पटना हाई कोर्ट में बिहार विधानसभा चुनाव पर बड़ी कानूनी चुनौती, 42 विधायकों को नोटिस
बिहार विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के कई महीने बाद भी सियासी हलचल थमने का नाम नहीं ले रही है। कथित वोट चोरी, मत खरीद और हलफनामे में गलत जानकारी देने के आरोपों को लेकर मामला अब पटना हाई कोर्ट पहुंच गया है।
पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के कई महीने बाद भी सियासी हलचल थमने का नाम नहीं ले रही है। कथित वोट चोरी, मत खरीद और हलफनामे में गलत जानकारी देने के आरोपों को लेकर मामला अब पटना हाई कोर्ट पहुंच गया है। अदालत ने 42 निर्वाचित विधायकों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इन सभी के खिलाफ हारे हुए विपक्षी उम्मीदवारों ने चुनाव याचिका दायर की है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं। आरोपों में मतदाताओं को पैसे देकर वोट प्रभावित करने, मतदान प्रक्रिया में धांधली करने और नामांकन के समय दाखिल हलफनामों में गलत या अधूरी जानकारी देने जैसी गंभीर बातें शामिल हैं। अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद संबंधित विधायकों से विस्तृत जवाब मांगा है। फिलहाल मामला न्यायालय में विचाराधीन है।
किन नेताओं के नाम शामिल?
याचिका में जिन प्रमुख नेताओं के नाम सामने आए हैं, उनमें बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार, ऊर्जा मंत्री विजेंद्र यादव, पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा और विधायक चेतन आनंद समेत अन्य शामिल हैं। इन सभी पर आरोप है कि चुनावी हलफनामों में संपत्ति, आपराधिक मामलों या अन्य आवश्यक सूचनाओं को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया।

हालांकि, संबंधित नेताओं की ओर से अभी तक विस्तृत प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं की गई है। कोर्ट में जवाब दाखिल करने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।
वोट खरीद के गंभीर आरोप
याचिका में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। विपक्षी उम्मीदवारों का दावा है कि कुछ क्षेत्रों में मतदाताओं को दस-दस हजार रुपये देकर वोट खरीदने की कोशिश की गई। यदि यह आरोप साबित होते हैं तो यह जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आएगा और संबंधित निर्वाचन को रद्द तक किया जा सकता है।

हालांकि, इन आरोपों को लेकर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। अदालत में पेश साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर ही आगे की कार्रवाई तय होगी।
मतदाता सूची में वृद्धि पर विवाद
चुनाव प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं की संख्या में वृद्धि को लेकर भी विवाद गहराया था। कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि 6 अक्टूबर को बिहार में मतदाताओं की संख्या लगभग 7.42 करोड़ थी, जो 11 नवंबर तक बढ़कर करीब 7.45 करोड़ हो गई। यानी चुनावी प्रक्रिया के बीच लगभग तीन लाख नए मतदाताओं के नाम जोड़े गए।
कांग्रेस ने इस वृद्धि पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं को जोड़ना पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। हालांकि, भारतीय निर्वाचन आयोग के एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में सफाई दी थी कि नामांकन की अंतिम तिथि से दस दिन पहले तक प्राप्त आवेदनों की विधिवत जांच के बाद वैध मतदाताओं के नाम सूची में जोड़े गए। अधिकारी के मुताबिक, यह प्रक्रिया चुनाव नियमों के अनुरूप थी।
चुनावी टाइमलाइन क्या रही?
पहले चरण के लिए नामांकन 10 अक्टूबर से और दूसरे चरण के लिए 13 अक्टूबर से शुरू हुआ था। मतदान क्रमशः 6 और 11 नवंबर को संपन्न हुआ, जबकि 14 नवंबर को परिणाम घोषित किए गए। चुनाव प्रक्रिया के दौरान कोविड-19 दिशा-निर्देशों का भी पालन कराया गया था।
इन चुनावों में सत्तारूढ़ एनडीए ने बहुमत हासिल किया था, लेकिन विपक्ष ने शुरुआत से ही परिणामों और प्रक्रिया को लेकर असंतोष जताया। राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज पार्टी ने भी इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, हालांकि वहां से उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिली।

अब सभी की नजर पटना हाई कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी है। यदि अदालत को प्रथमदृष्टया आरोपों में दम नजर आता है, तो विस्तृत जांच या संबंधित निर्वाचन को चुनौती देने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। वहीं, यदि विधायकों के जवाब संतोषजनक पाए जाते हैं, तो याचिका खारिज भी हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में पारदर्शिता और चुनावी सुधारों पर व्यापक बहस को जन्म दे सकता है। आने वाले दिनों में अदालत की कार्यवाही से स्पष्ट होगा कि ये आरोप महज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हैं या वास्तव में चुनाव प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं।
फिलहाल, बिहार की सियासत में यह मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है और सभी पक्ष कानूनी रणनीति बनाने में जुटे हैं।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
