प्रशांत किशोर की मुसलमानों से अपील, कहा- किसी पार्टी का पिछलग्गू बनने से पहले करें अपनी चिंता, कही बड़ी बात

प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर ने मुसलमानों से राजनीतिक हिस्सेदारी की अपील की

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। प्रशांत किशोर ने बिहार के मुसलमानों से अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर खुद आवाज उठाने की अपील की है। जन सुराज पार्टी के संस्थापक और बांकीपुर के विधायक प्रशांत किशोर ने कहा कि किसी राजनीतिक दल का पिछलग्गू बनने के बजाय अल्पसंख्यक समुदाय को राजनीति में अपनी उचित हिस्सेदारी हासिल करने के लिए स्वयं संघर्ष करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी सामाजिक वर्गों को नेताओं के दावों और वादों से आगे बढ़कर अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करनी चाहिए।

पटना के मुस्लिम बहुल सब्जीबाग इलाके में आयोजित अल्पसंख्यक सम्मेलन में प्रशांत किशोर ने हालिया उपचुनाव में मिले समर्थन के लिए लोगों का आभार जताया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक राजनीति में अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए और इसके लिए एक बेहतर व्यवस्था बनाने की दिशा में प्रयास जरूरी है।

प्रशांत किशोर ने प्रतिनिधित्व पर उठाई आवाज

सम्मेलन में प्रशांत किशोर ने मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय के लोगों को केवल किसी एक राजनीतिक दल के साथ स्थायी रूप से जुड़कर अपनी राजनीतिक ताकत सीमित नहीं करनी चाहिए।

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उनका कहना था कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के लिए जनता का समर्थन महत्वपूर्ण होता है, लेकिन मतदाताओं को भी अपने हित और भविष्य को ध्यान में रखकर राजनीतिक निर्णय लेने चाहिए। उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय से विशेष रूप से अपील की कि वह किसी पार्टी का पिछलग्गू बनने के बजाय अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए खुद प्रयास करे।

प्रशांत किशोर का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब बिहार की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। राज्य में लंबे समय से अलग-अलग राजनीतिक दल इस समुदाय के समर्थन को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते रहे हैं।

उपचुनाव में जन सुराज को मिले समर्थन की चर्चा

प्रशांत किशोर ने अपने संबोधन में हालिया उपचुनाव का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान पटना की मुस्लिम आबादी के एक बड़े हिस्से ने राष्ट्रीय जनता दल के बजाय जन सुराज का समर्थन किया। उनके मुताबिक, अब तक बिहार में राजद को मुस्लिम मतदाताओं की पहली पसंद माना जाता रहा है, लेकिन बांकीपुर उपचुनाव में सामने आए चुनावी परिणाम ने इस धारणा पर चर्चा का अवसर दिया है।

बांकीपुर का उपचुनाव जन सुराज पार्टी के लिए भी महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि पार्टी ने पहली बार इस सीट से चुनाव लड़ते हुए जीत हासिल की। यह सीट लंबे समय से भाजपा के प्रभाव वाली मानी जाती रही थी।

प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर परिणाम क्यों अहम?

बांकीपुर विधानसभा सीट पर भाजपा 1995 से लगातार जीत दर्ज करती रही थी। बाद में पांच बार विधायक रहे नितिन नवीन के राज्यसभा के लिए चुने जाने और विधानसभा की सदस्यता छोड़ने के बाद यहां उपचुनाव की जरूरत पड़ी।

इस चुनाव में जन सुराज की जीत ने प्रशांत किशोर की पार्टी को बिहार की राजनीति में चर्चा के केंद्र में ला दिया। खासकर इसलिए क्योंकि पार्टी का दावा रहा है कि वह परंपरागत राजनीतिक समीकरणों से अलग एक नया राजनीतिक विकल्प तैयार करना चाहती है।

उपचुनाव में मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को लेकर की जा रही चर्चा इसी राजनीतिक बदलाव के संदर्भ में देखी जा रही है। हालांकि, किसी भी चुनाव में किसी समुदाय के मतदान व्यवहार को पूरी तरह एक दिशा में देखना आसान नहीं होता। अलग-अलग इलाकों और वर्गों में मतदाताओं की पसंद अलग हो सकती है।

पीके बोले- पहले अपने ‘बच्चों के भविष्य की चिंता करें’

प्रशांत किशोर ने सम्मेलन में बिहार के सभी सामाजिक वर्गों से अपील करते हुए कहा कि लोग खुद को हितैषी बताने वाले नेताओं के बहकावे में आने के बजाय अपने बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता दें।

