सुप्रीम कोर्ट में घिरी बिहार सरकार! मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति पर उठे संवैधानिक सवाल, जानिए पूरा मामला

दीपक प्रकाश

बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गई है।

पटना/नई दिल्ली: बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गई है। उनकी मंत्री पद पर नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जहां अदालत ने बिहार सरकार, चुनाव आयोग और मंत्री दीपक प्रकाश को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान सबसे पहला सवाल यह पूछा कि क्या दीपक प्रकाश अभी भी मंत्री पद पर बने हुए हैं? इस पर याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह आज भी पंचायती राज मंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं। इसके बाद अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए सभी पक्षों से जवाब तलब किया।

क्या है पूरा विवाद?

यह मामला बिहार के रहने वाले राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दीपक प्रकाश विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं, इसके बावजूद उन्हें लगातार दूसरी बार मंत्री बनाया गया है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत किसी गैर-विधायक को अधिकतम छह महीने तक मंत्री बनाया जा सकता है। इस अवधि के भीतर उसे विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी होता है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता, तो उसे मंत्री पद छोड़ना पड़ता है।

याचिका में कहा गया है कि दीपक प्रकाश इस संवैधानिक शर्त को पूरा नहीं कर सके, लेकिन सरकार बदलने के बाद उन्हें फिर से मंत्री पद की शपथ दिला दी गई, जो संविधान की भावना के खिलाफ है।

पहली बार कब बने मंत्री?

याचिकाकर्ता के वकील सुदीप चंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम 14 नवंबर 2025 को आए थे। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 20 नवंबर 2025 को गांधी मैदान में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में दीपक प्रकाश को पंचायती राज विभाग का मंत्री बनाया था।

उस समय दीपक प्रकाश न तो विधायक थे और न ही विधान परिषद के सदस्य। इसके बावजूद उन्हें मंत्री बनाया गया, क्योंकि संविधान गैर-विधायक को छह महीने तक मंत्री बनाए रखने की अनुमति देता है।

दीपक प्रकाश 15 अप्रैल 2026 तक मंत्री पद पर बने रहे। इसी दौरान बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ और मुख्यमंत्री पद पर परिवर्तन हो गया।

सरकार बदली, फिर बने मंत्री

याचिका के मुताबिक, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद सम्राट चौधरी ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद 7 मई 2026 को नई सरकार के मंत्रिमंडल में दीपक प्रकाश को एक बार फिर पंचायती राज मंत्री बना दिया गया।

याचिकाकर्ता का दावा है कि यह कदम संविधान के अनुच्छेद 164(4) का दुरुपयोग है। उनका कहना है कि कोई भी व्यक्ति छह महीने तक मंत्री रहने के बाद केवल सरकार बदलने या मुख्यमंत्री बदलने के आधार पर दोबारा मंत्री नहीं बनाया जा सकता।

याचिका में कहा गया है कि अगर ऐसा होने लगे तो कोई भी गैर-विधायक बार-बार सरकार बदलने के जरिए मंत्री पद पर बना रह सकता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान दोनों के लिए खतरनाक होगा।

सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी गई?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि दीपक प्रकाश न तो विधायक बने और न ही उन्हें विधान परिषद की किसी सीट पर नामित किया गया।

उन्होंने कहा कि हाल ही में विधान परिषद की 10 सीटों पर मनोनयन होना था, लेकिन दीपक प्रकाश को किसी भी सीट पर नामित नहीं किया गया। इसका मतलब साफ है कि उनके मंत्री बने रहने की संवैधानिक समय सीमा समाप्त हो चुकी है।

वकील ने अदालत से कहा कि यदि कोई व्यक्ति पांच महीने 28 दिन मंत्री रहने के बाद इस्तीफा दे और फिर सरकार बदलते ही दोबारा मंत्री बन जाए, तो यह संविधान के अनुच्छेद 164(4) की मूल भावना को खत्म कर देगा।

याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि दीपक प्रकाश की दूसरी नियुक्ति को रद्द किया जाए। साथ ही, उनके द्वारा मंत्री रहते हुए लिए गए फैसलों, पारित योजनाओं और सरकारी संकल्पों की भी समीक्षा की जाए।

‘क्वो वारंटो’ रिट की मांग

इस मामले में याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से ‘क्वो वारंटो’ रिट जारी करने की मांग की है।

कानूनी भाषा में ‘क्वो वारंटो’ का अर्थ होता है- “किस अधिकार से?”। इसके तहत अदालत किसी व्यक्ति से पूछती है कि वह किस संवैधानिक या कानूनी अधिकार के आधार पर किसी सार्वजनिक पद पर बना हुआ है।

यदि अदालत को लगता है कि नियुक्ति संविधान या कानून के अनुरूप नहीं है, तो वह उस व्यक्ति को पद छोड़ने का आदेश भी दे सकती है।

दीपक प्रकाश ने क्या कहा?

दिल्ली से पटना लौटने के बाद दीपक प्रकाश ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्हें अभी तक सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोई आधिकारिक नोटिस प्राप्त नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा, “जब नोटिस मिलेगा, तब हम इस मामले पर विस्तार से जवाब देंगे।”

मंत्री पद से इस्तीफा देने के सवाल पर दीपक प्रकाश ने कहा, “हम पहले से मंत्री हैं और अभी भी मंत्री हैं। इस मामले में जो भी फैसला होगा, वह एनडीए नेतृत्व करेगा।”

संविधान का अनुच्छेद 164(4) क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) स्पष्ट रूप से कहता है कि यदि कोई व्यक्ति विधायक या विधान पार्षद नहीं है, तब भी उसे मंत्री बनाया जा सकता है।

हालांकि, इसके लिए एक महत्वपूर्ण शर्त है। ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनने के छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता है, तो वह मंत्री पद पर बने रहने का अधिकार खो देता है।

इस प्रावधान का उद्देश्य केवल अस्थायी व्यवस्था उपलब्ध कराना है, ताकि किसी विशेष परिस्थिति में विशेषज्ञ या वरिष्ठ नेता को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सके।

क्यों महत्वपूर्ण है 2001 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में वर्ष 2001 के एक महत्वपूर्ण फैसले का भी हवाला दिया है। यह मामला एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य से जुड़ा था।

उस मामले में एक गैर-विधायक मंत्री छह महीने के भीतर चुनाव जीतने में असफल रहा था। बाद में सरकार में बदलाव होने पर उसे फिर से मंत्री बना दिया गया।

तब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अनुच्छेद 164(4) के तहत मिलने वाली छह महीने की छूट केवल एक अस्थायी व्यवस्था है। इसका बार-बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया था कि मुख्यमंत्री बदलने, मंत्रिमंडल के पुनर्गठन या सरकार के इस्तीफे के जरिए किसी गैर-विधायक को बार-बार मंत्री बनाना संविधान की भावना के विपरीत होगा।

अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब बिहार सरकार, चुनाव आयोग और मंत्री दीपक प्रकाश को अपना पक्ष रखना होगा।

इस मामले का फैसला केवल एक मंत्री की नियुक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि क्या कोई गैर-विधायक सरकार बदलने या राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर बार-बार मंत्री पद पर बना रह सकता है।

संवैधानिक विशेषज्ञों की नजर अब इस मामले पर टिकी हुई है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

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