विदेशी MBBS के बाद भारत में डॉक्टर बनना क्यों हो रहा मुश्किल? FMGE 2026 में 10 में से करीब 9 छात्र फेल, जानिए बड़ी वजहें
FMGE 2026 Result में केवल 13.6% छात्र सफल हुए। जानिए विदेशी MBBS करने वाले छात्रों के लिए भारत में डॉक्टर बनना क्यों कठिन हो रहा है, क्या हैं असफलता की प्रमुख वजहें और आगे क्या बदलने की जरूरत है।
विदेश से MBBS की पढ़ाई करके भारत लौटने वाले हजारों छात्रों के लिए डॉक्टर बनने का सपना इस बार भी मुश्किलों में घिर गया है। Foreign Medical Graduate Examination (FMGE) जून 2026 के परिणाम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल विदेश से मेडिकल डिग्री हासिल कर लेना भारत में डॉक्टर बनने के लिए पर्याप्त है?
इस बार परीक्षा में शामिल 37,448 अभ्यर्थियों में केवल 5,086 छात्र ही सफल हो सके, जबकि 31 हजार से अधिक उम्मीदवार असफल रहे। यानी सफलता दर महज करीब 13.6 प्रतिशत रही। दूसरे शब्दों में कहें तो 10 में से लगभग 9 छात्र FMGE परीक्षा पास नहीं कर पाए।
यह परिणाम न केवल छात्रों और अभिभावकों के लिए चिंता का विषय है, बल्कि देश की मेडिकल शिक्षा व्यवस्था, विदेशी विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता और भारत की लाइसेंसिंग प्रणाली पर भी कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।
क्या है FMGE परीक्षा?
FMGE यानी Foreign Medical Graduate Examination एक अनिवार्य स्क्रीनिंग परीक्षा है। इसे National Board of Examinations in Medical Sciences (NBEMS) आयोजित करता है।
जो भारतीय छात्र रूस, यूक्रेन, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, फिलीपींस, चीन, नेपाल या अन्य देशों से MBBS की पढ़ाई पूरी कर भारत लौटते हैं, उन्हें भारत में मेडिकल प्रैक्टिस करने से पहले यह परीक्षा पास करनी होती है।
परीक्षा कुल 300 अंकों की होती है और उम्मीदवार को कम से कम 150 अंक हासिल करना अनिवार्य होता है। FMGE पास करने के बाद ही छात्र भारत में मेडिकल रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकते हैं।
आखिर इतनी बड़ी संख्या में छात्र क्यों हो रहे हैं असफल?
FMGE के लगातार कम पास प्रतिशत के पीछे केवल एक कारण जिम्मेदार नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई शैक्षणिक, व्यावहारिक और संरचनात्मक समस्याएं हैं।
1. सभी विदेशी मेडिकल विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता समान नहीं
विदेशों में मेडिकल शिक्षा का स्तर हर देश और हर विश्वविद्यालय में अलग-अलग होता है। कुछ प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय बेहतरीन क्लिनिकल प्रशिक्षण और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं, जबकि कई संस्थानों में व्यावहारिक प्रशिक्षण सीमित रहता है।
ऐसे में छात्रों को मरीजों के साथ पर्याप्त अनुभव नहीं मिल पाता, जिसका असर FMGE जैसी परीक्षा में देखने को मिलता है।
2. भारतीय मेडिकल पाठ्यक्रम से अंतर
भारत का MBBS पाठ्यक्रम और विदेशों के कई मेडिकल विश्वविद्यालयों का सिलेबस एक-दूसरे से काफी अलग होता है।
FMGE में पूछे जाने वाले प्रश्न भारतीय मेडिकल शिक्षा और भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के अनुसार तैयार किए जाते हैं। ऐसे में विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों को अतिरिक्त तैयारी करनी पड़ती है।
यदि छात्र केवल अपने विश्वविद्यालय की पढ़ाई पर निर्भर रहते हैं तो परीक्षा में सफलता कठिन हो जाती है।
3. भाषा भी बन रही बड़ी चुनौती
रूस, चीन और कुछ अन्य देशों में मेडिकल शिक्षा का प्रारंभिक हिस्सा अंग्रेजी में होता है, लेकिन क्लिनिकल प्रशिक्षण के दौरान स्थानीय भाषा का उपयोग अधिक होता है।
मरीजों से बातचीत, केस हिस्ट्री लेना और अस्पतालों में काम करना स्थानीय भाषा पर निर्भर करता है। भारतीय छात्रों के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन जाती है।
