सिद्धारमैया ने दिया इस्तीफा, डीके शिवकुमार होंगे नए मुख्यमंत्री! कांग्रेस में सत्ता परिवर्तन तय
कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव हो गया है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने गुरुवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव हो गया है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने गुरुवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। बेंगलुरु में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि कांग्रेस हाईकमान के निर्देश के बाद उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला लिया। सिद्धारमैया ने साफ कहा कि उन्होंने पहले ही पार्टी नेतृत्व से कह दिया था कि जब भी हाईकमान कहेगा, वह मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिद्धारमैया ने कहा, “मैंने पहले ही कहा था कि हाईकमान जब कहेगा, मैं इस्तीफा दे दूंगा। कल हाईकमान ने कहा और आज मैंने इस्तीफा दे दिया।”
हालांकि प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कांग्रेस की ओर से अगले मुख्यमंत्री के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई, लेकिन पार्टी सूत्रों और मंत्रियों के बयानों से यह लगभग तय माना जा रहा है कि डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ही कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री होंगे।
राज्यपाल के सचिव को सौंपा इस्तीफा
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बताया कि उन्होंने अपना इस्तीफा राज्यपाल थावरचंद गहलोत के सचिव को सौंप दिया है। दरअसल, राज्यपाल इस समय निजी कारणों से बेंगलुरु से बाहर हैं और अपने गृह नगर इंदौर गए हुए हैं।

सिद्धारमैया के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार भी मौजूद थे। दोनों नेताओं ने एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह साफ संकेत माना जा रहा है कि अब राज्य में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
बैठक में भावुक हुए डीके शिवकुमार
इस्तीफे से पहले सिद्धारमैया ने अपने आवास पर मंत्रियों के साथ अहम बैठक की। इस दौरान कांग्रेस नेताओं के बीच भावुक दृश्य भी देखने को मिले।
बैठक के दौरान डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। इसके बाद दोनों नेता गले मिले। यह तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल Media पर तेजी से वायरल हो गईं और इसे कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन का प्रतीक माना गया।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस नेतृत्व सत्ता हस्तांतरण को सौहार्दपूर्ण तरीके से दिखाने की कोशिश कर रहा है ताकि पार्टी में किसी तरह का खुला विवाद सामने न आए।
रोटेशनल सीएम फॉर्मूले के तहत हटे सिद्धारमैया
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, सिद्धारमैया का इस्तीफा पार्टी के कथित रोटेशनल सीएम फॉर्मूले का हिस्सा है। 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच लंबी खींचतान चली थी।
उस समय राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान ने समझौते के तहत सत्ता साझा करने का फॉर्मूला तय किया था। हालांकि कांग्रेस ने कभी आधिकारिक तौर पर इस समझौते को स्वीकार नहीं किया, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह लगातार चर्चा का विषय रहा।
सिद्धारमैया 20 मई 2023 को मुख्यमंत्री बने थे और 28 मई 2026 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया। यानी वह लगभग तीन साल तक मुख्यमंत्री पद पर रहे। इसी बीच पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन का दबाव लगातार बढ़ता गया।
घोटालों और एंटी-इंकम्बेंसी से भी बढ़ा दबाव
सिद्धारमैया सरकार हाल के महीनों में कई विवादों और आरोपों में घिर गई थी। खासतौर पर वाल्मीकि डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन घोटाले ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया।
कांग्रेस नेतृत्व का मानना था कि समय रहते नेतृत्व परिवर्तन करने से सरकार के खिलाफ बढ़ रही एंटी-इंकम्बेंसी को कम किया जा सकता है। पार्टी यह भी चाहती है कि 2028 विधानसभा चुनाव से पहले संगठन और सरकार दोनों को नई ऊर्जा मिले।
