लोकसभा में 131वां संविधान संशोधन बिल गिरा: 24 साल बाद सरकार को झटका, महिला आरक्षण 2034 तक टला

महिला आरक्षण बिल

लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने और महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में लाया गया संविधान (131वां) संशोधन विधेयक पास न हो पाना भारतीय राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम बनकर उभरा है।

लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने और महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में लाया गया संविधान (131वां) संशोधन विधेयक पास न हो पाना भारतीय राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम बनकर उभरा है। यह सिर्फ एक विधायी असफलता नहीं, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच गहरे राजनीतिक मतभेदों, क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक प्रतिनिधित्व की जटिलताओं को भी उजागर करता है।

क्या था संविधान (131वां) संशोधन बिल?

सरकार इस विधेयक के जरिए लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करना चाहती थी। इसके पीछे तर्क था कि देश की बढ़ती आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ाया जाए। साथ ही, नई सीटों के आधार पर महिलाओं को 33% आरक्षण देने का रास्ता साफ किया जाए।

यह विधेयक महिला आरक्षण कानून के क्रियान्वयन से सीधे जुड़ा हुआ था। यानी जब तक सीटों का पुनर्निर्धारण (परिसीमन) नहीं होता, तब तक महिला आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता।

क्यों गिर गया बिल?

लोकसभा में लंबी बहस के बाद जब वोटिंग हुई तो बिल को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। कुल 528 सांसदों ने मतदान किया, जिसमें 298 ने समर्थन किया, जबकि 230 ने विरोध में वोट डाले। बिल को पास होने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी।

इस हार की सबसे बड़ी वजह सरकार का पर्याप्त समर्थन न जुटा पाना रहा। एनडीए के पास अपने दम पर संख्या नहीं थी और वह विपक्षी दलों को अपने पक्ष में करने में असफल रही।

यह 24 साल में पहली बार है जब कोई सरकारी विधेयक लोकसभा में गिरा। इससे पहले 2002 में पोटा विधेयक 2002 संसद में पारित नहीं हो पाया था। वहीं, 1990 के बाद यह पहला संविधान संशोधन विधेयक है जो लोकसभा में असफल हुआ।

महिला आरक्षण पर क्या असर?

महिला आरक्षण कानून को लागू करने की प्रक्रिया अब और लंबी हो गई है। 2023 में पारित यह कानून 2026 में अधिसूचित हुआ, लेकिन इसके लागू होने के लिए परिसीमन जरूरी है।

अब चूंकि संबंधित विधेयक पास नहीं हुआ, इसलिए 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को इसका लाभ मिलने की संभावना खत्म हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब यह 2034 तक टल सकता है, क्योंकि नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन में समय लगेगा।

परिसीमन: विवाद की जड़

परिसीमन का मतलब है जनसंख्या के आधार पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का निर्धारण करना। यही वह मुद्दा है जिस पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ।

विपक्ष का आरोप है कि परिसीमन से उत्तर भारत के राज्यों को अधिक फायदा होगा, क्योंकि वहां जनसंख्या तेजी से बढ़ी है। इसके उलट दक्षिण भारत के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे उनकी सीटों का अनुपात कम हो सकता है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर “चुनावी नक्शा बदलने की कोशिश” कर रही है। प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार सीमाओं के निर्धारण में मनमानी कर सकती है।

वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इसे संघीय ढांचे के लिए खतरा बताया।

सरकार का जवाब

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष से सहयोग की अपील करते हुए कहा कि सरकार इस ऐतिहासिक कदम का श्रेय लेने को तैयार नहीं है, बल्कि सभी दलों को साथ लेकर चलना चाहती है।

गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि परिसीमन से दक्षिणी राज्यों को नुकसान नहीं होगा। उन्होंने दावा किया कि प्रस्तावित बदलाव में दक्षिण भारत की सीटें भी बढ़ेंगी और उनका प्रतिशत भी लगभग समान रहेगा।

दो अन्य बिलों पर क्यों नहीं हुई वोटिंग?

सरकार ने परिसीमन संशोधन संविधान बिल 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026 को वोटिंग के लिए पेश नहीं किया।

संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि ये दोनों विधेयक मुख्य बिल से जुड़े हुए हैं, इसलिए अलग से मतदान की जरूरत नहीं है। हालांकि विपक्ष ने इसे सरकार की रणनीतिक चाल बताया।

अगर बिल पास हो जाता तो क्या होता?

अगर यह विधेयक पास हो जाता, तो देश की सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में लगभग 50% की बढ़ोतरी होती। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 हो जातीं।

इन बढ़ी हुई सीटों में से 33% यानी लगभग 40 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होतीं। इससे संसद में महिलाओं की भागीदारी में बड़ा इजाफा होता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित बनता।

आगे सरकार के सामने क्या विकल्प हैं?

अब सरकार के पास कुछ प्रमुख विकल्प बचे हैं:

  • संशोधन के साथ दोबारा बिल लाना: सरकार विपक्ष की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए बिल में बदलाव कर सकती है।
  • नई जनगणना का आधार: 2027 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करने का विकल्प अपनाया जा सकता है।
  • सर्वसम्मति बनाने की कोशिश: विपक्षी दलों के साथ बातचीत कर व्यापक सहमति बनाई जा सकती है।

राजनीतिक असर

इस घटनाक्रम का असर आने वाले चुनावों पर भी पड़ सकता है। भाजपा विपक्ष को “महिला विरोधी” बताकर मुद्दा बना सकती है, जबकि विपक्ष इसे “संविधान और संघीय ढांचे की रक्षा” के रूप में पेश करेगा।

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि सरकार पिछड़े वर्ग की महिलाओं को उनका अधिकार नहीं देना चाहती। वहीं कांग्रेस और अन्य दलों ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया।

संविधान (131वां) संशोधन विधेयक का गिरना सिर्फ एक विधायी हार नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में सहमति की राजनीति की आवश्यकता को भी दर्शाता है। महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक सहमति के बिना आगे बढ़ना मुश्किल साबित हुआ है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और विपक्ष इस मुद्दे पर कैसे आगे बढ़ते हैं—क्या संवाद और समझौते का रास्ता अपनाया जाएगा या यह मुद्दा आने वाले चुनावों में राजनीतिक हथियार बना रहेगा।

Nishkarsh Bharat

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