छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती 2026: स्वराज के महानायक को राष्ट्र का नमन

छत्रपति शिवाजी महाराज

आज देशभर में हिंदवी स्वराज के संस्थापक और अद्वितीय रणनीतिकार छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है।

आज देशभर में हिंदवी स्वराज के संस्थापक और अद्वितीय रणनीतिकार छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। 19 फरवरी 1630 को महाराष्ट्र के शिवनेरी किले में जन्मे शिवाजी महाराज ने ऐसे समय में स्वराज की नींव रखी, जब भारतीय उपमहाद्वीप पर मुगल और दक्कनी सल्तनतों का प्रभुत्व था। उनकी वीरता, दूरदर्शिता और प्रशासनिक क्षमता आज भी नेतृत्व और राष्ट्रनिर्माण की मिसाल मानी जाती है।

बचपन से ही स्वराज का सपना

शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई ने उन्हें बचपन से ही धर्म, साहस और स्वाभिमान की शिक्षा दी। उनके पिता शाहाजी भोसले बीजापुर सल्तनत में सेनापति थे, लेकिन शिवाजी ने कम उम्र में ही स्वतंत्र शासन का सपना देख लिया था। किशोरावस्था में ही उन्होंने तोरणा और राजगढ़ जैसे किलों पर कब्जा कर अपनी सैन्य रणनीति का परिचय दिया।


गुरिल्ला युद्धनीति के जनक

शिवाजी महाराज को भारतीय इतिहास में गुरिल्ला युद्ध पद्धति के प्रभावी उपयोग के लिए जाना जाता है। पहाड़ी इलाकों और किलों का रणनीतिक इस्तेमाल कर उन्होंने बड़ी सेनाओं को मात दी। अफजल खान के साथ उनका प्रसिद्ध युद्ध और औरंगजेब के दरबार से साहसिक पलायन उनकी बुद्धिमत्ता और सूझबूझ के प्रतीक हैं।

मुगल सम्राट औरंगजेब के साथ उनके संघर्ष ने उन्हें राष्ट्रीय नायक का दर्जा दिलाया। 1674 में रायगढ़ किले पर उनका भव्य राज्याभिषेक हुआ और वे ‘छत्रपति’ की उपाधि से विभूषित हुए। यह केवल एक राजतिलक नहीं, बल्कि हिंदवी स्वराज की औपचारिक स्थापना थी।


प्रशासनिक कुशलता और सुशासन

शिवाजी महाराज केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि एक कुशल प्रशासक भी थे। उन्होंने ‘अष्टप्रधान मंडल’ की स्थापना की, जिसमें आठ प्रमुख मंत्री शासन संचालन में सहयोग करते थे। उन्होंने राजस्व व्यवस्था में सुधार किया और किसानों को अत्याचार से राहत दिलाई।

महिलाओं के सम्मान और धार्मिक सहिष्णुता के लिए भी वे प्रसिद्ध थे। उन्होंने युद्ध के दौरान महिलाओं और धार्मिक स्थलों को नुकसान न पहुंचाने के सख्त निर्देश दिए। उनकी नीति सर्वधर्म समभाव पर आधारित थी, जो उस समय के लिए अत्यंत प्रगतिशील सोच थी।

समुद्री शक्ति का विकास

शिवाजी महाराज ने समुद्री सुरक्षा के महत्व को समझते हुए एक मजबूत नौसेना का गठन किया। कोंकण तट पर किलों का निर्माण कर उन्होंने विदेशी शक्तियों की गतिविधियों पर नजर रखी। यह कदम उस दौर में भारतीय शासकों के लिए दूरदर्शी निर्णय माना जाता है।


आज के भारत में शिवाजी महाराज की प्रासंगिकता

छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती केवल ऐतिहासिक स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि युवाओं को प्रेरणा देने का दिन है। उनकी जीवनगाथा नेतृत्व, आत्मसम्मान और राष्ट्रप्रेम का संदेश देती है। महाराष्ट्र सहित पूरे देश में आज शोभायात्राएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विशेष समारोह आयोजित किए जा रहे हैं।

स्कूलों और कॉलेजों में भाषण प्रतियोगिताएं और इतिहास पर आधारित कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को उनके आदर्शों से परिचित कराया जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी #ShivajiMaharajJayanti और #ShivJayanti जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।

विरासत जो सदियों तक अमर रहेगी

1680 में उनके निधन के बाद भी उनकी विरासत जीवित रही। मराठा साम्राज्य ने आगे चलकर भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिवाजी महाराज की प्रतिमाएं और स्मारक आज भी देशभर में गर्व और प्रेरणा का प्रतीक हैं।

उनकी जयंती पर राष्ट्र एक स्वर में उन्हें नमन करता है और उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प लेता है। स्वराज, सुशासन और आत्मसम्मान की जो मशाल उन्होंने जलाई थी, वह आज भी हर भारतीय के हृदय में प्रज्ज्वलित है।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट