बिहार विधान परिषद चुनाव 2026: NDA में नए चेहरों की एंट्री तय, BJP-JDU के सामाजिक समीकरण पर नजर
बिहार विधान परिषद चुनाव 2026 को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। राज्य की 9 सीटों का कार्यकाल 28 जून 2026 को समाप्त हो रहा है, जबकि एक सीट पर उपचुनाव होना है।
बिहार विधान परिषद चुनाव में नए चेहरों पर दांव, NDA ने तैयार किया जातीय समीकरण
बिहार विधान परिषद चुनाव 2026 को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। राज्य की 9 सीटों का कार्यकाल 28 जून 2026 को समाप्त हो रहा है, जबकि एक सीट पर उपचुनाव होना है। ऐसे में कुल 10 सीटों पर चुनाव होना तय है। इस चुनाव में सबसे खास बात यह मानी जा रही है कि लगभग सभी प्रमुख दल पुराने चेहरों की जगह नए नेताओं को मौका देने की तैयारी में हैं।
सत्तारूढ़ NDA गठबंधन के भीतर सीट शेयरिंग का फॉर्मूला लगभग तय माना जा रहा है। वहीं विपक्षी दलों में भी नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों के आधार पर उम्मीदवारों के चयन की चर्चा शुरू हो चुकी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह चुनाव सिर्फ विधान परिषद की सीटों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक संदेश देने वाला भी साबित होगा।
BJP के खाते में तीन सीटें, नए चेहरों पर दांव
सूत्रों के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी इस बार अपने हिस्से की तीनों सीटों पर नए चेहरों को मौका देने जा रही है। मौजूदा विधान पार्षद सम्राट चौधरी पहले ही विधायक बन चुके हैं। वहीं पार्टी नेता संजय मयूख का नाम बांकीपुर विधानसभा सीट के लिए चर्चा में है।
इसके अलावा बीजेपी को इस बार एक अतिरिक्त सीट भी मिलने की संभावना है। ऐसे में पार्टी सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए नए उम्मीदवारों पर दांव लगाएगी।
पार्टी सूत्रों की मानें तो इस बार एक ब्राह्मण नेता को विधान परिषद भेजा जा सकता है। वहीं एक सीट अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और दूसरी गैर-पिछड़ा वर्ग के चेहरे को देने की तैयारी है। बीजेपी पहले ही एक भूमिहार नेता को विधान परिषद भेज चुकी है, इसलिए जातीय संतुलन साधने की रणनीति पर जोर दिया जा रहा है।
JDU में भी बदलाव तय, नए सामाजिक समीकरण पर फोकस
जनता दल यूनाइटेड की ओर से भी बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। सबसे चर्चित नाम निशांत कुमार का है। माना जा रहा है कि वह पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खाली हुई सीट पर उपचुनाव के बजाय नई छह साल वाली सीट से विधान परिषद जाएंगे।

JDU सूत्रों के अनुसार मौजूदा विधान पार्षद गुलाम गौस और भीष्म सहनी को रिप्लेस किया जा सकता है। पार्टी सामाजिक संतुलन को साधने के लिए नए चेहरों पर विचार कर रही है।
संभावना जताई जा रही है कि जदयू इस बार अति पिछड़ा वर्ग, मुस्लिम और दलित समाज से नए नेताओं को उच्च सदन में भेज सकती है। हालांकि पार्टी की ओर से फिलहाल आधिकारिक तौर पर कोई नाम घोषित नहीं किया गया है।
उपेंद्र कुशवाहा के बेटे की एंट्री लगभग तय
NDA की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा को भी इस बार विधान परिषद में प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को विधान परिषद भेजा जा सकता है।

इसके अलावा पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का नाम भी चर्चा में है। NDA की रणनीति साफ है कि छोटे सहयोगी दलों को प्रतिनिधित्व देकर गठबंधन को मजबूत संदेश दिया जाए।
चिराग पासवान के भांजे की चर्चा तेज
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को भी NDA के भीतर एक सीट मिलने की संभावना जताई जा रही है। इस सीट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा सीमांत मृणाल की है, जो चिराग पासवान के भांजे हैं।
सीमांत मृणाल फिलहाल पार्टी के युवा विंग का नेतृत्व कर रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें गरखा सीट से उम्मीदवार बनाया गया था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।
इनके अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता वेद प्रकाश पांडेय और हुलास पांडेय के नामों पर भी चर्चा चल रही है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व और NDA के शीर्ष नेताओं की सहमति से होगा।
LJP(R) की जीत का गणित क्या है?
राज्यसभा चुनाव के दौरान LJP(R) ने बिना किसी शर्त के NDA उम्मीदवारों का समर्थन किया था। अब माना जा रहा है कि उसी राजनीतिक सहयोग का फायदा पार्टी को विधान परिषद चुनाव में मिल सकता है।

LJP(R) के पास फिलहाल 19 विधायक हैं। जीत के लिए उसे करीब 6 अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। बीजेपी अपने तीन उम्मीदवारों को जिताने के बाद भी अतिरिक्त वोट बचा सकती है। ऐसे में केवल बीजेपी के समर्थन से ही LJP(R) उम्मीदवार की जीत संभव मानी जा रही है।
यही वजह है कि NDA के भीतर इस बार छोटे दलों की भूमिका काफी अहम हो गई है।
विपक्ष के सामने चुनौती
विपक्षी गठबंधन महागठबंधन के सामने इस बार सीटों को बचाने की चुनौती है। विधानसभा में संख्या बल कम होने के कारण विपक्ष केवल एक सीट जीतने की स्थिति में दिखाई दे रहा है।
राष्ट्रीय जनता दल के कई नेताओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। ऐसे में पार्टी के भीतर भी टिकट को लेकर दबाव बढ़ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर चुनाव निर्विरोध नहीं हुए तो विपक्ष के लिए सीट बचाना आसान नहीं होगा।
चुनाव कार्यक्रम कब घोषित होगा?
चुनाव आयोग ने अभी तक आधिकारिक रूप से कार्यक्रम की घोषणा नहीं की है। हालांकि सूत्रों के मुताबिक मई के आखिरी सप्ताह या जून के पहले सप्ताह में चुनाव की तारीखों का ऐलान हो सकता है।
संवैधानिक व्यवस्था के तहत विधान परिषद सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव कराना जरूरी है। इसलिए जून के अंत तक पूरी प्रक्रिया पूरी होने की संभावना है।
विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक संदेश
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधान परिषद चुनाव 2026 सिर्फ उच्च सदन तक सीमित नहीं रहेगा। NDA और महागठबंधन दोनों इसे आगामी बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारी के रूप में देख रहे हैं।
NDA जहां नए चेहरों और सामाजिक समीकरणों के जरिए अपने वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, वहीं विपक्ष अपने पारंपरिक समर्थन आधार को बचाने में जुटा है।
आने वाले दिनों में उम्मीदवारों के नाम सामने आने के बाद बिहार की राजनीति और अधिक दिलचस्प होने की संभावना है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
