‘धमाल 4’ Movie Review: हंसी से ज्यादा शोर, बिखरी कहानी और कमजोर कॉमेडी ने किया निराश
Dhamaal 4 Movie Review in Hindi। अजय देवगन, अरशद वारसी, रितेश देशमुख, जावेद जाफरी और संजय मिश्रा स्टारर 'धमाल 4' क्या दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरती है? पढ़ें फिल्म का पूरा रिव्यू।
करीब दो दशक पहले जब ‘धमाल’ सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी, तब उसने बिना बड़े संदेश दिए सिर्फ अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग, मजेदार किरदारों और शानदार स्क्रीनप्ले के दम पर दर्शकों का दिल जीत लिया था। लालच, मूर्खता और हास्यास्पद परिस्थितियों के बीच बुनी गई कहानी आज भी हिंदी सिनेमा की यादगार कॉमेडी फिल्मों में गिनी जाती है।
लेकिन अब फ्रेंचाइजी की चौथी फिल्म ‘धमाल 4’ उसी विरासत को आगे बढ़ाने की बजाय उसे दोहराने की कोशिश करती नजर आती है। निर्देशक इंद्र कुमार एक बार फिर उसी पुराने फॉर्मूले पर लौटे हैं, लेकिन इस बार कहानी में न तो पहले जैसी ताजगी है और न ही हास्य में वह धार दिखाई देती है जिसने इस फ्रेंचाइजी को लोकप्रिय बनाया था।
कहानी: खजाने की तलाश, लेकिन मनोरंजन गायब
‘धमाल 4’ की कहानी एक बार फिर खजाने की तलाश के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में अजय देवगन गुड्डू के किरदार में हैं, जो अपने साथी जॉनी (संजय मिश्रा) के साथ एक रहस्यमयी खजाने की खोज में निकलता है।

इस सफर में उनके साथ आदी (अरशद वारसी), मानव (जावेद जाफरी), लालची लल्लन (रितेश देशमुख), पारो (अंजलि देशमुख) और समुद्री डाकू अधूरा (रवि किशन) जैसे कई किरदार जुड़ते जाते हैं।
कागज पर यह टीम बेहद मनोरंजक लगती है, लेकिन स्क्रीन पर इन किरदारों को ऐसा मजबूत कथानक नहीं मिलता जो दर्शकों को फिल्म से जोड़े रख सके। कहानी लगातार अलग-अलग कॉमिक घटनाओं के बीच भटकती रहती है और एक ठोस दिशा पकड़ने में असफल रहती है।
स्क्रीनप्ले सबसे कमजोर कड़ी
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका स्क्रीनप्ले है।
लेखक ने कई छोटे-छोटे हास्य दृश्यों को जोड़कर पूरी फिल्म बनाने की कोशिश की है। लेकिन ये दृश्य एक-दूसरे से स्वाभाविक रूप से नहीं जुड़ते। ऐसा लगता है जैसे अलग-अलग कॉमेडी स्केच को जोड़कर एक फिल्म तैयार कर दी गई हो।
कई दृश्य बिना किसी मजबूत वजह के आते हैं और समाप्त हो जाते हैं। इससे कहानी की गति प्रभावित होती है और दर्शक भावनात्मक रूप से फिल्म से जुड़ नहीं पाते।
कलाकारों ने पूरी कोशिश की
अजय देवगन अपने शांत और संयमित अंदाज में गुड्डू के किरदार को निभाते हैं। उनकी गंभीर अभिव्यक्ति कई बार हास्य पैदा करती है, लेकिन कमजोर लेखन उनके अभिनय को भी सीमित कर देता है।
अरशद वारसी और जावेद जाफरी एक बार फिर अपनी पुरानी केमिस्ट्री दिखाने की कोशिश करते हैं। खासकर जावेद जाफरी अपने शारीरिक हावभाव और कॉमिक एक्सप्रेशन से कुछ दृश्यों में हंसी जरूर पैदा करते हैं।
संजय मिश्रा अपनी शानदार कॉमिक टाइमिंग से कई कमजोर दृश्यों को संभालने की कोशिश करते हैं। वहीं रितेश देशमुख और अंजलि देशमुख की जोड़ी कुछ हल्के-फुल्के हास्य क्षण देती है।
रवि किशन समुद्री डाकू अधूरा के किरदार में पूरी ऊर्जा के साथ नजर आते हैं और फिल्म में अलग रंग भरने का प्रयास करते हैं। हालांकि उनके किरदार को भी पर्याप्त गहराई नहीं मिलती।
कमजोर CGI ने बिगाड़ा मजा
फिल्म का एक बड़ा हिस्सा कंप्यूटर जनित दृश्य (CGI) पर आधारित है।
कहानी में मगरमच्छ, बाघ, ऑक्टोपस और ऊंची चट्टानों से जुड़े कई एक्शन और कॉमिक दृश्य दिखाए गए हैं। लेकिन इन दृश्यों के विजुअल इफेक्ट्स बेहद कृत्रिम लगते हैं।