उन्होंने शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी जैसे मुद्दों को भविष्य से जोड़ते हुए लोगों से अपने हितों के आधार पर निर्णय लेने की बात कही। अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर उन्होंने कहा कि केवल किसी दल के साथ जुड़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी उचित हिस्सेदारी हासिल करना भी जरूरी है।

उनके इस बयान को बिहार की चुनावी राजनीति में जन सुराज की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी पहले भी सामाजिक वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने और प्रतिनिधित्व के मुद्दे को प्रमुखता देने की बात करती रही है।

प्रशांत किशोर और मुस्लिम राजनीति का पुराना कनेक्शन

मुस्लिम समुदाय से जुड़ा यह मुद्दा प्रशांत किशोर के राजनीतिक सफर में नया नहीं है। करीब आधा दशक पहले सक्रिय राजनीति में कदम रखने के बाद से ही उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रखी है।

जनता दल यूनाइटेड के तत्कालीन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए को लेकर उनका रुख काफी चर्चित रहा था। उन्होंने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की नीति की आलोचना की थी और सीएए के मुद्दे पर जदयू के रुख पर भी सवाल उठाए थे।

इसी राजनीतिक मतभेद के बाद प्रशांत किशोर को जदयू से बाहर कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया और जन सुराज की स्थापना की।

जन सुराज का अलग राजनीतिक मॉडल

जन सुराज पार्टी ने बिहार की राजनीति में प्रवेश के साथ ही खुद को पारंपरिक दलों से अलग विकल्प के तौर पर पेश किया है। पार्टी की ओर से महिलाओं, अल्पसंख्यकों और अत्यंत पिछड़े वर्गों समेत विभिन्न सामाजिक समूहों को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की बात कही जाती रही है।

हालांकि, पिछले विधानसभा चुनाव में जन सुराज अपनी अपेक्षा के मुताबिक प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं रही। इसके बावजूद पार्टी ने अपना राजनीतिक अभियान जारी रखा है और अब अलग-अलग चुनावों के जरिए संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

प्रशांत किशोर के हालिया बयान को भी इसी विस्तार की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें वह अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच जन सुराज की राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

आठ विधान परिषद सीटों पर चुनाव लड़ेगी पार्टी

प्रशांत किशोर ने यह भी स्पष्ट किया है कि जन सुराज पार्टी आगामी विधान परिषद चुनाव में सभी आठ सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जहां अगले महीने मतदान होने की संभावना है।

इस घोषणा से साफ है कि पार्टी अब केवल विधानसभा चुनाव तक अपनी राजनीतिक गतिविधियों को सीमित नहीं रखना चाहती। विधान परिषद चुनाव के जरिए भी संगठन और राजनीतिक आधार का विस्तार करने की कोशिश की जा रही है।

आठ सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला पार्टी के लिए एक नई राजनीतिक परीक्षा होगी। खासकर तब, जब बिहार में विधान परिषद चुनावों के समीकरण विधानसभा चुनावों से अलग होते हैं और यहां उम्मीदवारों की सामाजिक एवं संगठनात्मक पकड़ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मुस्लिम मतदाताओं को लेकर बढ़ेगी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा?

बिहार की राजनीति में मुस्लिम मतदाता लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। कई विधानसभा क्षेत्रों में उनका वोट चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में होता है। ऐसे में जन सुराज का इस समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ बनाने का प्रयास दूसरे दलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

प्रशांत किशोर की अपील का सीधा संदेश यही है कि मुस्लिम मतदाताओं को किसी एक राजनीतिक दल के साथ स्थायी रूप से जुड़ने के बजाय अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी और मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। अब देखना यह होगा कि यह संदेश चुनावी राजनीति में कितना असर डालता है और क्या जन सुराज मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता को मजबूत कर पाती है।

आगे की राजनीति पर टिकी नजर

प्रशांत किशोर के बयान ने बिहार की राजनीति में प्रतिनिधित्व और मुस्लिम वोटों को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है। एक तरफ जन सुराज खुद को नए राजनीतिक विकल्प के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर राजद समेत दूसरे दलों का अपना मजबूत सामाजिक आधार है।

ऐसे में आने वाले चुनावों में जन सुराज की रणनीति और सामाजिक समीकरण खास तौर पर देखने लायक होंगे। फिलहाल प्रशांत किशोर ने अल्पसंख्यक समुदाय को स्पष्ट संदेश दिया है कि राजनीतिक समर्थन किसी दल की स्थायी संपत्ति नहीं होना चाहिए और समुदाय को अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए खुद आवाज उठानी चाहिए। अब इस अपील का असर जमीनी राजनीति पर कितना पड़ता है, यह आने वाले चुनावों में ही साफ होगा।

Nishkarsh Bharat

राजकुमार सिंह की रिपोर्ट

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