मनिहारी नगर पंचायत में भ्रष्टाचार? कार्रवाई पर बड़ा सवाल, मंत्री संग तस्वीर से बबाल, सत्ता-विपक्ष एकजुट, सवाल गायब
मनिहारी नगर पंचायत में जांच के बाद कार्रवाई में देरी पर सवाल
निष्कर्ष भारत संवाददाता कटिहार। जिले के मनिहारी नगर पंचायत में कथित भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं का मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। कटिहार जिले के मनिहारी नगर पंचायत में शिकायत के बाद जिलाधिकारी स्तर से जांच कराए जाने का दावा किया गया है।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, जांच में अनियमितताएं सामने आने के बाद कार्रवाई के लिए नगर विकास एवं आवास विभाग को पत्र भेजा गया। इसके बाद विभाग ने जिम्मेदार लोगों को चिह्नित कर सात दिनों के भीतर रिपोर्ट मांगी, लेकिन निर्धारित समय बीतने के बाद भी रिपोर्ट नहीं आने का आरोप है।
इसी बीच 3 सितंबर को मनिहारी नगर पंचायत के मुख्य पार्षद लाखो यादव उर्फ राजेश कुमार की नगर विकास एवं आवास विभाग के मंत्री नीतीश मिश्रा के साथ तस्वीर सामने आई। इसके बाद स्थानीय स्तर पर कई तरह के सवाल उठने लगे।
हालांकि, किसी मंत्री या जनप्रतिनिधि के साथ तस्वीर होना अपने आप में किसी भ्रष्टाचार या अनियमितता का प्रमाण नहीं है। पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सरकारी रिकॉर्ड और आधिकारिक कार्रवाई से ही स्पष्ट हो सकती है।
मनिहारी नगर पंचायत में शिकायत से शुरू हुआ विवाद
मामला नगर पंचायत में कथित वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं को लेकर की गई शिकायत से शुरू हुआ। शिकायतकर्ता की ओर से कटिहार के जिलाधिकारी के समक्ष शिकायत रखे जाने के बाद मामले की जांच कराए जाने की बात कही गई है।
शिकायतकर्ता का दावा है कि जांच में कुछ अनियमितताएं सामने आईं और इसके बाद जिलाधिकारी की ओर से नगर विकास एवं आवास विभाग को कार्रवाई के लिए पत्र भेजा गया। हालांकि, मनिहारी नगर पंचायत के जांच में किन-किन मामलों में अनियमितता पाई गई और जांच रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकाला गया, इसकी विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने आना अभी बाकी है।
सात दिन की रिपोर्ट, फिर भी कार्रवाई पर सवाल
मामले में सबसे अहम बिंदु विभाग की ओर से जारी निर्देश बताया जा रहा है। लगातार शिकायतों के बाद नगर विकास एवं आवास विभाग ने मनिहारी नगर पंचायत के कार्यपालक पदाधिकारी को पत्र भेजकर कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और सात दिनों के भीतर उनके नाम विभाग को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
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अब सवाल यह उठ रहा है कि निर्धारित समय-सीमा बीतने के बावजूद रिपोर्ट की स्थिति क्या है। क्या रिपोर्ट तैयार नहीं हुई? क्या वह किसी प्रशासनिक स्तर पर लंबित है? या फिर रिपोर्ट भेजने से पहले किसी तरह की अतिरिक्त जांच या स्पष्टीकरण की जरूरत महसूस की गई? इन सवालों का आधिकारिक जवाब सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कार्रवाई में देरी का वास्तविक कारण क्या है।
मनिहारी में मंत्री और मुख्य पार्षद की तस्वीर से चर्चा तेज
3 सितंबर को मुख्य पार्षद लाखो यादव उर्फ राजेश कुमार की मंत्री नीतीश मिश्रा के साथ तस्वीर सामने आने के बाद मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया। स्थानीय स्तर पर सवाल उठने लगे कि नगर पंचायत से जुड़े मामले में विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया चल रही है, ऐसे समय में मुख्य पार्षद की मंत्री के साथ मुलाकात को किस रूप में देखा जाए।
हालांकि, तस्वीर के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। यह भी संभव है कि दोनों के बीच मुलाकात का नगर पंचायत से जुड़े विवाद से कोई संबंध न हो। इसलिए इस पहलू पर भी आधिकारिक स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण हो जाता है।
मुख्य पार्षद को लेकर कई आरोप
शिकायतकर्ता की ओर से मुख्य पार्षद लाखो यादव के खिलाफ कुछ आपराधिक मामलों का भी उल्लेख किया गया है। इनमें मारपीट, दलित उत्पीड़न और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों का दावा किया जा रहा है।

लेकिन किसी व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होना या आरोप लगाया जाना दोष सिद्ध होने के समान नहीं है। इन मामलों में अंतिम निर्णय न्यायालय की प्रक्रिया के बाद ही माना जा सकता है। इसलिए आरोपों और प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर रखना जरूरी है।
राजनीतिक दबाव के आरोपों की भी जांच जरूरी
शिकायतकर्ता ने कटिहार के एक भाजपा विधायक पर भी मामले को प्रभावित करने या उसे ‘मैनेज’ करने का आरोप लगाया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में इन्हें फिलहाल आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
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यदि किसी स्तर पर प्रशासनिक कार्रवाई को प्रभावित करने का प्रयास हुआ है तो इसकी जांच होनी चाहिए। वहीं यदि आरोप निराधार हैं तो संबंधित पक्षों को तथ्य सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
मनिहारी नगर पंचायत मामले में पांच बड़े सवाल
इस पूरे विवाद में अब कई सवाल सामने हैं। जिलाधिकारी स्तर की जांच का वास्तविक निष्कर्ष क्या है? विभाग ने सात दिनों में रिपोर्ट मांगी थी तो रिपोर्ट अब तक क्यों नहीं आई? रिपोर्ट किस अधिकारी या स्तर पर लंबित है? समय-सीमा पूरी होने के बाद विभाग ने क्या कार्रवाई की? और कथित वित्तीय अनियमितताओं में यदि जिम्मेदारी तय होती है तो आगे क्या कदम उठाया जाएगा? इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही विवाद की तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी।

कार्रवाई होगी या आरोपों पर मिलेगा जवाब?
मनिहारी नगर पंचायत से जुड़े मामले में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा अब पारदर्शिता का है। यदि जांच में वित्तीय अनियमितताएं प्रमाणित हुई हैं तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए। दूसरी ओर यदि जांच में आरोप सही नहीं पाए गए हैं तो प्रशासन को भी स्पष्ट रूप से इसकी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। सरकारी विभाग की ओर से मांगी गई रिपोर्ट की स्थिति भी स्पष्ट होना जरूरी है। इससे यह पता चलेगा कि मामला वास्तव में लंबित क्यों है और कार्रवाई की प्रक्रिया किस चरण में पहुंची है।
तस्वीर से ज्यादा जरूरी है सरकारी कार्रवाई
मंत्री और मुख्य पार्षद की तस्वीर ने भले ही राजनीतिक चर्चा बढ़ा दी हो, लेकिन किसी मामले में अंतिम निष्कर्ष तस्वीर या राजनीतिक आरोपों से नहीं बल्कि दस्तावेजों और जांच से निकलता है। यही वजह है कि मनिहारी में अब लोगों की नजर विभागीय कार्रवाई पर है। यदि अनियमितताएं हुई हैं तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप गलत हैं तो सरकार और प्रशासन को तथ्य सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
मनिहारी नगर पंचायत का यह विवाद केवल एक स्थानीय निकाय तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल भी सामने ला रहा है कि किसी शिकायत के बाद जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ती है। जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि जांच का परिणाम क्या है, रिपोर्ट कब आएगी और जिम्मेदारी तय होने के बाद कार्रवाई कब होगी।