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस हाईकमान ने यह फैसला राजनीतिक नुकसान को कम करने और नए नेतृत्व के जरिए जनता के बीच सकारात्मक संदेश देने के उद्देश्य से लिया है।
डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय
राज्य सरकार में मंत्री एचके पाटिल ने साफ संकेत दे दिया है कि डीके शिवकुमार के नाम पर सहमति बन चुकी है। उन्होंने कहा कि शुक्रवार को कांग्रेस विधायक दल की बैठक में डीके शिवकुमार को नेता चुना जाएगा।
इसके बाद कांग्रेस राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश करेगी। माना जा रहा है कि अगले 24 घंटे में कर्नाटक को नया मुख्यमंत्री मिल जाएगा।

डीके शिवकुमार लंबे समय से मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे हैं। 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत में उनकी रणनीतिक भूमिका को बेहद अहम माना गया था। पार्टी संगठन में उनकी मजबूत पकड़ और वोक्कालिगा समुदाय में प्रभाव उन्हें कांग्रेस का बड़ा नेता बनाता है।
वोक्कालिगा राजनीति का बढ़ेगा प्रभाव
डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। कर्नाटक की राजनीति में यह समुदाय बेहद प्रभावशाली माना जाता है, खासकर दक्षिण कर्नाटक में।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य सरकार और संगठन में वोक्कालिगा नेताओं का प्रभाव बढ़ सकता है।
सूत्रों के अनुसार, डीके कैबिनेट में बड़े स्तर पर फेरबदल भी संभव है। वर्तमान 35 मंत्रियों में से करीब 25 मंत्रियों को हटाया जा सकता है और 15 से 20 नए चेहरों को मौका मिल सकता है।
दो डिप्टी सीएम फॉर्मूला भी संभव
कांग्रेस नेतृत्व सामाजिक और राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए दो डिप्टी सीएम बनाने पर भी विचार कर सकता है। पार्टी ओबीसी या दलित समुदाय से किसी बड़े चेहरे को उपमुख्यमंत्री बना सकती है।
इसके अलावा कांग्रेस कुरुबा, दलित, मुस्लिम और लिंगायत नेताओं को भी ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की रणनीति बना रही है ताकि सभी प्रमुख समुदायों को साधा जा सके।
कांग्रेस यह भी चाहती है कि लिंगायत नेताओं को अहम जिम्मेदारी देकर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाई जाए।
2023 चुनाव के बाद पांच दिन चला था सस्पेंस
13 मई 2023 को आए कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणामों में कांग्रेस ने 224 में से 135 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। भाजपा को 66 और जेडीएस को 19 सीटें मिली थीं।
लेकिन जीत के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर कांग्रेस में बड़ा सियासी संघर्ष देखने को मिला। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दोनों मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे।
करीब पांच दिन तक कांग्रेस हाईकमान को लगातार मंथन करना पड़ा। सोनिया गांधी के हस्तक्षेप और लंबी बातचीत के बाद डीके शिवकुमार को मनाया गया और सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाया गया।
उस समय डीके शिवकुमार के समर्थक उनके लिए मुख्यमंत्री पद की मांग पर अड़े हुए थे, लेकिन आखिरकार पार्टी के फैसले के बाद उन्होंने डिप्टी सीएम पद स्वीकार किया।
AHINDA फॉर्मूले से मिली थी जीत
2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने AHINDA फॉर्मूले के दम पर शानदार जीत दर्ज की थी। AHINDA का मतलब है – अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित।
सिद्धारमैया खुद ओबीसी की कुरुबा जाति से आते हैं, इसलिए पिछड़े वर्ग में उनकी मजबूत पकड़ रही। कांग्रेस ने अपनी कैबिनेट में दलित, मुस्लिम, ओबीसी, वोक्कालिगा और लिंगायत नेताओं को संतुलित प्रतिनिधित्व देकर सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश की थी।
अब डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह इन सामाजिक समीकरणों को किस तरह संतुलित रखती है।
कर्नाटक में कांग्रेस का यह सत्ता परिवर्तन केवल नेतृत्व बदलने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आगामी चुनावी रणनीति और सामाजिक संतुलन के बड़े प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
