जदयू में RCP सिंह की वापसी पर घमासान: ललन सिंह का ‘नो एंट्री’ संदेश, नीतीश कुमार की चुप्पी ने बढ़ाया सस्पेंस
जदयू में RCP सिंह की वापसी पर घमासान: ललन सिंह का ‘नो एंट्री’ संदेश, नीतीश कुमार की चुप्पी ने बढ़ाया सस्पेंस
बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े उलटफेर की अटकलों से गरमा गई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री RCP सिंह (RCP Singh) की जनता दल (यूनाइटेड) में संभावित वापसी ने पार्टी के अंदर और बाहर सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। एक तरफ आरसीपी सिंह खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपना अभिभावक बताकर और 25 साल पुराने रिश्ते का हवाला देकर वापसी की जमीन तैयार करने में जुटे हैं, तो दूसरी ओर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने उनके खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है। इस पूरे घटनाक्रम में नीतीश कुमार की रहस्यमयी चुप्पी ने सस्पेंस और गहरा कर दिया है।

ललन सिंह का साफ संदेश: जदयू में RCP के लिए जगह नहीं
आरसीपी सिंह की वापसी की अटकलों के बीच ललन सिंह का बयान जदयू के भीतर एक स्पष्ट संकेत माना जा रहा है। 18 जनवरी को लखीसराय में एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बात करते हुए ललन सिंह ने सीधे तौर पर आरसीपी सिंह के राजनीतिक रिकॉर्ड पर सवाल खड़े किए। उन्होंने 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि जब पार्टी की चुनावी रणनीति और टिकट वितरण की जिम्मेदारी आरसीपी सिंह के पास थी, तब जदयू की सीटें 72 से घटकर मात्र 42 रह गई थीं।

ललन सिंह ने दो टूक कहा कि “जदयू के कार्यकर्ताओं और बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में पार्टी को फिर से 85 सीटों तक पहुंचाया। जिन्होंने पार्टी को 72 से 42 पर ला दिया, उनके लिए अब संगठन में कोई जगह नहीं है।” राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह बयान आरसीपी सिंह के लिए जदयू में ‘नो एंट्री’ का स्पष्ट संदेश है।
वापसी की अटकलें क्यों हुईं तेज?
आरसीपी सिंह की जदयू में वापसी की चर्चा 11 जनवरी को अचानक तेज हो गई, जब वे पटना के पटेल भवन में आयोजित पटेल सेवा संघ की दही-चूड़ा पार्टी में शामिल हुए। उसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी मौजूद थे। भले ही दोनों एक साथ मंच पर नहीं दिखे, लेकिन मीडिया से बातचीत में आरसीपी सिंह ने नीतीश कुमार की जमकर तारीफ की। उन्होंने नीतीश को अपना “अभिभावक” बताते हुए 25 साल पुराने रिश्ते की याद दिलाई।
जब उनसे सीधे सवाल किया गया कि क्या वे जदयू में लौट रहे हैं, तो उन्होंने स्पष्ट जवाब देने के बजाय कहा कि “सब कुछ जल्द सामने आएगा।” इसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। 14 जनवरी को जदयू विधायक और पूर्व मंत्री श्याम रजक के बयान ने आग में घी डाल दिया। उन्होंने कहा, “आरसीपी गए ही कब थे? जदयू उनका घर है।” हालांकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इस बयान पर न समर्थन किया और न ही खंडन, जिससे सस्पेंस और बढ़ गया।
नीतीश कुमार की चुप्पी: रणनीति या असमंजस?
इस पूरे मामले में सबसे अहम भूमिका मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की है। जदयू में किसी भी बड़े फैसले की अंतिम मुहर उन्हीं की होती है। ललन सिंह के कड़े बयान के बावजूद नीतीश कुमार की चुप्पी कई संकेत दे रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश फिलहाल पार्टी के भीतर पावर बैलेंस का आकलन कर रहे हैं।

विश्लेषकों के मुताबिक, अगर नीतीश कुमार आरसीपी सिंह की वापसी को लेकर सकारात्मक रुख अपनाते हैं, तो ललन सिंह का विरोध भी नरम पड़ सकता है। लेकिन यदि नीतीश चुप्पी बनाए रखते हैं, तो यह संकेत हो सकता है कि आरसीपी सिंह की वापसी की राह आसान नहीं है।
आरसीपी सिंह के लिए राजनीतिक अस्तित्व का सवाल
आरसीपी सिंह के लिए जदयू में वापसी सिर्फ सम्मान का नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व का सवाल बन चुकी है। जदयू से अलग होने के बाद वे कोई मजबूत जनाधार नहीं बना पाए। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी के टिकट पर उनकी बेटी की हार ने उनकी स्थिति और कमजोर कर दी। ऐसे में ललन सिंह का सख्त रुख उनके लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आया है।
IAS से राजनीति तक: RCP सिंह का पूरा सफर
6 जुलाई 1958 को नालंदा में जन्मे रामचंद्र प्रसाद सिंह एक कड़े और प्रभावशाली आईएएस अधिकारी (यूपी कैडर) के रूप में जाने जाते थे। 1996 में बेनी प्रसाद वर्मा के निजी सचिव के रूप में उन्होंने प्रशासनिक दुनिया में पहचान बनाई। यहीं से उनका नीतीश कुमार से संपर्क हुआ। रेल मंत्री बनने के बाद नीतीश ने उन्हें अपना विशेष सचिव बनाया और 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री बनने पर प्रमुख सचिव।
2010 में वीआरएस लेकर आरसीपी सिंह राजनीति में आए। नीतीश कुमार ने उन्हें राज्यसभा भेजा और 2020 में जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। 2021 में वे मोदी सरकार में केंद्रीय इस्पात मंत्री बने। लेकिन भाजपा से बढ़ती नजदीकियों ने नीतीश और आरसीपी के रिश्तों में दरार डाल दी। 2022 में राज्यसभा टिकट न मिलने के बाद वे जदयू से बाहर हो गए।
आगे क्या?
अब सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार अपने पुराने सहयोगी के लिए जदयू के दरवाजे फिर खोलेंगे, या ललन सिंह का ‘नो एंट्री’ संदेश अंतिम फैसला साबित होगा। फिलहाल बिहार की राजनीति में आरसीपी सिंह की वापसी पर सस्पेंस बरकरार है, और सबकी नजरें नीतीश कुमार के अगले कदम पर टिकी हैं।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
