दार्जिलिंग का अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन कैसे बना राष्ट्रीय राजनीतिक विवाद? राष्ट्रपति मुर्मू की टिप्पणी के बाद केंद्र–बंगाल टकराव तेज
राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने कार्यक्रम की व्यवस्थाओं और प्रोटोकॉल को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी निराशा व्यक्त की।
पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन मूल रूप से आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के सम्मान के लिए आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम था। लेकिन कार्यक्रम के समापन तक यह आयोजन राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक विवाद में बदल गया। इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब भारत की राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने कार्यक्रम की व्यवस्थाओं और प्रोटोकॉल को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी निराशा व्यक्त की। इसके बाद प्रधानमंत्री Narendra Modi ने पश्चिम बंगाल की All India Trinamool Congress सरकार पर तीखा हमला बोला, जिससे केंद्र और राज्य सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया।
संथाल संस्कृति के सम्मान के लिए हुआ था आयोजन
दार्जिलिंग जिले में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन का उद्देश्य संथाल समुदाय की समृद्ध संस्कृति, इतिहास और परंपराओं को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाना था। देश और विदेश से आए प्रतिनिधियों तथा संथाल समुदाय के लोगों को इस कार्यक्रम में भाग लेना था।

हालांकि कार्यक्रम के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन में आयोजन की व्यवस्थाओं को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिस सम्मेलन का उद्देश्य संथाल संस्कृति का जश्न मनाना था, उसी समुदाय के कई लोग कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके।
राष्ट्रपति ने इस बात पर दुख जताया कि कार्यक्रम का स्थान ऐसा चुना गया, जहां पहुंचना बड़ी संख्या में लोगों के लिए मुश्किल साबित हुआ। उनकी यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि राष्ट्रपति आम तौर पर सार्वजनिक मंचों पर प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर इतनी स्पष्ट टिप्पणी कम ही करती हैं।
स्थल बदलने के फैसले पर उठे सवाल
सूत्रों के अनुसार इस सम्मेलन का आयोजन पहले दार्जिलिंग जिले के बिधाननगर इलाके में प्रस्तावित था। बाद में कार्यक्रम का स्थान बदलकर सिलीगुड़ी के बाहरी इलाके बागडोगरा के गोसाईंपुर क्षेत्र में कर दिया गया।
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में कहा कि जब उन्होंने आसपास के खुले और विशाल क्षेत्र को देखा तो उन्हें लगा कि कार्यक्रम वहीं आयोजित किया जा सकता था। उनके अनुसार वह स्थान इतना बड़ा था कि वहां लाखों लोग एकत्र हो सकते थे और इससे संथाल समुदाय के अधिक लोगों की भागीदारी संभव हो सकती थी।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें यह जानकर दुख हुआ कि कई लोग कार्यक्रम में आने की उम्मीद के बावजूद स्थल की वजह से वहां तक पहुंच ही नहीं पाए।
प्रोटोकॉल को लेकर भी उठा विवाद
इस विवाद को और गंभीर तब माना गया जब राष्ट्रपति ने अपने दौरे के दौरान प्रोटोकॉल से जुड़े मुद्दे का भी जिक्र किया। आम तौर पर जब राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर जाते हैं तो राज्य के मुख्यमंत्री या सरकार का कोई वरिष्ठ मंत्री स्वागत के लिए मौजूद रहता है।
लेकिन इस बार राष्ट्रपति के स्वागत के लिए एयरपोर्ट पर केवल सिलीगुड़ी के मेयर गौतम देव मौजूद थे। मुख्यमंत्री Mamata Banerjee या उनके मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य इस अवसर पर नजर नहीं आए।

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि जब देश का राष्ट्रपति किसी राज्य में आता है तो मुख्यमंत्री और मंत्रियों को स्वागत के लिए उपस्थित रहना चाहिए। उन्होंने भावनात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि वे खुद को बंगाल की बेटी मानती हैं और ममता बनर्जी को छोटी बहन की तरह समझती हैं, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आया कि मुख्यमंत्री उनसे नाराज क्यों हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की तीखी प्रतिक्रिया
राष्ट्रपति की टिप्पणी सामने आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए इस घटना को “शर्मनाक” और “अभूतपूर्व” बताया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति की पीड़ा ने पूरे देश को दुखी किया है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र और आदिवासी समाज के सशक्तिकरण में विश्वास रखने वाला हर व्यक्ति इस घटना से आहत है।
मोदी ने राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रशासन ने इस मामले में सारी सीमाएं पार कर दी हैं और यह संविधान के सर्वोच्च पद का अपमान है।
ममता बनर्जी ने आरोपों को बताया निराधार
जैसे-जैसे विवाद बढ़ा, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के स्वागत और विदाई की सभी व्यवस्थाएं राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार ही की गई थीं।
ममता बनर्जी ने बताया कि एयरपोर्ट पर राष्ट्रपति का स्वागत सिलीगुड़ी नगर निगम के मेयर, दार्जिलिंग के जिलाधिकारी और सिलीगुड़ी पुलिस कमिश्नर ने किया था। उन्होंने यह भी कहा कि सम्मेलन के आयोजकों की तैयारी पूरी तरह पर्याप्त नहीं रही होगी, लेकिन जिला प्रशासन की ओर से कोई प्रोटोकॉल उल्लंघन नहीं हुआ।
उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है।
केंद्र सरकार ने मांगी विस्तृत रिपोर्ट
इस पूरे विवाद के बीच केंद्र सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए पश्चिम बंगाल सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने राज्य के मुख्य सचिव से राष्ट्रपति के दौरे से जुड़े सभी पहलुओं पर जानकारी देने को कहा है।
गृह मंत्रालय ने राष्ट्रपति के स्वागत से जुड़े प्रोटोकॉल, सम्मेलन के स्थल में आखिरी समय में किए गए बदलाव, यात्रा मार्ग में परिवर्तन और कार्यक्रम की व्यवस्थाओं को लेकर कई सवाल उठाए हैं। इसके साथ ही यह भी पूछा गया है कि राष्ट्रपति के आगमन और प्रस्थान के समय मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक जैसे वरिष्ठ अधिकारी क्यों मौजूद नहीं थे।
सांस्कृतिक कार्यक्रम से राष्ट्रीय बहस तक
दार्जिलिंग का यह सम्मेलन मूल रूप से संथाल समुदाय की संस्कृति को सम्मान देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था। लेकिन राष्ट्रपति की टिप्पणी, प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया और राज्य सरकार की सफाई के बाद यह आयोजन अब राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच इस विवाद का आगे क्या रुख होता है और क्या इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर कोई कार्रवाई भी सामने आती है। फिलहाल इतना तय है कि एक सांस्कृतिक कार्यक्रम से शुरू हुआ यह मामला देश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन चुका है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