कमजोर CGI के कारण कई दृश्य वास्तविकता से पूरी तरह कटे हुए महसूस होते हैं। इससे दर्शक कहानी में डूबने की बजाय तकनीकी कमियों पर अधिक ध्यान देने लगते हैं।
पुराने मजाकों की पुनरावृत्ति
‘धमाल’ फ्रेंचाइजी हमेशा से हल्की-फुल्की और अतिशयोक्तिपूर्ण कॉमेडी के लिए जानी जाती रही है। लेकिन इस बार फिल्म कई पुराने और घिसे-पिटे चुटकुलों का सहारा लेती है।

बॉडी शेमिंग, शारीरिक बनावट पर टिप्पणी और दोहराए गए स्लैपस्टिक हास्य का इस्तेमाल कई बार असहज महसूस होता है। बदलते समय में दर्शकों की पसंद और हास्य की समझ भी बदली है, लेकिन फिल्म उस बदलाव के साथ कदम मिलाती नजर नहीं आती।
जहां फिल्म मुस्कुराने का मौका देती है
फिल्म पूरी तरह निराश नहीं करती।
कुछ दृश्य ऐसे हैं जो दर्शकों को हंसाने में सफल होते हैं। खासकर जब गुड्डू अपनी प्रेमिका अलीना (ईशा गुप्ता) के घर पहुंचता है और वहां भूतों से जुड़ा हास्यास्पद घटनाक्रम सामने आता है।
इसके अलावा रितेश देशमुख और अंजलि देशमुख के बीच कुछ संवाद हल्का-फुल्का मनोरंजन देने में सफल रहते हैं।
हालांकि ये अच्छे पल पूरी फिल्म को बचाने के लिए पर्याप्त साबित नहीं होते।
निर्देशन में दिखी दोहराव की समस्या
निर्देशक इंद्र कुमार ने ‘धमाल’ जैसी सफल फ्रेंचाइजी को आगे बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन इस बार फिल्म में नया दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता।
कहानी, कॉमेडी और प्रस्तुति कई जगह पहले की फिल्मों की याद दिलाती है, लेकिन उनमें मौजूद ताजगी और रचनात्मकता गायब नजर आती है।
ऐसा महसूस होता है कि फिल्म को केवल फ्रेंचाइजी की लोकप्रियता के भरोसे आगे बढ़ाया गया है, जबकि दर्शकों को कुछ नया देने का प्रयास सीमित रहा।
क्या देखें या नहीं?
अगर आप बिना तर्क खोजे सिर्फ हल्की-फुल्की, शोर-शराबे वाली स्लैपस्टिक कॉमेडी पसंद करते हैं, तो फिल्म के कुछ हिस्से आपको मनोरंजक लग सकते हैं।
लेकिन यदि आप पहली ‘धमाल’ जैसी चतुर, परिस्थितिजन्य और यादगार कॉमेडी की उम्मीद लेकर सिनेमाघर जाएंगे, तो यह फिल्म आपको निराश कर सकती है।
‘धमाल 4’ अपने कलाकारों की मजबूत टीम होने के बावजूद कमजोर कहानी, बिखरे हुए स्क्रीनप्ले और दोहराए गए हास्य के कारण उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। अजय देवगन, अरशद वारसी, जावेद जाफरी, संजय मिश्रा, रितेश देशमुख और रवि किशन जैसे अनुभवी कलाकार अपनी ओर से पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर लेखन उनके अभिनय का पूरा लाभ नहीं उठा पाता।
फिल्म में कुछ मजेदार पल जरूर हैं, लेकिन वे पूरी फिल्म को यादगार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। यदि फ्रेंचाइजी को आगे भी जारी रखना है, तो केवल पुराने किरदारों के भरोसे नहीं, बल्कि नई कहानी, बेहतर लेखन और ताजगी भरे हास्य की भी उतनी ही जरूरत होगी।
रेटिंग: 2/5 ⭐
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
