NDA के 3 सहयोगी दलों ने UCC का किया समर्थन, बिहार में JDU का विरोध; 2029 तक 21 राज्यों में लागू करने का दावा
UCC को लेकर NDA में अलग-अलग रुख सामने आया, TDP, शिंदे शिवसेना और HAM समर्थन में हैं, जबकि बिहार में JDU ने विरोध जताया।
निष्कर्ष भारत संवाददाता नई दिल्ली/पटना: समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) यानी UCC को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी-NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने के बयान के बाद NDA के भीतर भी अलग-अलग रुख सामने आने लगे हैं। NDA के सहयोगी दल तेलुगु देशम पार्टी (TDP), शिवसेना के शिंदे गुट और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) ने UCC के समर्थन की बात कही है। वहीं बिहार में NDA की सहयोगी JDU ने स्पष्ट किया है कि वह राज्य में UCC लागू नहीं होने देगी।
अमित शाह ने 13 सितंबर को मुंबई में UCC को लेकर बड़ा दावा किया था। उन्होंने कहा था कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी और NDA शासित 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक दलों और सहयोगी पार्टियों के बीच UCC को लेकर बहस तेज हो गई है।
अभी सिर्फ उत्तराखंड में लागू है UCC
देश में फिलहाल उत्तराखंड ऐसा राज्य है जहां UCC लागू हो चुका है। उत्तराखंड में जनवरी 2025 से समान नागरिक संहिता प्रभावी है। वहीं गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में UCC से संबंधित विधेयक पारित होने की जानकारी सामने आई है। इन राज्यों में आगे की संवैधानिक प्रक्रिया और अधिसूचना के बाद कानून लागू होने का रास्ता साफ होगा।
इसके अलावा महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में UCC को लेकर कानून तैयार करने के लिए समितियां गठित की गई हैं।
अमित शाह के मुताबिक, NDA शासित अन्य राज्यों में भी आने वाले समय में इसे लागू करने की दिशा में काम किया जाएगा।
TDP ने UCC को समर्थन देने की बात कही
तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के लोकसभा नेता लावू कृष्ण देवरायुलु ने कहा कि उनकी पार्टी UCC का समर्थन करेगी। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इसे लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों से बातचीत की जानी चाहिए।

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उन्होंने संकेत दिया कि फिलहाल UCC को लेकर पार्टी स्तर पर विस्तृत चर्चा नहीं हुई है। TDP का मौजूदा रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पार्टी पहले इस मुद्दे पर अलग राय रखती रही है।
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद NDA में शामिल होने से पहले TDP प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने UCC के मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय के साथ खड़े होने की बात कही थी।
बिहार में JDU ने UCC पर साफ किया रुख
NDA में शामिल होने के बावजूद बिहार की JDU ने UCC को लेकर अपना अलग रुख सामने रखा है। JDU नेता श्याम रजक ने कहा कि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर UCC का समर्थन करती है, लेकिन बिहार में इसे लागू नहीं होने देगी।
उन्होंने कहा कि पार्टी अपने इस रुख पर कायम है। इस मुद्दे पर JDU नेता संजय झा की अमित शाह से मुलाकात की बात भी सामने आई है।
JDU का यह रुख NDA के भीतर UCC को लेकर मतभेद की ओर इशारा करता है। केंद्र में NDA सरकार का हिस्सा होने के बावजूद बिहार में UCC को लेकर पार्टी की स्थिति अलग है।
शिवसेना और HAM भी समर्थन में
शिंदे गुट की शिवसेना ने भी समान नागरिक संहिता का समर्थन किया है। शिवसेना नेता श्रीकांत शिंदे ने UCC को समानता, न्याय और राष्ट्रीय एकता से जोड़ते हुए इसके समर्थन की बात कही।

वहीं हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन ने भी अमित शाह के बयान का स्वागत किया है। HAM का समर्थन NDA के भीतर UCC के पक्ष में एक और सहयोगी दल की स्थिति को स्पष्ट करता है।
हालांकि NDA में शामिल सभी दलों का रुख एक जैसा नहीं है। UCC को लेकर राज्यों और राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं।
उमर अब्दुल्ला ने NDA पर उठाया सवाल
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने UCC को लेकर NDA की एकजुटता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर बीजेपी के पास संसद में UCC बिल पास कराने के लिए पर्याप्त संख्या है तो उसे संसद में विधेयक पेश करना चाहिए।
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उमर अब्दुल्ला ने सवाल किया कि इसे अलग-अलग राज्यों के जरिए लागू करने की कोशिश क्यों की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि NDA के सभी दल UCC के मुद्दे पर एकमत नहीं हैं।
केरल की मुस्लिम संस्था ने किया विरोध
UCC को लेकर धार्मिक संगठनों की ओर से भी विरोध सामने आया है। केरल की मुस्लिम संस्था समस्त केरल जेम-इयातुल उलमा ने समान नागरिक संहिता का विरोध किया है।
संस्था के अध्यक्ष मोहम्मद जिफ्री का कहना है कि सिर्फ मुस्लिम समुदाय ही नहीं, बल्कि ईसाई, बौद्ध और जैन समुदाय के लोग भी UCC को स्वीकार नहीं कर पाएंगे।
उनका कहना है कि मुस्लिम समुदाय में विवाह, तलाक और विरासत से जुड़े नियम धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हैं और इनके लिए अलग नियम-कायदे हैं।
क्या है UCC?
समान नागरिक संहिता यानी UCC का उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए नागरिक मामलों से जुड़े समान कानून लागू करना है। इसके तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानूनों में समान व्यवस्था लाने की बात की जाती है।
UCC का सीधा संबंध धार्मिक पूजा-पद्धति या आस्था से नहीं है। इसका मुख्य फोकस नागरिक और व्यक्तिगत कानूनों में समानता लाना है।
हालांकि, संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों जैसे कुछ समुदायों के लिए विशेष प्रावधान और छूट का सवाल भी महत्वपूर्ण है।
राज्यों में कैसे लागू हो सकता है UCC?
किसी राज्य में UCC लागू करने के लिए संबंधित राज्य की विधायी और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी होगी। सामान्य तौर पर विधानसभा से विधेयक पारित होने, आवश्यक संवैधानिक मंजूरी और अधिसूचना के बाद कानून प्रभावी होता है।

फिलहाल UCC को लेकर देश की राजनीति में बहस तेज है। एक तरफ NDA के कई सहयोगी दल इसके समर्थन में सामने आए हैं, वहीं बिहार की JDU समेत कुछ दलों और संगठनों ने अलग रुख अपनाया है।
अमित शाह के 2029 तक 21 NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने के दावे के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि NDA के भीतर इस मुद्दे पर कितनी सहमति बन पाती है और बिहार जैसे राज्यों में इसका क्या रुख रहता है।
पटना से कीमती कुमारी का रिपोर्ट
