उत्तर प्रदेश की सियासत का अनकहा अध्याय: मुलायम सिंह यादव, भाजपा और गेस्ट हाउस कांड की पूरी कहानी

मुलायम सिंह यादव

मुलायम सिंह यादव

1977: जब जनसंघ के साथ मंत्री बने मुलायम सिंह यादव

उत्तर प्रदेश की राजनीति में खुद को “सेक्यूलर राजनीति का झंडाबरदार” कहने वाले मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक सफर विरोधाभासों, गठबंधनों और सत्ता संघर्षों से भरा रहा है। आज जब उनके राजनीतिक विरासत पर बहस होती है, तो यह याद करना जरूरी हो जाता है कि उनके सत्ता में आने और टिके रहने में भाजपा और कांग्रेस—दोनों की अहम भूमिका रही है।

मुलायम सिंह यादव पहली बार 1977 में मंत्री बने थे। यह वही दौर था जब देश में जनता पार्टी की सरकार बनी थी, जिसमें जनसंघ (जो बाद में भाजपा बना) भी शामिल था। उस सरकार में रामनरेश यादव मुख्यमंत्री थे, मुलायम सिंह यादव सहकारिता मंत्री और कल्याण सिंह स्वास्थ्य मंत्री थे। यानी जिस राजनीतिक धड़े को बाद में मुलायम ने सांप्रदायिक ताकत के रूप में पेश किया, उसी के साथ उन्होंने अपने मंत्री पद की शुरुआत की।

इतना ही नहीं, मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी भाजपा के समर्थन से ही बने। 1989 में बनी जनता दल की सरकार में भाजपा बाहर से समर्थन दे रही थी। इसी सरकार के दौरान अयोध्या में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को बिहार में रोककर गिरफ्तार किया गया। इसके बाद भाजपा ने केंद्र में वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिससे सरकार गिर गई। दिलचस्प तथ्य यह है कि उस वक्त खुद को सेक्यूलर ताकतों का ठेकेदार बताने वाले वामपंथी दल भी भाजपा के साथ मिलकर वी.पी. सिंह सरकार को समर्थन दे रहे थे।

वी.पी. सिंह सरकार गिरने के बाद जनता दल टूट गया और कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। वहीं उत्तर प्रदेश में जब भाजपा ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लिया, तो कांग्रेस ने आगे बढ़कर मुलायम सिंह यादव को समर्थन दे दिया और उनकी सरकार गिरने से बच गई।

मुलायम सरकार का सबसे चर्चित और विवादास्पद फैसला अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाने का रहा। इस फैसले ने मुलायम की छवि एक कट्टर सेक्यूलर नेता के रूप में बनाई, लेकिन इसका राजनीतिक परिणाम उल्टा पड़ा। अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई। बाबरी ढांचा गिरने के बाद कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त हुई।

इसके बाद भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन किया। इस चुनाव में सपा ने 265 सीटों पर और बसपा ने 164 सीटों पर चुनाव लड़ा। नतीजों में सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिलीं। इस गठबंधन सरकार में मुलायम सिंह यादव दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।

लेकिन यह सरकार भीतर से बेहद कमजोर थी। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, उस दौर में मुलायम सिंह यादव की स्थिति आज के किसी मजबूर गठबंधन मुख्यमंत्री से भी बदतर थी। कांशीराम और मायावती ने मुलायम सरकार को पूरी तरह अपने शिकंजे में ले रखा था। आरोप है कि हर महीने सरकार से आर्थिक वसूली की जाती थी और मायावती खुद लखनऊ आकर दबाव बनाती थीं। मुलायम सिंह यादव इस दबाव के आगे लगभग बेबस नजर आते थे।

स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि मुलायम सिंह यादव ने मायावती को उपमुख्यमंत्री बनाने तक का प्रस्ताव दे दिया, लेकिन मायावती इससे संतुष्ट नहीं थीं। उनका लक्ष्य साफ था—मुख्यमंत्री बनना। सरकार किसी तरह खींची जा रही थी, लेकिन सत्ता का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका था।

इसी दौर में 2 जून 1995 को हुआ कुख्यात लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड, जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति को हिला दिया। कांशीराम और मायावती लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे। आरोप है कि वहां मुलायम सिंह यादव को भी तलब किया गया और उनके साथ अपमानजनक व्यवहार हुआ। एक तस्वीर दैनिक जागरण में छपी, जिसमें कांशीराम और मायावती कुर्सी पर बैठे थे और मुलायम सिंह यादव कान पकड़कर झुके हुए दिख रहे थे। इस फोटो ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया।

इसके बाद हालात बेकाबू हो गए। सपा समर्थक गुंडों द्वारा मायावती पर जानलेवा हमला, बलात्कार और हत्या की धमकी तक के आरोप लगे। भाजपा विधायक ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने मौके पर पहुंचकर मायावती की जान बचाई और उन्हें एक कमरे में सुरक्षित किया। उस समय मोबाइल फोन आम नहीं थे, लेकिन मायावती ने पेजर के जरिए बाहर संपर्क बनाए रखा।

यह मामला संसद तक पहुंचा। अटल बिहारी वाजपेयी ने हस्तक्षेप कर मायावती को सुरक्षा दिलवाई। आखिरकार मायावती ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया और भाजपा के समर्थन से पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं।

यह पूरा घटनाक्रम उत्तर प्रदेश की राजनीति का वह अध्याय है, जो बताता है कि सत्ता की राजनीति में न स्थायी दोस्त होते हैं, न स्थायी दुश्मन। मुलायम सिंह यादव की सेक्यूलर छवि, भाजपा के साथ उनके रिश्ते और बसपा के साथ सत्ता संघर्ष—ये सब मिलकर यूपी की राजनीति को समझने की एक अहम कड़ी बनते हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

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