जन्नायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती: सामाजिक न्याय और सादगी की राजनीति के महान प्रतीक को नमन
जन्नायक कर्पूरी ठाकुर
पटना: आज देश जन्नायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर उस महान नेता को स्मरण कर रहा है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए समर्पित कर दिया। कर्पूरी ठाकुर केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वे वंचितों, पिछड़ों और आम जनता की आवाज़ थे। उनकी राजनीति सत्ता के लिए नहीं, बल्कि समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के सम्मान के लिए थी।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
जन्नायक कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को बिहार के समस्तीपुर ज़िले के एक साधारण नाई (नाई समाज) परिवार में हुआ था। सीमित संसाधनों और सामाजिक भेदभाव के बीच पले-बढ़े कर्पूरी ठाकुर ने बचपन से ही असमानता और अन्याय को करीब से देखा। यही अनुभव आगे चलकर उनके राजनीतिक और सामाजिक जीवन की दिशा तय करने वाला बना।

वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और समाजवादी विचारधारा से प्रभावित हुए। डॉ. राम मनोहर लोहिया के सिद्धांतों ने उनके चिंतन को गहराई दी, जिससे वे सामाजिक बराबरी और भागीदारी आधारित राजनीति के मजबूत समर्थक बने।
बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक भूमिका
कर्पूरी ठाकुर ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में दो बार—1970-71 और 1977-79—कार्यभार संभाला। राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद उन्होंने हमेशा नीतियों को प्राथमिकता दी, न कि सत्ता को।
उनका सबसे बड़ा और ऐतिहासिक निर्णय था बिहार में पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को लागू करना। यह कदम उन्होंने उस समय उठाया जब इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक सहमति नहीं बनी थी। यह फैसला सामाजिक न्याय की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ और आगे चलकर मंडल राजनीति की नींव बना।
इसके साथ ही उन्होंने आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्ण वर्ग के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की, जो उनके संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
शिक्षा और गरीबों के प्रति प्रतिबद्धता
कर्पूरी ठाकुर का मानना था कि शिक्षा सामाजिक बदलाव का सबसे सशक्त माध्यम है। इसी सोच के तहत उन्होंने बिहार में मैट्रिक तक की शिक्षा को निःशुल्क किया। इस फैसले से लाखों गरीब और पिछड़े वर्ग के छात्रों को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला।

उनका व्यक्तिगत जीवन भी उतना ही सादा था जितनी उनकी राजनीति। मुख्यमंत्री रहने के बावजूद वे साधारण जीवन जीते रहे। ईमानदारी और सादगी उनकी पहचान थी, और उनके ऊपर कभी भी भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा।
‘जन्नायक’ क्यों कहलाए?
कर्पूरी ठाकुर को ‘जन्नायक’ की उपाधि जनता ने दी। वे खेतों में काम करने वाले मजदूरों, किसानों, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की समस्याओं को सदन से लेकर सड़क तक उठाते थे। आपातकाल के दौरान उन्होंने लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की खुलकर रक्षा की।
उनकी भाषा सरल, विचार स्पष्ट और नीयत मजबूत थी। वे सत्ता से नहीं, जनता से जुड़कर राजनीति करते थे।
भारत रत्न से सम्मान
वर्ष 2024 में भारत सरकार ने कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके सामाजिक न्याय, शिक्षा और लोकतंत्र के लिए किए गए संघर्ष की राष्ट्रीय स्वीकृति है।

उनकी जयंती पर आज बिहार सहित पूरे देश में राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और आम नागरिक उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।
आज के दौर में कर्पूरी ठाकुर की प्रासंगिकता
आज जब समाज में असमानता और सामाजिक तनाव बढ़ रहा है, कर्पूरी ठाकुर के विचार और भी प्रासंगिक हो गए हैं। उन्होंने सिखाया कि राजनीति सेवा का माध्यम होनी चाहिए, न कि सत्ता का साधन।
वे आज भी उन नेताओं के लिए प्रेरणा हैं जो ईमानदारी, सादगी और सामाजिक न्याय की राजनीति में विश्वास रखते हैं।
जन्नायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर है। उन्होंने जो मूल्य—समानता, शिक्षा, सामाजिक न्याय और स्वच्छ राजनीति—स्थापित किए, वे आज भी मार्गदर्शक हैं।
कर्पूरी ठाकुर का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची राजनीति वही है जो आम आदमी के जीवन में वास्तविक बदलाव लाए।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
