संतोष सुमन का दावा: सवर्णों के लिए आरक्षण की पहल मांझी ने पहले की थी, अब ‘कोटे में कोटा’ पर उठाए सवाल
संतोष सुमन ने उठाया ‘कोटे में कोटा’ का सवाल
निष्कर्ष भारत संवाददाता-बिहार की राजनीति में आरक्षण और उसके उप-वर्गीकरण को लेकर जारी बहस के बीच हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के अध्यक्ष एवं बिहार सरकार के लघु जल संसाधन मंत्री संतोष सुमन ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि आज कुछ लोग सवर्ण समाज के हितों की बात कर रहे हैं, लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए आरक्षण की पहल करने वालों में उनके पिता और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी सबसे आगे रहे हैं।
संतोष सुमन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबा पोस्ट लिखकर आरक्षण, गरीबों के अधिकार और दलित समाज के भीतर आरक्षण के लाभ की समीक्षा को लेकर अपनी पार्टी का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा की राजनीति कभी किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं रही है। पार्टी का उद्देश्य हर वर्ग के गरीब और वंचित व्यक्ति को मुख्यधारा में लाना है।
फरवरी 2015 में मांझी कैबिनेट ने किया था प्रस्ताव
संतोष सुमन ने अपने पोस्ट में दावा किया कि फरवरी 2015 में मुख्यमंत्री रहते हुए जीतन राम मांझी की कैबिनेट ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित किया था। हालांकि, कुछ ही दिनों बाद जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री पद से हट गए और उस समय यह फैसला लागू नहीं हो सका।

उन्होंने कहा कि बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों यानी EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का फैसला लागू किया गया। संतोष सुमन ने इसे ऐतिहासिक निर्णय बताते हुए कहा कि जीतन राम मांझी पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण परिवारों को अवसर और आरक्षण देने की जरूरत पर अपनी बात रखते रहे थे।
संतोष सुमन ने कहा कि आज जब कुछ राजनीतिक दल और नेता सवर्ण समाज के हितों की राजनीति करने का दावा कर रहे हैं, तब यह भी याद रखना चाहिए कि आर्थिक आधार पर कमजोर लोगों को आरक्षण देने की चर्चा बिहार की राजनीति में पहले भी जोरदार तरीके से उठाई गई थी।
‘गरीब की तकलीफ जाति देखकर नहीं आती’
हम अध्यक्ष ने अपने बयान में गरीबों की राजनीति को जाति की सीमाओं से ऊपर रखने की बात कही। उन्होंने लिखा कि गरीब की तकलीफ जाति देखकर नहीं आती और गरीबी अगड़े-पिछड़े, दलित-सवर्ण या हिंदू-मुस्लिम का भेद नहीं करती।
उन्होंने कहा कि यदि गरीबी किसी व्यक्ति की जाति या धर्म देखकर नहीं आती, तो गरीबों के अधिकार और अवसर की लड़ाई भी किसी एक जाति तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा शुरू से ही संकीर्ण सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों से ऊपर उठकर गरीबों और वंचितों को केंद्र में रखने की राजनीति करता रहा है।
संतोष सुमन ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी का मानना है कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं, अवसरों और आरक्षण का वास्तविक लाभ पहुंचना चाहिए।
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‘कोटे में कोटा’ और आरक्षण समीक्षा पर फिर छिड़ी बहस
संतोष सुमन का यह बयान ऐसे समय आया है, जब बिहार और देश की राजनीति में दलित समाज के भीतर आरक्षण के उप-वर्गीकरण यानी ‘कोटे में कोटा’ को लेकर बहस तेज है।
उन्होंने कहा कि जब हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा दलित समाज के भीतर आरक्षण के लाभ की समीक्षा और उप-वर्गीकरण पर चर्चा की बात करता है, तो कुछ लोग इसका विरोध करने लगते हैं। उनके अनुसार, विरोध करने वाले लोग यह कहते हैं कि आरक्षण की समीक्षा तो दूर, इस विषय पर चर्चा भी नहीं होनी चाहिए।
संतोष सुमन ने सवाल उठाया कि क्या यह देखना जरूरी नहीं है कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे गरीब, सबसे वंचित और अंतिम पायदान पर खड़े परिवारों तक व्यापक रूप से पहुंच रहा है या नहीं।
उन्होंने कहा कि पार्टी केवल इस मुद्दे पर शांतिपूर्वक और सकारात्मक चर्चा चाहती है। इसका उद्देश्य किसी समाज या जाति को बांटना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण और सामाजिक न्याय की व्यवस्था का लाभ उन लोगों तक भी पहुंचे, जो अब तक अपेक्षाकृत पीछे रह गए हैं।
जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बीच आरक्षण पर अलग-अलग राय
बिहार में आरक्षण के उप-वर्गीकरण का मुद्दा पिछले कुछ समय से राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बना हुआ है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी लगातार इस बात की चर्चा करते रहे हैं कि अनुसूचित जाति वर्ग के भीतर भी यह समीक्षा होनी चाहिए कि आरक्षण का लाभ किन समुदायों तक कितना पहुंचा है।

उनका तर्क रहा है कि कुछ जातियों को आरक्षण का अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिला है, जबकि कई अत्यंत वंचित दलित समुदाय आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। ऐसे में आरक्षण के लाभ के वितरण की समीक्षा की जरूरत है।
वहीं, इस मुद्दे पर अलग राजनीतिक राय भी सामने आई है। कुछ नेताओं का मानना है कि उप-वर्गीकरण से दलित समाज की एकता प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि बिहार की राजनीति में ‘कोटे में कोटा’ का मुद्दा लगातार विवाद और बहस का केंद्र बना हुआ है।
‘हम समाज को बांटने की राजनीति नहीं करते’
संतोष सुमन ने साफ कहा कि उनकी पार्टी समाज को बांटने की राजनीति नहीं करती। उन्होंने लिखा कि हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा सबको साथ लेकर चलने की राजनीति में विश्वास करता है।
संतोष सुमन ने कहा कि पार्टी दबाव या राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर अपने नारे नहीं बदलती और न ही चुनावी समीकरणों के आधार पर गरीबों की चिंता शुरू करती है। पार्टी की राजनीति का मूल आधार गरीब और वंचित व्यक्ति है, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या सामाजिक वर्ग से आता हो।
संतोष सुमन के मुताबिक, जीतन राम मांझी ने मुख्यमंत्री रहते हुए आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए आरक्षण की पहल कर यह संदेश दिया था कि उनके लिए गरीब की पहचान उसकी जाति नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति है।
बिहार की राजनीति में फिर केंद्र में आया आरक्षण का मुद्दा
संतोष सुमन के इस बयान के बाद बिहार में आरक्षण और उसके उप-वर्गीकरण को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज होने की संभावना है। एक तरफ हम पार्टी आर्थिक रूप से कमजोर सभी वर्गों की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ दलित समाज के भीतर आरक्षण के लाभ की समीक्षा की मांग भी उठा रही है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार के अन्य राजनीतिक दल इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं। फिलहाल इतना साफ है कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था, सामाजिक समानता और ‘कोटे में कोटा’ की बहस बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़े मुद्दे के रूप में उभर चुकी है।
भूमि आर्या की रिपोर्ट
