UGC बिल 2026 के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन, पटना में छात्रों और स्वर्ण संगठनों का उग्र विरोध
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पटना, बिहार — केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए UGC बिल 2026 को लेकर देशभर में विरोध तेज हो गया है। इसी कड़ी में बिहार की राजधानी पटना में ऑल बिहार स्टूडेंट यूनियन और स्वर्ण समाज एकता मंच के बैनर तले जोरदार प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पोस्टरों पर कालिख पोती, कुछ स्थानों पर पोस्टर जलाए और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने इस कानून को “काला कानून” बताते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की।
“यह कानून समानता के खिलाफ”: प्रदर्शनकारी
पटना में जुटे प्रदर्शनकारियों का कहना है कि UGC का नया नियम उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता लाने के बजाय समाज को जाति के आधार पर और अधिक विभाजित करेगा। प्रदर्शन में शामिल अनुज पाराशर ने कहा कि इस कानून में ऐसी व्यवस्था बनाई गई है, जिसमें जनरल कैटेगरी यानी सवर्ण छात्रों को टारगेट किया जा रहा है। उनके अनुसार, विश्वविद्यालयों में सभी जातियों के छात्र एक साथ पढ़ते, खाते और रहते हैं, वहां किसी तरह की दुश्मनी नहीं होती।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब SC, ST और OBC छात्रों के लिए इक्विटी कमेटी बनाई जा रही है, तो जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था क्यों नहीं है। अनुज पाराशर ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया और कहा कि “इक्विटी कमेटी सबके लिए होनी चाहिए, न कि चुनिंदा वर्ग के लिए।”
“देश को जाति में मत बांटिए”
प्रदर्शनकारियों ने सरकार पर आरोप लगाया कि पहले देश को धार्मिक आधार पर बांटा गया और अब जाति के नाम पर समाज में दरार डाली जा रही है। उनका कहना है कि “साथ में खाने और पढ़ने वाले भाई-भाई अब लड़ें, ऐसी व्यवस्था नहीं बननी चाहिए।” उन्होंने मांग की कि ऐसी नीति लाई जाए, जिसमें हर जाति और समुदाय को समान न्याय और समान अवसर मिले।

प्रदर्शन में शामिल उज्ज्वल कुमार ने कहा कि UGC बिल 2026 बच्चों के हित में नहीं है। सरकार एक ओर समानता की बात करती है और दूसरी ओर ऐसे नियम ला रही है, जो छात्रों को जाति के आधार पर बांटते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने इस कानून को वापस नहीं लिया, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा, यहां तक कि चक्का जाम और सड़क पर उतरने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
राजनीतिक बयानबाजी तेज
UGC बिल को लेकर सियासत भी गरमा गई है। जहां एक ओर राजद और तेज प्रताप यादव ने इस बिल का समर्थन किया है, वहीं भाजपा और उसके सहयोगी दलों की चुप्पी पर विपक्ष सवाल खड़े कर रहा है। विपक्ष का कहना है कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि यह कानून किसके हित में है और किसके खिलाफ।

क्या है UGC बिल 2026?
UGC ने 13 जनवरी 2026 को अपने नए नियमों को नोटिफाई किया था, जिसका नाम है —
‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’।
इन नियमों के तहत देशभर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें बनाने के निर्देश दिए गए हैं।
ये टीमें मुख्य रूप से SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों की निगरानी करेंगी। सरकार का दावा है कि इन बदलावों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता, जवाबदेही और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है।
जनरल कैटेगरी में नाराजगी
हालांकि, जनरल कैटेगरी के छात्र और कुछ संगठन इन नियमों को अपने खिलाफ मान रहे हैं। उनका आरोप है कि नए प्रावधानों से उन्हें “स्वाभाविक अपराधी” की तरह देखा जा रहा है। उनका कहना है कि इससे कैंपस में भेदभाव और अराजकता बढ़ सकती है।

सुप्रीम कोर्ट और पुराने मामले
UGC का यह कदम सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों और पिछले वर्षों में सामने आए गंभीर मामलों के बाद उठाया गया बताया जा रहा है। इनमें रोहित वेमुला (हैदराबाद यूनिवर्सिटी) और डॉ. पायल तड़वी (मुंबई) के सुसाइड जैसे मामले शामिल हैं, जिनमें जातिगत भेदभाव के आरोप लगे थे। इन मामलों ने देशभर में बहस छेड़ी थी और संस्थानों में जवाबदेही की मांग तेज हुई थी।
इसके अलावा AIIMS दिल्ली, JNU और कई मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अन्य मामलों पर भी सुप्रीम कोर्ट में चर्चा हो चुकी है। इन्हीं हालातों को देखते हुए संसदीय स्थायी समिति ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी कमेटी के गठन की सिफारिश की थी। इस समिति के अध्यक्ष कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हैं।
आगे क्या?
फिलहाल UGC बिल 2026 को लेकर देशभर में असंतोष बना हुआ है। एक ओर सरकार इसे सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, तो दूसरी ओर विरोध करने वाले इसे समानता के खिलाफ मान रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है और शिक्षा व राजनीति—दोनों के लिए अहम साबित हो सकता है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
