नीतीश कुमार और अनंत सिंह की दोस्ती: बिहार की राजनीति के बदलते दौर की एक दिलचस्प कहानी
नीतीश कुमार
नीतीश कुमार और अनंत सिंह की दोस्ती की पूरी कहानी, 1990 के दशक की बिहार राजनीति से लेकर मतभेदों के दौर तक, बदलती सत्ता और पुराने सम्मान का विश्लेषण।

बिहार की राजनीति में कुछ रिश्ते ऐसे रहे हैं जो सत्ता, विचारधारा और गठबंधन से ऊपर व्यक्तिगत पहचान और पुराने दौर की स्मृतियों से जुड़े रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मोकामा के बाहुबली नेता रहे अनंत सिंह का रिश्ता भी ऐसा ही माना जाता है। यह दोस्ती किसी औपचारिक राजनीतिक गठबंधन या साझा पार्टी मंच की देन नहीं थी, बल्कि 1990 के दशक की उस राजनीति से निकली थी, जब बिहार की सियासत ज़मीनी पकड़, व्यक्तिगत संबंधों और आपसी सम्मान पर टिकी हुआ करती थी।
1990 का दशक और ज़मीनी राजनीति
1990 का दशक बिहार की राजनीति में बड़े बदलावों का दौर था। लालू प्रसाद यादव के उभार, सामाजिक न्याय की राजनीति और मंडल युग की शुरुआत ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था। उसी दौर में नीतीश कुमार एक पढ़े-लिखे, रणनीतिक और तेज़ी से उभरते नेता के रूप में पहचान बना रहे थे, जबकि अनंत सिंह मोकामा और आसपास के इलाकों में एक प्रभावशाली स्थानीय नेता के रूप में स्थापित थे।
दोनों नेताओं की सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि अलग थी, लेकिन उस समय राजनीति में व्यक्तिगत संवाद और स्थानीय प्रभाव की अहमियत अधिक थी। इसी वजह से दोनों के बीच जान-पहचान बनी, बातचीत हुई और कई मौकों पर सार्वजनिक मंच भी साझा हुए।
औपचारिक गठबंधन नहीं, व्यक्तिगत सम्मान
नीतीश कुमार और अनंत सिंह के रिश्ते को कभी भी औपचारिक राजनीतिक दोस्ती या रणनीतिक गठबंधन के रूप में नहीं देखा गया। यह रिश्ता अधिकतर व्यक्तिगत सम्मान और आपसी समझ तक सीमित रहा। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उस दौर में नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद होने के बावजूद निजी स्तर पर संवाद बना रहता था।

अनंत सिंह जहां अपने क्षेत्र में मज़बूत पकड़ के लिए जाने जाते थे, वहीं नीतीश कुमार अपनी साफ-सुथरी छवि और प्रशासनिक समझ के लिए पहचान बना रहे थे। इसी कारण दोनों के बीच एक तरह का आपसी सम्मान विकसित हुआ, जिसे आम लोग दोस्ती के रूप में देखने लगे।
सत्ता में बदलाव और मतभेद
समय के साथ बिहार की राजनीति बदली और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने “सुशासन” और “कानून का राज” को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। अपराध और बाहुबल के खिलाफ सख्त कार्रवाई उनकी सरकार की पहचान बनी।
यहीं से नीतीश कुमार और अनंत सिंह के रास्ते अलग होने लगे। कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त नीतियों के कारण अनंत सिंह और नीतीश कुमार के बीच राजनीतिक मतभेद उभर आए। दोनों की सोच और राजनीति की दिशा अलग-अलग हो गई। यह बदलाव स्वाभाविक था, क्योंकि सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार को पूरे राज्य के लिए एक सख्त प्रशासनिक छवि पेश करनी थी।
फिर भी दिखा पुराने रिश्ते का सम्मान
राजनीतिक मतभेदों और अलग रास्तों के बावजूद, नीतीश कुमार और अनंत सिंह के व्यवहार में पुराने दौर की शिष्टाचार और पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई। कई सार्वजनिक अवसरों पर नीतीश कुमार को अनंत सिंह के प्रति हाथ जोड़कर अभिवादन करते देखा गया।
यह दृश्य बिहार की राजनीति में अक्सर चर्चा का विषय बना। समर्थकों और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह व्यवहार इस बात का संकेत था कि राजनीति में भले ही मतभेद हों, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर पुराने संबंधों का सम्मान बना रह सकता है।
बिहार की राजनीति में प्रतीकात्मक रिश्ता

नीतीश कुमार और अनंत सिंह की दोस्ती बिहार की राजनीति के उस दौर की याद दिलाती है, जब नेता एक-दूसरे के कट्टर विरोधी होने के बावजूद निजी स्तर पर संवाद और सम्मान बनाए रखते थे। आज की आक्रामक और ध्रुवीकृत राजनीति में ऐसे रिश्ते कम ही देखने को मिलते हैं।
यह रिश्ता यह भी दिखाता है कि समय के साथ सत्ता और विचारधारा बदल सकती है, लेकिन पुरानी पहचान और सामाजिक शिष्टाचार पूरी तरह खत्म नहीं होते।
निष्कर्ष
सीधे शब्दों में कहा जाए तो नीतीश कुमार और अनंत सिंह की दोस्ती बिहार की राजनीति के पुराने दौर की एक जीवित मिसाल है। समय बदला, राजनीति बदली, सत्ता और सोच अलग हो गई, लेकिन 1990 के दशक में बनी पहचान और आपसी सम्मान की झलक आज भी उनके व्यवहार में दिखाई देती है।
यह कहानी सिर्फ दो नेताओं की दोस्ती नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के बदलते चरित्र और पुराने मूल्यों की याद भी दिलाती है, जहां मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत सम्मान को जगह दी जाती थी।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
