नगर निगम और पुलिस की मनमानी से त्रस्त छोटे व्यापारी, अवैध वसूली और सरकारी बेरुखी से गहराता संकट

नगर निगम

नगर निगम

शहरों में रोज़गार और आजीविका का बड़ा आधार माने जाने वाले छोटे और मिडिल क्लास व्यापारी आज गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। नगर निगम की मनमानी, पुलिस द्वारा कथित अवैध वसूली और असामाजिक तत्वों की दबंगई ने इन व्यापारियों का जीना मुहाल कर दिया है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि मेहनत-मजदूरी और छोटे व्यापार के जरिए परिवार पालने वाले लोग खुद को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।

नगर निगम की मनमानी से बढ़ी परेशानी

स्थानीय व्यापारियों का आरोप है कि नगर निगम द्वारा बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के उनके व्यवसाय को बार-बार हटाया जा रहा है। सरकारी जमीन पर वर्षों से व्यवसाय कर रहे छोटे दुकानदारों को न तो नियमित आवंटन दिया जा रहा है और न ही उन्हें किसी स्थायी स्थान पर बसाने की ठोस योजना बनाई गई है। कार्रवाई के नाम पर कभी अतिक्रमण हटाओ अभियान तो कभी नोटिस जारी कर दिया जाता है, जिससे व्यापारियों की रोज़ी-रोटी पर सीधा असर पड़ रहा है।

व्यापारियों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में स्वरोज़गार और आत्मनिर्भर भारत की बात करती है, तो ज़मीनी स्तर पर उसके लिए ठोस व्यवस्था भी करनी चाहिए। सिर्फ भाषणों और नीतियों में अधिकारों की बात करना पर्याप्त नहीं है।

पुलिस और असामाजिक तत्वों की अवैध वसूली

कई व्यापारियों ने आरोप लगाया है कि उन्हें पुलिस और कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा अवैध वसूली का सामना करना पड़ रहा है। ठेले, खोमचे और छोटी दुकानों से रोज़ या साप्ताहिक वसूली की जाती है। जो व्यापारी पैसे देने से मना करता है, उसे डराने-धमकाने या दुकान हटवाने की धमकी दी जाती है।

असामाजिक तत्वों की दबंगई भी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। ये तत्व खुलेआम वसूली करते हैं और विरोध करने पर हिंसा या झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देते हैं। ऐसे में गरीब और मध्यम वर्गीय व्यापारी खुद को पूरी तरह असहाय महसूस कर रहे हैं।

सरकारी जमीन पर व्यवसाय के लिए आवंटन न होना

व्यापारियों की सबसे बड़ी मांग है कि सरकार सरकारी जमीन पर व्यवस्थित तरीके से व्यवसाय के लिए स्थान आवंटित करे। कई शहरों में स्ट्रीट वेंडर्स और छोटे व्यापारियों के लिए कानून और योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन उनका सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो रहा।

व्यापारियों का कहना है कि यदि उन्हें एक तय और सुरक्षित स्थान मिल जाए, तो वे ईमानदारी से टैक्स और शुल्क देने को भी तैयार हैं। लेकिन बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के व्यवसाय हटाना अन्यायपूर्ण है।

मिडिल क्लास और गरीब वर्ग पर दोहरी मार

इस पूरे हालात का सबसे बड़ा असर मिडिल क्लास और गरीब वर्ग पर पड़ रहा है। जिन लोगों के पास पैसा है, वे मॉल और बड़े शोरूम से खरीदारी कर सकते हैं, लेकिन आम जनता के लिए सस्ते और स्थानीय बाजार ही एकमात्र विकल्प होते हैं। यदि छोटे व्यापारी खत्म हो जाएंगे, तो न केवल रोज़गार छिनेगा, बल्कि आम लोगों के लिए महंगाई भी बढ़ेगी।

गरीब व्यापारी की स्थिति आज “न घर का, न घाट का” जैसी हो गई है। वह जाए तो जाए कहां? एक ओर नगर निगम और पुलिस का दबाव, दूसरी ओर बढ़ती महंगाई और परिवार की जिम्मेदारियां।

अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित?

संविधान में समानता, रोज़गार और सम्मानपूर्वक जीवन का अधिकार दिया गया है, लेकिन व्यापारियों का कहना है कि ये अधिकार सिर्फ कागजों और भाषणों तक ही सीमित रह गए हैं। ज़मीनी हकीकत में उन्हें न तो सुरक्षा मिल रही है और न ही सम्मान।

व्यापारी संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सरकार और प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। बेरोज़गारी बढ़ेगी, सामाजिक असंतोष फैलेगा और शहरी व्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ेगा।

समाधान की जरूरत

विशेषज्ञों और व्यापारियों का मानना है कि समाधान के लिए पारदर्शी नीति, तय शुल्क प्रणाली और स्थायी व्यवसायिक स्थानों का आवंटन जरूरी है। पुलिस और नगर निगम की जवाबदेही तय होनी चाहिए और अवैध वसूली पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

जब तक सरकार ज़मीनी स्तर पर छोटे और मिडिल क्लास व्यापारियों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेगी, तब तक “आत्मनिर्भर भारत” और “सबका साथ, सबका विकास” जैसे नारे अधूरे ही रहेंगे।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

You may have missed