पुलिस का नया फरमान! फोटो पर रोक, लेकिन अविनाश तिवारी पर मेहरबानी क्यों…..

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पुलिस का नया फरमान! फोटो पर रोक, लेकिन अविनाश तिवारी पर मेहरबानी क्यों.....

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। बिहार पुलिस मुख्यालय से एक बार फिर सख्त संदेश जारी हुआ है। डीजीपी विनय कुमार के निर्देश के बाद अब पुलिस अधिकारियों और जवानों को आम लोगों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और मीडिया कर्मियों के साथ सेल्फी या फोटो खिंचवाने से बचने को कहा गया है। इस आदेश को पुलिस की पेशेवर छवि, अनुशासन और निष्पक्षता से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन इसी बीच पटना के पुलिस महकमे से जुड़ा एक सवाल चर्चा में है—जब नियम इतने सख्त हैं, तो क्या इनका पालन हर व्यक्ति के लिए एक जैसा होता है?

पुलिस मुख्यालय का आदेश साफ संदेश देता है कि वर्दी में तैनात अधिकारी और जवान अपनी भूमिका को लेकर सतर्क रहें। किसी व्यक्ति के साथ अनावश्यक नजदीकी या ऐसी तस्वीर जो पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करे, उससे बचा जाए। आदेश के तहत क्षेत्रीय आईजी, डीआईजी और जिलों के एसपी को निर्देश भेजे जाने की बात सामने आई है। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या यह अनुशासन केवल कैमरे के सामने लागू होगा या थाने के भीतर भी इसकी बराबर निगरानी होगी?

सेल्फी पर रोक, लेकिन थाने के भीतर व्यवस्था का क्या?

बिहार पुलिस के लिए सेल्फी का मामला भले ही छोटा दिखे, लेकिन इसके पीछे पुलिस की छवि और निष्पक्षता का बड़ा सवाल छिपा है। आम नागरिक जब किसी थाने में जाता है, तो उसकी अपेक्षा होती है कि वहां नियम-कानून के अनुसार काम होगा। किसी की पहचान, जान-पहचान या कथित प्रभाव के आधार पर व्यवहार नहीं बदलेगा। लेकिन यदि किसी व्यक्ति की थाने में लगातार मौजूदगी और अधिकारियों तक उसकी पहुंच को लेकर सवाल उठते हैं, तो पुलिस प्रशासन को उसका जवाब देना चाहिए।

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अविनाश तिवारी नाम के व्यक्ति को लेकर सवाल उठाया गया है। दावा है कि वह दिन-रात कभी भी थाना परिसर में दिखाई दे सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि कुछ लोग अधिकारियों से मुलाकात या पैरवी के लिए उसके संपर्क की चर्चा करते हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। लेकिन यदि ऐसा कोई व्यक्ति नियमित रूप से थाने में आता-जाता है, तो यह जानना जरूरी होगा कि उसकी आधिकारिक भूमिका क्या है और उसे परिसर में आने की अनुमति किस आधार पर मिलती है।

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व्यंग्य का सवाल यही है कि पुलिस मुख्यालय को सेल्फी से पुलिस की छवि बिगड़ने का डर है, लेकिन यदि किसी बाहरी व्यक्ति की थाने में कथित सक्रियता को लेकर सवाल उठें तो उस पर जवाब कौन देगा? कैमरे के सामने खड़े होने से परहेज करने का आदेश अपनी जगह है, मगर थाने की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता उससे भी बड़ी जरूरत है।

डीजीपी का आदेश और थाने की वास्तविकता

डीजीपी विनय कुमार ने कथित तौर पर पहले भी थाना परिसरों में अनावश्यक आवाजाही को लेकर सख्ती की बात कही थी। थाने का परिसर पुलिस का कार्यस्थल है, कोई सार्वजनिक बैठक स्थल या निजी मुलाकात का केंद्र नहीं। यहां शिकायतकर्ता, आरोपी, गवाह, पुलिसकर्मी और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े लोग आते हैं। ऐसे में किसी बाहरी व्यक्ति की अनियंत्रित आवाजाही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अगर किसी व्यक्ति को पुलिस अधिकारियों से मिलने के लिए विशेष सुविधा मिल रही है, तो उसका आधार स्पष्ट होना चाहिए। क्या वह किसी अधिकृत समिति का सदस्य है? क्या वह किसी सरकारी जिम्मेदारी के तहत वहां आता है? क्या उसे किसी विशेष काम के लिए अधिकृत किया गया है? यदि ऐसा है तो पुलिस प्रशासन को यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। और यदि कोई औपचारिक भूमिका नहीं है, तो सामान्य नियम उसके लिए भी लागू होने चाहिए।

पैरवी की चर्चा, पुलिस की निष्पक्षता की परीक्षा

पुलिस का काम शिकायत सुनना, जांच करना और कानून के अनुसार कार्रवाई करना है। किसी नागरिक को यह भरोसा होना चाहिए कि उसकी बात सुनी जाएगी, चाहे उसके पास किसी अधिकारी का परिचय हो या न हो। यदि किसी व्यक्ति के माध्यम से साहब तक पहुंचने या किसी काम को आगे बढ़वाने की चर्चा होती है, तो पुलिस को ऐसी धारणाओं का समाधान करना चाहिए।

यहां किसी व्यक्ति पर गैरकानूनी काम कराने का आरोप सिद्ध नहीं है। लेकिन पुलिस विभाग के लिए यह जरूरी है कि वह बताए कि बाहरी लोगों की थानों में मौजूदगी के नियम क्या हैं और उनका पालन कैसे कराया जाता है। पुलिस की प्रतिष्ठा केवल आदेश जारी करने से नहीं, बल्कि आदेशों को समान रूप से लागू करने से बनती है।

निष्कर्ष भारत का सवाल: नियम सबके लिए एक जैसे क्यों नहीं?

पुलिस मुख्यालय का आदेश तभी प्रभावी माना जाएगा जब वह हर स्तर पर दिखाई दे। जवान से लेकर बड़े अधिकारी तक, सभी के लिए एक ही अनुशासन होना चाहिए। यदि सेल्फी लेने पर रोक है तो उसका पालन हो, और यदि थाना परिसर में अनावश्यक आवाजाही पर रोक है तो उसकी निगरानी भी हो।

अविनाश तिवारी को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब किसी व्यंग्य, अफवाह या सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं, बल्कि आधिकारिक स्पष्टीकरण से मिलना चाहिए। पुलिस प्रशासन यह बताए कि उनकी थानों में कथित मौजूदगी का आधार क्या है, उनकी कोई अधिकृत भूमिका है या नहीं और बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश का रिकॉर्ड कैसे रखा जाता है।

आखिर पुलिस की वर्दी किसी व्यक्ति की निजी पहुंच का प्रमाणपत्र नहीं हो सकती। कानून की नजर में हर नागरिक बराबर है। इसलिए सवाल सेल्फी का नहीं, समान नियम और जवाबदेही का है। आदेश जारी करने के बाद अब असली परीक्षा उसके पालन की है।

Nishkarsh Bharat

पटना से रिपोर्ट

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