बिहार राज्यसभा चुनाव 2026: जीत के बाद भी क्यों कमजोर दिख रहे हैं नीतीश कुमार?

नीतीश कुमार

इस जीत के बाद भी सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की हो रही है, वह है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक स्थिति—जो जीत के बावजूद कमजोर मानी जा रही है।

बिहार की पांचों राज्यसभा सीटों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की जीत ने एक बार फिर राज्य की राजनीति में उसकी मजबूती साबित की है। जनता दल यूनाइटेड (JDU) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने दो-दो सीटें जीतीं, जबकि राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) को एक सीट मिली। लेकिन इस जीत के बाद भी सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की हो रही है, वह है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक स्थिति—जो जीत के बावजूद कमजोर मानी जा रही है।

राज्यसभा जीत के पीछे की सियासी गणित

243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए पहले 41 वोटों की जरूरत थी, लेकिन वोटिंग के दिन केवल 239 विधायक ही पहुंचे। इससे जीत का आंकड़ा घटकर 40 हो गया। NDA के पास कुल 202 विधायक थे, जो पांचों सीटों के लिए पर्याप्त थे।

विपक्षी महागठबंधन की स्थिति कमजोर रही। कई विधायक वोटिंग में शामिल नहीं हुए, जिससे NDA की जीत और आसान हो गई। खासकर पांचवीं सीट पर BJP उम्मीदवार की जीत ने यह संकेत दिया कि गठबंधन के पास अतिरिक्त राजनीतिक प्रबंधन की क्षमता भी है।

BJP का बढ़ता दबाव और संकेत

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव के जरिए एक स्पष्ट संदेश दिया है—वह चाहे तो बिना JDU के भी बिहार में सरकार बना सकती है। अन्य राज्यों में BJP के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए यह संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती।

इससे नीतीश कुमार की स्थिति गठबंधन में अपेक्षाकृत कमजोर होती दिख रही है। उन्हें अब कई मुद्दों पर BJP की शर्तें माननी पड़ सकती हैं।

चिराग पासवान के बयान ने बढ़ाई हलचल

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बयान ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया। उन्होंने दावा किया कि विपक्षी दलों—खासकर कांग्रेस और RJD—में असंतोष बढ़ रहा है और कई विधायक NDA के संपर्क में हैं।

अगर यह दावा सही साबित होता है, तो इसका असर सिर्फ विपक्ष पर नहीं, बल्कि नीतीश कुमार पर भी पड़ेगा। क्योंकि उनकी राजनीतिक ताकत काफी हद तक विपक्ष की मजबूती पर निर्भर करती है।

लालू परिवार पर कानूनी संकट

RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार पर चल रहे CBI और ED मामलों ने भी राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। IRCTC और जमीन घोटाले जैसे मामलों में तेजस्वी यादव का नाम शामिल है।

अगर इन मामलों में सजा होती है, तो तेजस्वी यादव का राजनीतिक भविष्य प्रभावित हो सकता है। इससे RJD कमजोर होगी, और नीतीश कुमार के पास विकल्प सीमित हो जाएंगे।

करीबी नेताओं पर जांच एजेंसियों की नजर

JDU के कुछ नेताओं और उनके करीबी लोगों पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई भी एक बड़ा फैक्टर है। आयकर विभाग, CBI और ED की छापेमारी ने पार्टी के अंदर असहजता बढ़ाई है।

इस तरह की परिस्थितियों में नीतीश कुमार की राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित होती दिख रही है, क्योंकि केंद्र की एजेंसियों का प्रभाव अप्रत्यक्ष दबाव बना सकता है।

केंद्र में NDA की स्थिति मजबूत

केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के पास 292 सीटें हैं। JDU के 12 सांसदों के हटने के बाद भी NDA के पास बहुमत से अधिक सीटें रहेंगी।

इसका मतलब साफ है—अगर नीतीश कुमार NDA से अलग होते हैं, तो भी केंद्र सरकार पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। इससे BJP की स्थिति और मजबूत हो जाती है।

MLC से इस्तीफा: संवैधानिक मजबूरी

16 मार्च को राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद नीतीश कुमार के सामने एक संवैधानिक बाध्यता भी है। संविधान के अनुच्छेद 101(2) के अनुसार कोई व्यक्ति संसद और राज्य विधानमंडल दोनों का सदस्य नहीं रह सकता।

उन्हें 30 मार्च तक विधान परिषद (MLC) की सदस्यता से इस्तीफा देना होगा, अन्यथा उनकी राज्यसभा सीट स्वतः समाप्त हो जाएगी। यदि वे इस्तीफा देते हैं, तो वे बिना किसी सदन के सदस्य बने अधिकतम 6 महीने तक मुख्यमंत्री रह सकते हैं।

निष्कर्ष

बिहार राज्यसभा चुनाव में NDA की जीत भले ही बड़ी राजनीतिक सफलता हो, लेकिन इसके बाद के हालात यह संकेत दे रहे हैं कि नीतीश कुमार की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही। BJP का बढ़ता प्रभाव, विपक्ष की कमजोरी, कानूनी दबाव और संवैधानिक बाध्यताएं—ये सभी कारक मिलकर उन्हें एक सीमित राजनीतिक स्पेस में ला रहे हैं।

आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति किस दिशा में जाएगी, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि नीतीश कुमार अपने अगले कदम कैसे तय करते हैं।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट