डीजीपी के निर्देशों की अनदेखी? ट्रैफिक SP रीडर के सिविल ड्रेस पर सवाल, पुलिस मुख्यालय सख्त
डीजीपी के आदेश के बीच पटना ट्रैफिक SP रीडर के सिविल ड्रेस पर सवाल
निष्कर्ष भारत संवाददाता, पटना। डीजीपी का फरमान बिहार पुलिस में वर्दी और अनुशासन को लेकर काफी स्पष्ट है। ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों के निर्धारित वर्दी में रहने, टोपी, बेल्ट और नेम प्लेट जैसे जरूरी हिस्सों के इस्तेमाल को लेकर समय-समय पर पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग की ओर से निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। इन आदेशों का मकसद पुलिस की पहचान, अनुशासन और विभागीय गरिमा को बनाए रखना बताया जाता है। ऐसे में पटना ट्रैफिक एसपी कार्यालय में रीडर के कथित तौर पर सिविल ड्रेस में ड्यूटी करने का मामला अब सवालों के घेरे में है।
मामला पटना ट्रैफिक एसपी कार्यालय से जुड़ा है, जहां रीडर के पद पर तैनात पुष्पा कुमारी के ड्यूटी के दौरान सिविल कपड़ों में रहने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। सवाल यह है कि अगर पुलिस मुख्यालय की ओर से वर्दी को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं, तो क्या वे कार्यालय में तैनात सभी पुलिसकर्मियों पर समान रूप से लागू होते हैं? अगर नियम में किसी तरह की छूट है, तो क्या उसके लिए विभागीय स्तर पर कोई स्पष्ट प्रावधान या आदेश मौजूद है?
डीजीपी के निर्देशों में वर्दी पर जोर
डीजीपी ने बिहार पुलिस में वर्दी महज पहनावा नहीं बल्कि विभागीय पहचान और अनुशासन का अहम हिस्सा मानी जाती है। ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मी की पहचान उसकी वर्दी, बैज, नेम प्लेट और पदचिह्न से आसानी से हो सके, यही व्यवस्था का मूल उद्देश्य है। पुलिस मुख्यालय की ओर से समय-समय पर वर्दी को लेकर सख्ती बरतने की बात सामने आती रही है।
वर्दी में टोपी, बेल्ट और नेम प्लेट जैसे हिस्सों को लेकर भी निर्देश दिए जाते रहे हैं। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी आम लोगों के बीच स्पष्ट रूप से पहचाना जा सके। खासकर थानों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर यह व्यवस्था पुलिस की कार्यप्रणाली को व्यवस्थित रखने में मदद करती है।

लेकिन पटना ट्रैफिक एसपी कार्यालय से सामने आई तस्वीर या जानकारी को लेकर अब यही सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या कार्यालयी ड्यूटी में तैनात रीडर के लिए वर्दी संबंधी नियम अलग हैं? यदि ऐसा है तो विभाग को इसकी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
सिविल ड्रेस में रीडर, पहचान को लेकर सवाल
पुलिस कार्यालय में डीजीपी के आदेश के बाद आने वाले आम लोगों के लिए किसी कर्मचारी की पहचान बेहद महत्वपूर्ण होती है। फरियादी अपनी शिकायत लेकर जब किसी पुलिस कार्यालय में पहुंचता है तो वह यह जानना चाहता है कि किस अधिकारी या कर्मचारी से संपर्क करना है। वर्दी इस पहचान को आसान बनाने का काम करती है।
ऐसे में अगर किसी पुलिस कार्यालय में पुलिसकर्मी सिविल ड्रेस में ड्यूटी करते हैं, तो आम लोगों के लिए उनकी भूमिका पहचानना मुश्किल हो सकता है। खासकर ऐसे कार्यालयों में जहां अधिकारी, रीडर, स्टाफ और दूसरे पुलिसकर्मी एक ही परिसर में काम करते हैं, वहां वर्दी और पहचान की व्यवस्था का महत्व और बढ़ जाता है।
डीजीपी के पटना ट्रैफिक एसपी कार्यालय से जुड़े इस मामले में भी यही सवाल सामने आ रहा है। हालांकि, यह स्पष्ट होना बाकी है कि संबंधित रीडर को सिविल ड्रेस में ड्यूटी करने की विभागीय अनुमति है या नहीं। इस बिंदु पर पुलिस विभाग की आधिकारिक स्थिति महत्वपूर्ण होगी।
डीजीपी के आदेश और पालन पर उठता सवाल
बिहार पुलिस में अनुशासन की व्यवस्था ऊपर से नीचे तक समान रूप से लागू होने की अपेक्षा की जाती है। पुलिस मुख्यालय अगर वर्दी को लेकर आदेश जारी करता है तो उसका पालन केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। नियम की प्रभावशीलता तभी दिखाई देती है, जब उसका अनुपालन सभी संबंधित कर्मियों के लिए एक समान हो।
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यही वजह है कि पटना ट्रैफिक एसपी कार्यालय से जुड़ा यह मामला महज एक कर्मचारी के पहनावे का मुद्दा नहीं रह जाता। यह सवाल विभागीय नियमों के समान अनुपालन से भी जुड़ जाता है। अगर किसी पद के लिए सिविल ड्रेस की अनुमति है तो उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए, ताकि नियम को लेकर भ्रम की स्थिति खत्म हो।
महिला पुलिसकर्मियों के ड्रेस को लेकर भी निर्देश
बिहार पुलिस में महिला पुलिसकर्मियों के ड्रेस और पेशेवर आचरण को लेकर भी समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। इसके पीछे विभागीय छवि और कार्यस्थल की पेशेवर मर्यादा बनाए रखने का उद्देश्य बताया जाता है।
ऐसे में पुलिस कार्यालय में ड्रेस कोड का पालन केवल वर्दी पहनने तक सीमित विषय नहीं है। यह पूरे विभाग की कार्यसंस्कृति और अनुशासन से जुड़ा मामला है। अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है कि उनके अधीन काम करने वाले कर्मचारियों के लिए लागू नियमों का स्पष्ट रूप से पालन कराया जाए।
दूर-दराज के थानों तक जाता है असर
डीजीपी ने पुलिस मुख्यालय से जारी किसी भी आदेश का असर केवल राजधानी या बड़े कार्यालयों तक सीमित नहीं रहता। जिले के थानों, चौकियों और यातायात व्यवस्था में तैनात पुलिसकर्मी भी उसी विभागीय अनुशासन का हिस्सा होते हैं। यदि मुख्यालय स्तर पर जारी आदेशों के पालन को लेकर सवाल खड़े होते हैं तो इसका असर निचले स्तर के कर्मचारियों के मनोबल और अनुशासन पर भी पड़ सकता है।
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पटना ट्रैफिक एसपी कार्यालय से जुड़े मामले में भी अब निगाहें विभागीय स्पष्टीकरण पर हैं। क्या रीडर को सिविल ड्रेस में ड्यूटी करने की अनुमति है? अगर है तो उसका आधार क्या है? और अगर अनुमति नहीं है तो क्या इस मामले में कार्रवाई होगी? डीजीपी के इन सवालों का जवाब पुलिस विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया से ही साफ हो सकेगा।
नियम सभी के लिए समान होने का संदेश जरूरी
डीजीपी के आदेश के बाद पुलिस महकमे में वर्दी का सवाल सीधे तौर पर अनुशासन और पहचान से जुड़ा है। इसलिए किसी भी स्तर पर नियमों को लेकर पैदा हुई स्थिति को स्पष्ट करना विभाग के लिए जरूरी हो जाता है। आम पुलिसकर्मी से लेकर अधिकारी कार्यालय तक, अगर नियम समान हैं तो उनका पालन भी समान दिखाई देना चाहिए।

फिलहाल पटना ट्रैफिक एसपी कार्यालय की रीडर के सिविल ड्रेस में ड्यूटी करने को लेकर उठ रहे सवालों का केंद्र यही है कि पुलिस मुख्यालय के वर्दी संबंधी निर्देश वहां किस रूप में लागू होते हैं। डीजीपी ने विभाग की ओर से स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि मामला नियमों के उल्लंघन का है या संबंधित पद के लिए कोई अलग व्यवस्था लागू है।
बहरहाल, डीजीपी के फरमान और पुलिस मुख्यालय की हिदायतों के बीच पटना ट्रैफिक एसपी कार्यालय से जुड़ा यह मामला पुलिस महकमे में नियमों के समान अनुपालन को लेकर बहस जरूर खड़ी करता है।
अमन कुमार की रिपोर्ट