परिणामस्वरूप कई छात्रों का क्लिनिकल एक्सपोजर सीमित रह जाता है, जिसका प्रभाव उनकी व्यावहारिक समझ पर पड़ता है।
4. परीक्षा का कठिन स्तर
कई अभ्यर्थियों और छात्र संगठनों का कहना है कि जून 2026 का FMGE प्रश्नपत्र पिछले वर्षों की तुलना में अधिक कठिन था।
कुछ छात्रों ने दावा किया कि प्रश्नों का स्तर NEET-PG के समान महसूस हुआ। हालांकि इस संबंध में परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है।
परीक्षा की कठिनाई को लेकर हर वर्ष बहस होती रही है, लेकिन इस बार बेहद कम पास प्रतिशत ने इन चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
5. पर्याप्त तैयारी का अभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि विदेश से लौटने के बाद कई छात्र बिना लंबी तैयारी के सीधे FMGE परीक्षा में बैठ जाते हैं।
FMGE केवल डिग्री का सत्यापन नहीं है, बल्कि यह उम्मीदवार की मेडिकल जानकारी, क्लिनिकल समझ और निर्णय क्षमता की जांच भी करता है।
ऐसे में नियमित अभ्यास, भारतीय मेडिकल पुस्तकों का अध्ययन और मॉक टेस्ट की तैयारी बेहद आवश्यक मानी जाती है।
कम खर्च में MBBS का सपना, लेकिन आगे की चुनौती बड़ी
भारत में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीमित सीटें और निजी मेडिकल कॉलेजों की ऊंची फीस के कारण हर साल हजारों छात्र विदेशों का रुख करते हैं।
रूस, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, फिलीपींस, नेपाल और अन्य देशों में अपेक्षाकृत कम खर्च में MBBS की सुविधा मिलने के कारण बड़ी संख्या में भारतीय छात्र वहां दाखिला लेते हैं।
लेकिन विदेश में प्रवेश आसान होने का अर्थ यह नहीं है कि भारत लौटने के बाद डॉक्टर बनने का रास्ता भी आसान होगा। FMGE का परिणाम हर वर्ष इस वास्तविकता को सामने लाता है।
अभिभावकों और छात्रों के लिए क्या है सीख?
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि केवल कम फीस देखकर किसी भी विदेशी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं लेना चाहिए।
विश्वविद्यालय का चयन करते समय उसकी मान्यता, फैकल्टी, अस्पताल से जुड़ाव, क्लिनिकल प्रशिक्षण, पढ़ाई का माध्यम और पिछले वर्षों के FMGE परिणामों का रिकॉर्ड जरूर देखना चाहिए।
साथ ही छात्रों को पढ़ाई के दौरान ही भारतीय मेडिकल पाठ्यक्रम के अनुसार तैयारी शुरू कर देनी चाहिए ताकि भारत लौटने पर परीक्षा की चुनौती कम हो सके।
क्या व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल छात्रों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
जरूरत इस बात की है कि विदेशी मेडिकल संस्थानों की गुणवत्ता पर नियमित निगरानी हो, छात्रों को बेहतर क्लिनिकल प्रशिक्षण मिले और भारतीय मानकों के अनुरूप पढ़ाई सुनिश्चित की जाए।
इसके अलावा परीक्षा प्रक्रिया को लेकर यदि छात्रों की ओर से पारदर्शिता संबंधी सवाल उठ रहे हैं तो संबंधित संस्थाओं को उन पर भी स्पष्टता देनी चाहिए। इससे परीक्षा प्रणाली पर भरोसा और मजबूत होगा।
FMGE जून 2026 का परिणाम केवल एक परीक्षा का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह भारतीय छात्रों, अभिभावकों, मेडिकल संस्थानों और नीति निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है। विदेशी MBBS की डिग्री अपने आप भारत में मेडिकल प्रैक्टिस का अधिकार नहीं देती। इसके लिए मजबूत शैक्षणिक आधार, गुणवत्तापूर्ण क्लिनिकल प्रशिक्षण और गंभीर तैयारी आवश्यक है।
जब 10 में से लगभग 9 छात्र FMGE में सफल नहीं हो पा रहे हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत तैयारी का मुद्दा नहीं रह जाता। यह संकेत देता है कि विदेशी मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता, भारतीय लाइसेंसिंग प्रणाली और छात्रों की तैयारी—तीनों क्षेत्रों में गंभीर सुधार की आवश्यकता है। यदि इन पहलुओं पर संतुलित और ठोस कदम उठाए जाएं, तो भविष्य में अधिक योग्य और सक्षम डॉक्टर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बन सकेंगे।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
