बांकीपुर उपचुनाव: क्या प्रशांत किशोर को खुद उतरना चाहिए मैदान में? जीत-हार से ज्यादा जन सुराज के भविष्य की लड़ाई
क्या प्रशांत किशोर को खुद बांकीपुर से चुनाव लड़ना चाहिए? अगर वे चुनाव लड़ते हैं तो क्या इसका फायदा उनकी पार्टी जन सुराज को मिलेगा?
बिहार की राजनीति में इन दिनों बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इस चर्चा के केंद्र में हैं जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर। सवाल यह है कि क्या प्रशांत किशोर को खुद बांकीपुर से चुनाव लड़ना चाहिए? अगर वे चुनाव लड़ते हैं तो क्या इसका फायदा उनकी पार्टी जन सुराज को मिलेगा? और अगर वे हार जाते हैं तो क्या उनकी राजनीति कमजोर पड़ जाएगी? इन सवालों के जवाब बिहार की आने वाली राजनीति की दिशा भी तय कर सकते हैं।
क्यों हो रहा है बांकीपुर उपचुनाव?
पटना शहर की प्रतिष्ठित विधानसभा सीट बांकीपुर लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है। पिछले तीन दशक से अधिक समय से यह सीट भाजपा के कब्जे में है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन वर्ष 2006 से लगातार इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।
हाल ही में नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद उन्होंने बांकीपुर विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार छह महीने के भीतर इस सीट पर उपचुनाव होना है। ऐसे में अगले कुछ महीनों में यहां चुनाव होना लगभग तय माना जा रहा है। यही वजह है कि राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है।
क्या प्रशांत किशोर लड़ेंगे चुनाव?
जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के बांकीपुर से चुनाव लड़ने की चर्चा पिछले कुछ समय से लगातार हो रही है। हालांकि अभी तक पार्टी या प्रशांत किशोर की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन उनके और पार्टी नेताओं के बयानों से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि इस संभावना पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
प्रशांत किशोर ने वर्ष 2022 में बिहार में जन सुराज अभियान की शुरुआत की थी। इसके बाद 2 अक्टूबर 2024 को इस अभियान को राजनीतिक दल में बदल दिया गया। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने पहली बार चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी को करीब साढ़े तीन प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद एक भी सीट नहीं मिली।
ऐसे में विधानसभा चुनाव के बाद जन सुराज को अपनी राजनीतिक ऊर्जा और जनाधार को फिर से मजबूत करने की जरूरत महसूस हो रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांकीपुर उपचुनाव पार्टी के लिए वही मंच बन सकता है, जहां से वह अपनी नई शुरुआत कर सकती है।
चुनाव लड़ने से जन सुराज को क्या फायदा होगा?
अगर प्रशांत किशोर खुद बांकीपुर से चुनाव लड़ते हैं तो सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जन सुराज के कार्यकर्ताओं और नेताओं में नया उत्साह पैदा होगा। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हुआ था। ऐसे में अगर पार्टी का शीर्ष नेता खुद मैदान में उतरता है तो कार्यकर्ता पूरी ताकत के साथ चुनाव प्रचार में जुटेंगे।
दूसरा बड़ा फायदा यह होगा कि अगर प्रशांत किशोर चुनाव जीत जाते हैं तो उन्हें बिहार विधानसभा में एक मजबूत राजनीतिक मंच मिल जाएगा। वे विपक्ष की एक मुखर आवाज बन सकते हैं। राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर उनकी पहचान पहले से है और नैरेटिव सेट करने में उनकी महारत को भी माना जाता है।
विधानसभा में पहुंचने के बाद वे सरकार के खिलाफ आक्रामक राजनीति कर सकते हैं और अपनी पार्टी को राज्यव्यापी पहचान दिला सकते हैं। इससे बिहार की राजनीति में एक नया समीकरण बन सकता है और 2030 तक राज्य की राजनीति त्रिकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ सकती है।
अगर हार गए तो क्या खत्म हो जाएगी राजनीति?
यह भी एक बड़ा सवाल है कि अगर प्रशांत किशोर बांकीपुर से चुनाव लड़कर हार जाते हैं तो क्या उनकी राजनीति को नुकसान होगा?
