दी कि कार्रवाई का आधार बनने वाली जानकारी की जांच होनी चाहिए और संबंधित चरणों में कारण दर्ज किए जाने चाहिए। उन्होंने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1898 की धारा 107 का भी उल्लेख किया।
बचाव पक्ष का तर्क था कि कारण बताओ नोटिस जारी करने के चरण में ही मुचलका भरने की मांग करना उचित नहीं है। इस मुद्दे पर अदालत के सामने कानूनी प्रावधानों की व्याख्या और उनके अनुपालन से संबंधित सवाल रखे गए।

मामले में इन दलीलों का महत्व इसलिए है क्योंकि अदालत को यह देखना है कि संबंधित प्रशासनिक कार्रवाई लागू कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप थी या नहीं। केवल किसी पक्ष की दलील के आधार पर नोटिस को अवैध नहीं माना जा सकता; इसका फैसला न्यायिक परीक्षण के बाद होगा।
नेहा बोरा के वकील ने मजिस्ट्रेट की भूमिका पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ता की एक दलील यह भी है कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने स्वतंत्र रूप से अपनी राय नहीं बनाई थी। इस पर गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि उनके अनुसार मजिस्ट्रेट ने स्वतंत्र रूप से कोई राय बनाई ही नहीं थी।
वकील ने दलील दी कि नोटिस जारी करने से पहले संबंधित अधिकारी को उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अपना विवेक इस्तेमाल करना चाहिए था। बचाव पक्ष का आरोप है कि ऐसा नहीं किया गया और इसी वजह से कार्रवाई की वैधानिकता पर सवाल उठते हैं।
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दूसरी ओर, अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक से संतुष्टि बनाई या नहीं, इसकी जांच करने की न्यायालय की शक्ति सीमित है। इस टिप्पणी के साथ सुनवाई में न्यायिक समीक्षा की सीमा का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया।
अदालत की यह टिप्पणी अपने आप में याचिका पर अंतिम फैसला नहीं है। मामले में आगे की सुनवाई के दौरान यह देखा जाएगा कि याचिकाकर्ता की दलीलों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप का आधार बनता है या नहीं।
दिल्ली हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई का केंद्र क्या है?
नेहा बोरा की याचिका में मुख्य सवाल दिल्ली पुलिस के नोटिस और उसे जारी करने की प्रक्रिया की वैधानिकता से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया है कि संबंधित कार्रवाई पर्याप्त कानूनी आधार के बिना की गई और प्रक्रिया में जरूरी शर्तों का पालन नहीं हुआ।
इस मामले में अदालत के सामने यह भी प्रश्न है कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अपने स्तर पर उपलब्ध तथ्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन किया था या नहीं। साथ ही, पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देने के लिए अदालत किस सीमा तक हस्तक्षेप कर सकती है, यह भी कानूनी बहस का हिस्सा है।
ऐसे मामलों में नोटिस जारी होना अपने आप में किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं होता। अदालत को संबंधित दस्तावेजों, कानूनी प्रावधानों और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर निर्णय लेना होता है।
नेहा बोरा की ओर से पेश वकील ने नोटिस को असंवैधानिक और कानूनी रूप से गलत बताते हुए उसे चुनौती दी है। अब मामले की दिशा अदालत के सामने रखे गए तथ्यों और आगे की सुनवाई पर निर्भर करेगी।
नेहा बोरा मामले में आगे क्या होगा?
दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान दो प्रमुख पहलू सामने आए हैं। पहला, नेहा बोरा की ओर से कनॉट प्लेस के CJP प्रदर्शन से अलग होने का स्पष्टीकरण। दूसरा, दिल्ली पुलिस के नोटिस को चुनौती देने के लिए BNSS के प्रावधानों और स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की भूमिका पर उठाए गए सवाल।
आगे की सुनवाई में अदालत यह देख सकती है कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में संबंधित कानूनी प्रावधानों का पालन हुआ या नहीं और याचिकाकर्ता की दलीलों के आधार पर किस तरह की राहत पर विचार किया जा सकता है।
फिलहाल, नेहा बोरा की याचिका पर अंतिम निर्णय सामने आने तक पुलिस की कार्रवाई को लेकर उठाए गए सवालों को याचिकाकर्ता का पक्ष ही माना जाएगा। अदालत का अंतिम रुख मामले के कानूनी पहलुओं और उपलब्ध रिकॉर्ड के मूल्यांकन के बाद स्पष्ट होगा।
राज कुमार की रिपोर्ट
