राज्यसभा चुनाव में महागठबंधन को झटका: चार विधायकों की गैरमौजूदगी से बढ़ी सियासी हलचल
बिहार की राजनीति में राज्यसभा चुनाव के दौरान एक बार फिर अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। पांच सीटों के लिए हुए मतदान में महागठबंधन के चार विधायक वोट देने नहीं पहुंचे, जिनमें कांग्रेस के तीन विधायक शामिल हैं।
राज्यसभा चुनाव 2026 महागठबंधन में अंदरूनी मतभेद उजागर, कांग्रेस के तीन समेत चार विधायक मतदान से रहे दूर; उम्मीदवार चयन और राजनीतिक दबाव को लेकर बढ़ा विवाद
बिहार की राजनीति में राज्यसभा चुनाव के दौरान एक बार फिर अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। पांच सीटों के लिए हुए मतदान में महागठबंधन के चार विधायक वोट देने नहीं पहुंचे, जिनमें कांग्रेस के तीन विधायक शामिल हैं। इस घटनाक्रम ने न केवल गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रदेश की सियासत को भी गरमा दिया है।
इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने सत्तारूढ़ एनडीए सरकार पर तीखा हमला बोला है। प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय, सदाकत आश्रम के बाहर पार्टी कार्यकर्ताओं ने पुतला दहन कर विरोध प्रदर्शन किया।

इस दौरान “वोट चोर, विधायक चोर” और “विधायक चोरी बंद करो” जैसे नारे लगाए गए। प्रदर्शन में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम भी मौजूद रहे, जिन्होंने आरोप लगाया कि विधायकों पर दबाव बनाया जा रहा है।
राजेश राम ने मीडिया से बातचीत में कहा कि यह पूरी घटना कई सवाल खड़े करती है। उन्होंने कहा कि पार्टी की ओर से सभी प्रक्रियाएं पूरी की गई थीं और विधायकों से संवाद भी हुआ था, लेकिन अचानक उनका मतदान में शामिल न होना चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि यह जानना जरूरी है कि विधायक स्वतंत्र रूप से निर्णय ले रहे हैं या किसी दबाव में हैं। उनके मुताबिक, सच्चाई सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।

इस बीच, वोटिंग से दूर रहने वाले विधायकों ने अपने-अपने कारण भी सार्वजनिक किए हैं, जिससे महागठबंधन के भीतर असंतोष की तस्वीर और साफ हो गई है। मनिहारी से कांग्रेस विधायक मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि उम्मीदवार चयन में सामाजिक संतुलन का ध्यान नहीं रखा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि दलित, अल्पसंख्यक और ओबीसी वर्गों की अनदेखी कर दूसरे वर्ग से उम्मीदवार उतारा गया, जिसके विरोध में उन्होंने मतदान का बहिष्कार किया।
फारबिसगंज से कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास ने भी पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब पार्टी अपने विधायकों को सम्मान नहीं देगी तो वोट देने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि उम्मीदवार अलग होता तो वे मतदान जरूर करते। साथ ही उन्होंने कहा कि वे पार्टी की ओर से होने वाली किसी भी कार्रवाई के लिए तैयार हैं।
राजद के ढाका से विधायक फैसल रहमान ने अपनी गैरमौजूदगी के पीछे व्यक्तिगत कारण बताया। उन्होंने कहा कि वे अपनी बीमार मां के इलाज के लिए दिल्ली में हैं और इसी वजह से मतदान में शामिल नहीं हो सके। उनके इस बयान से यह संकेत मिलता है कि सभी विधायकों की अनुपस्थिति राजनीतिक कारणों से नहीं थी, लेकिन कुल मिलाकर इसका असर महागठबंधन की छवि पर पड़ा है।
वहीं, कांग्रेस विधायक सुरेंद्र ने उम्मीदवार चयन को लेकर राजद पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि महागठबंधन के पास बेहतर विकल्प मौजूद थे, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया गया। उनके मुताबिक, दीपक यादव या मुकेश सहनी जैसे नेताओं को मौका दिया जा सकता था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे एनडीए का समर्थन नहीं कर सकते, लेकिन गलत उम्मीदवार के चलते उन्होंने वोट न देना ही उचित समझा।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि महागठबंधन के भीतर कई स्तरों पर असहमति मौजूद है। खासकर उम्मीदवार चयन को लेकर नाराजगी सामने आई है, जो भविष्य में गठबंधन की रणनीति को प्रभावित कर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस असंतोष को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो इसका असर आगामी चुनावों पर भी पड़ सकता है।
दूसरी ओर, कांग्रेस द्वारा एनडीए पर लगाए गए आरोप भी राजनीतिक बहस का केंद्र बन गए हैं। पार्टी का दावा है कि सत्ता पक्ष विधायकों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है, हालांकि एनडीए की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
राज्यसभा चुनाव जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर इस तरह की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि बिहार की राजनीति अभी भी अस्थिर समीकरणों के दौर से गुजर रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि महागठबंधन इस संकट से कैसे उबरता है और क्या पार्टी नेतृत्व अपने नाराज विधायकों को मनाने में सफल होता है या नहीं।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
