त्योहारों पर भी छुट्टी नहीं! 15 साल से नौकरी पक्की होने का इंतजार, सफाईकर्मी का दर्द छलका
पटना नगर निगम के सफाईकर्मी 15 साल से स्थायी नौकरी का इंतजार कर रहे हैं। दिवाली-छठ पर भी ड्यूटी और समय पर वेतन नहीं मिलने से परेशान हैं।
निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। पटना में जब पूरा शहर दशहरा, दिवाली और छठ जैसे त्योहारों की खुशियां मनाने में व्यस्त रहता है, तब सफाईकर्मी अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए सड़कों पर उतरते हैं। सुबह की पहली किरण निकलने से पहले ही इनकी दिनचर्या शुरू हो जाती है। घरों से कचरा उठाना, सड़कों की सफाई करना और शहर को स्वच्छ बनाए रखना इनके रोजमर्रा के काम का हिस्सा है। त्योहारों के दिन भी इनके लिए आम दिनों की तरह ही होते हैं। परिवार के साथ समय बिताने और पर्व मनाने की इच्छा के बावजूद इन्हें काम पर निकलना पड़ता है।
विडंबना यह है कि शहर की सफाई व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले इन कर्मचारियों को खुद आर्थिक परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। किसी को 15 साल से नौकरी स्थायी होने का इंतजार है तो कोई आठ साल से दिवाली पर छुट्टी नहीं ले पाया है। समय पर वेतन नहीं मिलने के कारण बच्चों की स्कूल फीस, घर का राशन और रोजमर्रा के खर्च पूरे करना भी मुश्किल हो जाता है। इसके बावजूद इनका कहना है कि शहर को साफ रखना उनकी जिम्मेदारी है और वे इसे पूरी ईमानदारी से निभाते रहेंगे।
त्योहारों पर भी काम, 15 साल से स्थायीकरण का इंतजार
नगर निगम में सफाईकर्मी के रूप में काम करने वाले लुच्चू राम का दर्द उन हजारों कर्मचारियों की परेशानी को सामने लाता है, जो वर्षों से अस्थायी व्यवस्था में काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि दशहरा, दिवाली और छठ जैसे बड़े त्योहारों पर भी उन्हें छुट्टी नहीं मिलती। पिछले 15 साल से वह सफाई का काम कर रहे हैं और हर दिन सुबह पांच बजे काम पर पहुंच जाते हैं।
लुच्चू राम बताते हैं कि दूसरे लोगों के घरों का कचरा उठाना और शहर की गंदगी साफ करना आसान काम नहीं है। इसे वह बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण काम बताते हैं। इतने वर्षों तक काम करने के बाद भी नौकरी स्थायी नहीं हुई है। उन्हें इस बात का मलाल है कि पता नहीं कब उनका स्थायीकरण होगा।
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उनके मुताबिक, ऐसा लगता है कि जब तक कर्मचारी काम करते-करते थककर मर नहीं जाएंगे, तब तक उन्हें स्थायी नौकरी नहीं मिलेगी। उनकी यह बात वर्षों से नियमितीकरण की उम्मीद लगाए बैठे सफाईकर्मियों की बेबसी को बयां करती है।
बच्चों को अफसर बनाने का सपना, खुद कूड़ा उठाने को मजबूर
सफाईकर्मियों के लिए सबसे बड़ी उम्मीद उनके बच्चे हैं। एक अन्य कर्मचारी का कहना है कि वह खुद सफाई का काम इसलिए करते हैं, ताकि उनके बच्चे पढ़-लिखकर अफसर बन सकें। वह नहीं चाहते कि आने वाली पीढ़ी भी उसी तरह कूड़ा-कचरा उठाने के लिए मजबूर हो, जिस तरह उन्हें अपनी जिंदगी गुजारनी पड़ रही है।
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उनका कहना है कि वह रोज काम करते हैं और दिवाली पर भी छुट्टी नहीं लेते। शहर की सफाई बनी रहे, यही उनकी प्राथमिकता है। वह अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं, ताकि उनका भविष्य मौजूदा परिस्थितियों से अलग हो सके।
दरअसल, कम आमदनी और अनिश्चित नौकरी के बीच बच्चों की पढ़ाई को जारी रखना इन परिवारों के लिए बड़ी चुनौती है। फिर भी माता-पिता अपनी जरूरतों में कटौती कर बच्चों के सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।
त्योहारों पर भी ड्यूटी, 60 साल की उम्र में बीमार होकर कर रहे काम
सफाईकर्मी बिरजू की परेशानी भी कम नहीं है। उनकी उम्र 60 साल से अधिक हो चुकी है और तबीयत भी ठीक नहीं रहती। इसके बावजूद वह काम पर पहुंचते हैं। उनका कहना है कि वह चाहते हैं कि लक्ष्मी जी का आगमन हो और उनका शहर भी खुशहाल रहे।
बिरजू मानते हैं कि अपनी जिम्मेदारी निभाकर शहर की सफाई करना जरूरी है। उन्हें काम से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन समय पर वेतन नहीं मिलने से परिवार चलाना मुश्किल हो जाता है।
वह बताते हैं कि घर के लोग अक्सर उनसे कहते हैं कि जब इतने पैसों में परिवार का पेट ही नहीं भरता तो काम छोड़ क्यों नहीं देते। लेकिन इतने वर्षों तक काम करने के बाद अब दूसरी नौकरी तलाशना भी आसान नहीं है।
कई बार आर्थिक स्थिति ऐसी हो जाती है कि परिवार को नमक-रोटी खाकर गुजारा करना पड़ता है। बिरजू की परेशानी सिर्फ कम वेतन तक सीमित नहीं है, बल्कि नियमित आमदनी नहीं होने से परिवार का भविष्य भी अनिश्चित बना रहता है।
आठ साल से दिवाली पर छुट्टी नहीं, घर पहुंचने में होती है देरी
पटना नगर निगम की सफाईकर्मी गुड़िया देवी भी लंबे समय से इसी परेशानी का सामना कर रही हैं। उनका कहना है कि पिछले आठ साल से उन्हें दिवाली पर छुट्टी नहीं मिली है। काम के दबाव के कारण कई बार घर पहुंचने में देर हो जाती है। इस पर परिवार के लोग भी सवाल करते हैं कि आखिर इतनी देर क्यों होती है।

गुड़िया देवी का कहना है कि जितना काम करती हैं, उसके हिसाब से पैसे नहीं मिलते। जो वेतन मिलता है, वह भी समय पर नहीं आता। इसके बावजूद उन्हें काम करना पड़ता है, क्योंकि उनके बच्चे पढ़ना-लिखना चाहते हैं।
उनके लिए नौकरी छोड़ना आसान नहीं है। बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जिम्मेदारियां उन्हें लगातार काम करने के लिए मजबूर करती हैं। त्योहारों के दौरान भी उनकी प्राथमिकता शहर की सफाई और परिवार का खर्च चलाना ही रहता है।
बख्तियारपुर से रोज पटना आते हैं पप्पू महतो
सफाईकर्मी पप्पू महतो पिछले 10 साल से इस काम में लगे हुए हैं। वह रोज बख्तियारपुर से पटना आते हैं और सुबह करीब 3:30 बजे घर से निकल जाते हैं। इतनी सुबह घर छोड़ने के बाद उनका पूरा दिन शहर की सफाई में गुजरता है।
पप्पू महतो का कहना है कि दिवाली पर वह खुद छुट्टी नहीं लेते, क्योंकि शहर को साफ रखना उनकी जिम्मेदारी है। उनके घरवाले अक्सर पूछते हैं कि इतनी कम कमाई वाली नौकरी आखिर क्यों कर रहे हैं। इस पर वह परिवार को समझाते हैं कि शहर की सफाई भी जरूरी काम है और इसे कोई तो करेगा।
उनकी दिनचर्या बताती है कि सफाईकर्मियों की जिम्मेदारी सिर्फ काम के घंटों तक सीमित नहीं रहती। लंबी दूरी तय करना, सुबह अंधेरे में घर से निकलना और त्योहारों पर भी ड्यूटी करना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।
बच्चों की फीस नहीं भर पाने पर बेबस महसूस करते हैं रोशन
सफाईकर्मी रोशन कुमार वर्ष 2010 से पटना नगर निगम में काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि वह पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं, लेकिन समय पर वेतन नहीं मिलने से परिवार को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
कभी बच्चों की स्कूल फीस अधूरी रह जाती है तो कभी घर में राशन खरीदने के पैसे नहीं बचते। रोशन बताते हैं कि जब बच्चे स्कूल से आकर फीस जमा करने की बात कहते हैं तो एक पिता होने के बावजूद वह खुद को बेबस महसूस करते हैं।
त्योहारों पर भी वह छुट्टी नहीं लेते, क्योंकि उन्हें लगता है कि शहर को साफ रखना उनकी जिम्मेदारी है। हालांकि, उनकी इच्छा है कि मेहनत के बदले उन्हें समय पर वेतन मिले, ताकि परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें।
शहर की सफाई करने वालों की जिंदगी में कब आएगी खुशहाली?
पटना में त्योहारों के दौरान सफाई व्यवस्था बनाए रखना नगर निगम के लिए बड़ी जिम्मेदारी होती है। सड़कों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई के लिए कर्मचारियों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। आम लोग जब साफ-सुथरे शहर में त्योहार मनाते हैं, तब पर्दे के पीछे इन सफाईकर्मियों की मेहनत होती है।
लेकिन सवाल यह है कि शहर को स्वच्छ रखने वाले इन कर्मचारियों की अपनी जिंदगी कब बेहतर होगी? 10 से 15 साल तक काम करने के बाद भी स्थायी नौकरी का इंतजार, वेतन में देरी और परिवार की आर्थिक परेशानियां उनके सामने बड़ी चुनौती हैं।
इन कर्मचारियों की मांग सिर्फ इतनी है कि उन्हें मेहनत के बदले समय पर वेतन मिले और वर्षों से लंबित स्थायीकरण की समस्या का समाधान हो। आखिर जो लोग दूसरों के घरों और शहर की गंदगी साफ करते हैं, उनके अपने घरों में भी खुशहाली और त्योहारों की रोशनी पहुंचनी चाहिए।
पटना से संवाददाता की रिपोर्ट
