NDTV टैक्स केस में बड़ा फैसला: दिल्ली हाईकोर्ट ने आयकर नोटिस रद्द किए, मीडिया की आज़ादी पर फिर छिड़ी बहस
NDTV टैक्स केस में बड़ा फैसला: दिल्ली हाईकोर्ट ने आयकर नोटिस रद्द किए, मीडिया की आज़ादी पर फिर छिड़ी बहस
नई दिल्ली।
देश की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित न्यूज़ संस्थानों में शुमार NDTV से जुड़े आयकर मामलों में दिल्ली हाईकोर्ट के ताज़ा फैसले ने न सिर्फ प्रणव रॉय और राधिका रॉय को बड़ी राहत दी है, बल्कि भारत में मीडिया की स्वतंत्रता, सत्ता के दुरुपयोग और जांच एजेंसियों की भूमिका पर एक नई बहस भी छेड़ दी है। अदालत ने NDTV के संस्थापकों को भेजे गए आयकर विभाग के सभी नोटिसों को रद्द करते हुए विभाग पर ₹2 लाख का जुर्माना भी लगाया है।

यह फैसला ऐसे समय आया है, जब बीते एक दशक से NDTV और उसके संस्थापक लगातार प्रवर्तन निदेशालय (ED), सीबीआई और आयकर विभाग की जांचों का सामना कर रहे थे। अदालत के इस फैसले को कई लोग “सच की कानूनी जीत” बता रहे हैं, तो वहीं आलोचकों का कहना है कि न्याय भले ही देर से मिला, लेकिन इस दौरान एक स्वतंत्र मीडिया संस्थान को जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई संभव नहीं है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि आयकर विभाग द्वारा जारी नोटिस कानून के अनुरूप नहीं थे और उनमें प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन किया गया। अदालत ने यह भी माना कि जिन आधारों पर कार्रवाई की गई, वे टिकाऊ नहीं थे और पूरे मामले में कानून का दुरुपयोग हुआ।
कोर्ट ने आयकर विभाग को फटकार लगाते हुए कहा कि इस तरह की कार्रवाइयां न सिर्फ करदाताओं को परेशान करती हैं, बल्कि संस्थानों की साख और कार्यप्रणाली को भी गहरा नुकसान पहुंचाती हैं। इसी आधार पर विभाग पर जुर्माना लगाया गया।
सालों की जांच, बदनामी और दबाव
प्रणव रॉय और राधिका रॉय पर वर्षों तक गंभीर आरोप लगाए गए। ईडी की पूछताछ, सीबीआई की जांच, आयकर के छापे और कानूनी नोटिस—यह सिलसिला लगातार चलता रहा। हर जांच मीडिया की सुर्खियां बनी और NDTV को बार-बार कटघरे में खड़ा किया गया।
NDTV समर्थकों का कहना है कि यह सिर्फ कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित दबाव रणनीति थी—डराने, थकाने और आर्थिक रूप से कमजोर करने की। उनका आरोप है कि इस लगातार दबाव का असर यह हुआ कि चैनल कर्ज के बोझ में फंसता चला गया।
अडानी समूह को सौंपा गया NDTV
आलोचकों के अनुसार, यही वह दौर था जब NDTV को अंततः अडानी समूह के हाथों जाना पड़ा। भले ही यह सौदा कारोबारी और कानूनी रूप से वैध बताया गया हो, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या NDTV को सच में बाज़ार की मजबूरियों ने बेचा, या फिर जांच एजेंसियों के दबाव ने उसे इस मोड़ तक पहुंचाया?

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह सवाल और तेज़ हो गया है कि अगर आयकर नोटिस ही गलत थे, तो सालों तक चली जांच और बदनामी की जिम्मेदारी कौन लेगा?
मीडिया की आज़ादी पर गंभीर सवाल
इस फैसले ने एक बार फिर भारत में मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर बहस को हवा दे दी है। पत्रकार संगठनों और नागरिक समूहों का कहना है कि NDTV का मामला सिर्फ एक चैनल या एक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस माहौल को दर्शाता है जिसमें सत्ता से सवाल पूछने वाले मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया जाता है।
आलोचकों का दावा है कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार की तरह किया गया, जिससे एक आलोचनात्मक आवाज़ को कमजोर किया जा सके। वहीं सरकार समर्थक खेमे का कहना है कि जांच एजेंसियां अपना काम कर रही थीं और अदालत का फैसला न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
“न्याय अधूरा है” — आलोचकों की दलील
कई वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों का मानना है कि अदालत से राहत मिलना एक अहम कदम है, लेकिन न्याय यहीं पूरा नहीं होता। उनका सवाल है—अगर कार्रवाई गलत थी, तो जवाबदेही किसकी तय होगी? क्या उन अधिकारियों या संस्थाओं पर भी कोई कार्रवाई होगी, जिन्होंने वर्षों तक गलत नोटिस और जांच चलाई?
उनका कहना है कि जब तक सत्ता के दुरुपयोग की जिम्मेदारी तय नहीं होती, तब तक ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति होती रहेगी।
जनता और लोकतंत्र के लिए क्या मायने?
NDTV टैक्स केस पर आया यह फैसला लोकतंत्र में संस्थाओं की भूमिका को लेकर एक अहम संकेत देता है। यह दिखाता है कि अदालतें अब भी गलत कार्रवाइयों पर रोक लगा सकती हैं, लेकिन यह भी उजागर करता है कि न्याय मिलने तक कितना नुकसान हो सकता है।

आज सवाल सिर्फ NDTV का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या भारत में मीडिया अपनी स्वतंत्रता के साथ सत्ता से सवाल पूछ पाएगा? या फिर कॉरपोरेट और राजनीतिक गठजोड़ के दबाव में सच को बार-बार झुकना पड़ेगा?
दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी—चेतावनी उन संस्थाओं के लिए जो कानून का दुरुपयोग करती हैं, और अवसर लोकतंत्र के लिए, यह सोचने का कि मीडिया की आज़ादी को कैसे और मजबूत किया जाए।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस फैसले के बाद जवाबदेही तय होगी, या फिर यह मामला भी सिर्फ एक कानूनी जीत बनकर रह जाएगा, जबकि एक स्वतंत्र मीडिया संस्थान का नुकसान इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगा।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
