देशव्यापी आम हड़ताल का पटना में व्यापक असर, डाकबंगला चौराहे पर मजदूर-किसानों का प्रदर्शन; 4 श्रम कोड और मनरेगा पर सरकार को घेरा

4 श्रम कोड

पटना में देशव्यापी आम हड़ताल के दौरान 4 श्रम कोड के विरोध में बड़ा प्रदर्शन। दीपंकर भट्टाचार्य ने श्रम कानून, मनरेगा, कृषि और शिक्षा नीति पर केंद्र सरकार को घेरा। मजदूर संगठनों ने 4 श्रम कोड वापस लेने की मांग तेज की।

पटना में देशव्यापी आम हड़ताल के दौरान 4 श्रम कोड के विरोध में बड़ा प्रदर्शन। दीपंकर भट्टाचार्य ने श्रम कानून, मनरेगा, कृषि और शिक्षा नीति पर केंद्र सरकार को घेरा। मजदूर संगठनों ने 4 श्रम कोड वापस लेने की मांग तेज की।

पटना: केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर आयोजित देशव्यापी आम हड़ताल का असर गुरुवार को बिहार की राजधानी पटना में भी व्यापक रूप से देखने को मिला। भाकपा (माले) के महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य के नेतृत्व में सैकड़ों मजदूर, किसान, छात्र और विभिन्न जनसंगठनों के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे। बुद्ध स्मृति पार्क से निकला जुलूस डाकबंगला चौराहे तक पहुंचा, जहां केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन और सभा आयोजित की गई।

प्रदर्शनकारियों ने हाथों में बैनर और तख्तियां लेकर श्रम कानूनों, मनरेगा, कृषि नीति और शिक्षा के निजीकरण जैसे मुद्दों पर अपनी मांगें उठाईं। जुलूस के दौरान “मजदूर-किसान एकता जिंदाबाद” और “श्रमिक विरोधी नीतियां वापस लो” जैसे नारे गूंजते रहे। पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे, हालांकि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा।

लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई: दीपंकर भट्टाचार्य

डाकबंगला चौराहे पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि यह हड़ताल सिर्फ वेतन, रोजगार और काम के अधिकार की लड़ाई नहीं है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक संरचना को बचाने का आंदोलन भी है। उन्होंने दावा किया कि मजदूरों की यह ऐतिहासिक हड़ताल देशभर में व्यापक समर्थन के साथ आयोजित की गई है और इसे खेत मजदूरों, किसानों, छात्रों और नौजवानों का भी साथ मिला है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ जनता में असंतोष बढ़ रहा है और यह हड़ताल उसी जनाक्रोश का संकेत है। उनके मुताबिक, सरकार श्रम कानूनों में बदलाव कर कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता दे रही है, जिससे श्रमिकों के अधिकार कमजोर हो रहे हैं।

4 श्रम कोड को बताया मजदूर-विरोधी

सभा में 4 नए श्रम कोड को प्रमुख मुद्दे के रूप में उठाया गया। भाकपा (माले) और अन्य संगठनों ने आरोप लगाया कि इन श्रम कोड के जरिए मजदूरों के संगठित होने, यूनियन बनाने और सामूहिक सौदेबाजी की क्षमता को सीमित किया जा रहा है।

वक्ताओं ने कहा कि जैसे किसानों के लंबे आंदोलन ने केंद्र सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने पर मजबूर किया था, वैसे ही संगठित मजदूर आंदोलन 4 श्रम कोड को भी वापस लेने के लिए सरकार को बाध्य करेगा। उनका दावा था कि ये श्रम कोड श्रम कानूनों को लचीला बनाकर बड़े उद्योगों और पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से लाए गए हैं।

मनरेगा में 200 दिन रोजगार और 600 रुपये मजदूरी की मांग

मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) को लेकर भी प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर निशाना साधा। नेताओं का कहना था कि मनरेगा ग्रामीण गरीबों और खेत मजदूरों के लिए रोजगार की गारंटी का महत्वपूर्ण कानून है, लेकिन वर्तमान नीतियों के कारण इसे कमजोर किया जा रहा है।

मजदूर संगठनों ने मांग की कि मनरेगा के तहत कम से कम 200 दिन का रोजगार सुनिश्चित किया जाए और दैनिक मजदूरी 600 रुपये तय की जाए। उनका तर्क था कि महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी के बीच मौजूदा मजदूरी दर पर्याप्त नहीं है। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि बजट आवंटन में कटौती और भुगतान में देरी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।

कृषि नीति और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुद्दा

सभा में कृषि नीति को लेकर भी तीखी आलोचना की गई। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार खेती-किसानी को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी हितों के लिए खोल रही है, जिससे देश के करोड़ों किसानों और कृषि पर निर्भर आबादी पर असर पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि देश की लगभग 60 प्रतिशत आबादी सीधे या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, ऐसे में कृषि क्षेत्र को कॉरपोरेट नियंत्रण में देने की किसी भी कोशिश का व्यापक विरोध होगा।

शिक्षा के निजीकरण पर चिंता

प्रदर्शन के दौरान शिक्षा क्षेत्र में बढ़ते निजीकरण और संघीय ढांचे को कमजोर करने के आरोप भी लगाए गए। वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा को व्यावसायिक गतिविधि में बदलने की प्रवृत्ति से गरीब और मध्यम वर्ग के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच मुश्किल हो रही है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिक्षा के माध्यम से एक विशेष विचारधारा थोपने की कोशिश की जा रही है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

पटना में हड़ताल का असर

देशव्यापी आम हड़ताल का असर पटना के कई हिस्सों में देखने को मिला। कुछ स्थानों पर परिवहन सेवाएं प्रभावित रहीं और विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ताओं ने प्रतीकात्मक प्रदर्शन किए। हालांकि आवश्यक सेवाएं सामान्य रूप से संचालित होती रहीं।

आगे की रणनीति

मजदूर संगठनों ने संकेत दिया कि यदि उनकी मांगों पर सरकार सकारात्मक पहल नहीं करती है तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। उन्होंने मजदूर-किसान एकता को मजबूत करने और संयुक्त संघर्ष की रणनीति पर जोर दिया।

देशव्यापी आम हड़ताल के समर्थन में पटना में हुआ यह प्रदर्शन स्पष्ट करता है कि श्रम कानून, मनरेगा, कृषि और शिक्षा नीति जैसे मुद्दे आने वाले समय में राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में रहेंगे। अब देखना होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है और संवाद की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

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