राजनीति का इतिहास बताता है कि चुनाव हारना किसी नेता के राजनीतिक जीवन का अंत नहीं होता। देश के कई बड़े नेताओं ने अपने राजनीतिक जीवन में चुनावी हार का सामना किया है। इसके बावजूद उनकी राजनीतिक ताकत कम नहीं हुई।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर में लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुके थे। इसके बाद वे तीसरी बार में विधानसभा पहुंचे और आगे चलकर बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेता बने।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी कई चुनाव हारे। समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया को भी चुनावी पराजय का सामना करना पड़ा था। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव पटना की पाटलिपुत्र लोकसभा सीट से चुनाव हार चुके हैं। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी भी अपने मजबूत माने जाने वाले राघोपुर विधानसभा क्षेत्र से हार का सामना कर चुकी हैं।
ऐसे में अगर प्रशांत किशोर चुनाव लड़कर हारते भी हैं तो इससे उनकी राजनीति खत्म नहीं होगी। बल्कि इससे यह संदेश जाएगा कि वे संघर्ष करने वाले नेता हैं और जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ने से नहीं डरते।
विधानसभा चुनाव में चुनाव नहीं लड़ने का नुकसान
वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव नहीं लड़ा था। इस फैसले को लेकर उनके समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच निराशा देखने को मिली थी।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर प्रशांत किशोर खुद चुनाव मैदान में उतरते तो भले ही वे हर सीट पर असर नहीं डाल पाते, लेकिन पार्टी के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी जरूर हो सकती थी। उनका व्यक्तिगत प्रभाव और चुनावी रणनीति का अनुभव पार्टी के लिए अतिरिक्त ऊर्जा का काम करता।
ऐसे में बांकीपुर उपचुनाव उनके लिए उस कमी को दूर करने का एक मौका भी हो सकता है।
क्या महागठबंधन कर सकता है समर्थन?
राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा यह भी है कि अगर प्रशांत किशोर बांकीपुर से चुनाव लड़ते हैं तो महागठबंधन उन्हें समर्थन दे सकता है। हालांकि इस संभावना को लेकर राजनीतिक जानकार ज्यादा आशावादी नहीं हैं।
महागठबंधन के प्रमुख नेता और विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव शायद ही चाहेंगे कि प्रशांत किशोर विधानसभा पहुंचकर विपक्ष की राजनीति में एक मजबूत विकल्प बन जाएं। क्योंकि अगर ऐसा होता है तो बिहार की विपक्षी राजनीति में उनकी चुनौती बढ़ सकती है।
महागठबंधन की कोशिश यही रहेगी कि बिहार की राजनीति मुख्य रूप से एनडीए और महागठबंधन के बीच सीमित रहे। ऐसे में किसी तीसरी ताकत को मजबूत करने की संभावना कम दिखाई देती है।
बांकीपुर बना सकता है नया राजनीतिक समीकरण
बांकीपुर उपचुनाव सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं होगा। यह बिहार की राजनीति के भविष्य का संकेत भी हो सकता है।
अगर प्रशांत किशोर चुनाव लड़ते हैं और जीतते हैं तो वे बिहार की राजनीति में एक स्थापित नेता के रूप में उभर सकते हैं। अगर हारते हैं तो भी वे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को यह संदेश देंगे कि वे संघर्ष से पीछे हटने वाले नेता नहीं हैं।
राजनीति में कई बार जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ना होता है। बांकीपुर प्रशांत किशोर और जन सुराज के लिए ऐसी ही लड़ाई साबित हो सकती है।
फैसला अंततः प्रशांत किशोर को लेना है और फैसला जनता को सुनाना है। लेकिन इतना तय है कि अगर वे बांकीपुर से चुनाव लड़ते हैं तो यह उपचुनाव बिहार की सबसे चर्चित राजनीतिक लड़ाइयों में से एक बन जाएगा। जीत या हार से इतर, इस चुनाव में जन सुराज के लिए राजनीतिक नुकसान से ज्यादा राजनीतिक लाभ की संभावना दिखाई देती है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
