चिराग को हम प्रमुख ने दिखाया आइना, संतोष सुमन बोले- सवर्णों को 10% आरक्षण की पहल मांझी ने की थी
हम का चिराग को जवाब, संतोष सुमन ने मांझी के फैसले का दिया हवाला
निष्कर्ष भारत संवाददाता, पटना। हम का चिराग को जवाब अब बिहार की आरक्षण राजनीति में चर्चा का नया मुद्दा बन गया है। एनडीए के भीतर आरक्षण के भीतर आरक्षण यानी कोटे में कोटा, क्रीमी लेयर और आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के अधिकार को लेकर सहयोगी दलों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के रुख पर हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन ने पलटवार किया है। सुमन ने सवर्णों के लिए आरक्षण की पहल का श्रेय पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की सरकार को दिया है।
मामला तब गरमाया जब चिराग पासवान ने कहा कि एनडीए सरकार सवर्ण समाज की आशंकाओं को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है। उनका कहना था कि वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के साथ यह भी जरूरी है कि किसी दूसरे सामाजिक समूह के साथ अन्याय न हो। चिराग ने यह भी कहा कि अगर ऊंची जातियों के लोगों को लगता है कि उन्हें न्याय की जरूरत है तो उनकी मदद करना भी उनकी जिम्मेदारी है।
यहीं से आरक्षण के मुद्दे पर एनडीए के भीतर अलग-अलग राजनीतिक सुर दिखाई देने लगे। एक ओर चिराग पासवान सामाजिक समूहों की चिंताओं को सामने रख रहे हैं, वहीं हम ने अपने राजनीतिक इतिहास का हवाला देते हुए सवर्ण आरक्षण की पहल को लेकर अपना दावा पेश किया है।
हम ने मांझी सरकार के फैसले का दिया हवाला
हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष कुमार सुमन ने कहा कि आज कुछ लोग सवर्ण समाज के हितों की बात कर रहे हैं, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए आरक्षण की पहल करने वालों में जीतन राम मांझी सबसे आगे रहे। सुमन के मुताबिक फरवरी 2015 में बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए मांझी की कैबिनेट ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पारित किया था।
हम का कहना है कि मांझी सरकार का यह फैसला लागू नहीं हो सका, क्योंकि इसके कुछ समय बाद जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री पद से हट गए। पार्टी इसी फैसले को आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए आरक्षण की शुरुआती पहलों में से एक के तौर पर सामने रख रही है।
हालांकि, इस दावे को लेकर राजनीतिक बहस का केंद्र सिर्फ पुराना कैबिनेट फैसला नहीं है। इसके साथ यह सवाल भी जुड़ गया है कि गरीब सवर्णों के आरक्षण की राजनीति में किस दल और नेता की क्या भूमिका रही है। बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति के बीच अब यह मुद्दा नए राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनता दिख रहा है।
चिराग के समर्थन में अरुण भारती का पोस्ट
चिराग पासवान के रुख को मजबूती देने के लिए लोजपा (रामविलास) के सांसद अरुण भारती ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए पार्टी की विचारधारा सामने रखी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी किसी एक जाति की नहीं बल्कि सभी समाज की बात करती है।

अरुण भारती ने पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के राजनीतिक योगदान का उल्लेख करते हुए अलग-अलग आरक्षण से जुड़े फैसलों और आंदोलनों में उनकी भूमिका का दावा किया। पोस्ट में उन्होंने पिछड़े समाज के आरक्षण, दलित-आदिवासी सुरक्षा कानून और सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए आरक्षण से जुड़े मुद्दों का जिक्र किया।
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उन्होंने अपनी पोस्ट के अंत में कहा, ‘हमारी सीट आरक्षित है-हमारी सोच नहीं।’ लोजपा (रामविलास) की ओर से इस संदेश को व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व और सभी वर्गों की राजनीति के तौर पर पेश किया जा रहा है।
हम ने कोटे में कोटा पर भी रखी राय
आरक्षण विवाद का दूसरा बड़ा पहलू कोटे में कोटा और क्रीमी लेयर का मुद्दा है। संतोष कुमार सुमन का कहना है कि दलित समाज के भीतर आरक्षण के लाभ की समीक्षा का उद्देश्य किसी का अधिकार छीनना नहीं है। उनके मुताबिक सवाल यह है कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे गरीब और वंचित परिवारों तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंच रहा है।
हम का तर्क है कि अगर आरक्षण का फायदा लगातार अपेक्षाकृत सक्षम परिवारों तक सीमित रहता है तो सबसे कमजोर तबकों तक अवसर पहुंचाने की व्यवस्था पर विचार होना चाहिए। पार्टी इस मुद्दे पर शांतिपूर्ण और सकारात्मक बहस की जरूरत बता रही है।
यही मुद्दा एनडीए के भीतर वैचारिक अंतर को भी सामने ला रहा है। आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था में किसी बदलाव को लेकर सामाजिक संवेदनशीलता अपनी जगह है, जबकि उसका लाभ सबसे वंचित लोगों तक पहुंचाने की मांग दूसरी तरफ है।
डीएमए में सवर्ण आरक्षण का मुद्दा फिर चर्चा में
आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के आरक्षण का मुद्दा भी इसी बहस के बीच फिर सुर्खियों में है। संतोष सुमन ने कहा कि गरीब की परेशानी जाति देखकर नहीं आती। उनके मुताबिक गरीबी अगड़े, पिछड़े, दलित या सवर्ण किसी भी सामाजिक पहचान के व्यक्ति के सामने हो सकती है।

हम इसी आधार पर अपनी राजनीति को हर जाति और वर्ग के गरीबों से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। पार्टी का कहना है कि सामाजिक न्याय की बहस में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के अधिकार को भी पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए।
सवर्णों की चिंता पर हम का सवाल
संतोष सुमन ने चिराग खेमे पर अप्रत्यक्ष निशाना साधते हुए यह सवाल भी उठाया कि सवर्ण समाज के एक वर्ग की ओर से सोशल मीडिया पर सवाल उठाए जाने के बाद ही सवर्ण हितों की चर्चा तेज क्यों हुई। उनका कहना था कि गरीब सवर्णों की चिंता करना अच्छी बात है, लेकिन गरीबों की चिंता राजनीतिक दबाव के बाद शुरू नहीं होनी चाहिए।
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इस बयान से साफ है कि विवाद केवल आरक्षण की नीति तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बिहार में अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच राजनीतिक पहुंच और प्रतिनिधित्व का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
एनडीए के भीतर बढ़ी आरक्षण पर बहस
चिराग पासवान और संतोष कुमार सुमन के बयानों ने एनडीए के भीतर आरक्षण के मुद्दे को नई राजनीतिक बहस दे दी है। एक तरफ आरक्षण व्यवस्था में बदलाव को लेकर आशंकाएं हैं तो दूसरी तरफ कोटे के भीतर सबसे वंचित वर्गों को अधिक लाभ देने की मांग है। इसी के साथ गरीब सवर्णों के आरक्षण का मुद्दा भी राजनीतिक विमर्श में शामिल हो गया है।
आने वाले दिनों में कोटे में कोटा, क्रीमी लेयर, गरीब सवर्णों के अधिकार और आरक्षण के लाभ के समान वितरण जैसे मुद्दे बिहार की राजनीति में और जोर पकड़ सकते हैं। फिलहाल सहयोगी दलों के बीच जारी बयानबाजी यह संकेत दे रही है कि आरक्षण का सवाल आने वाले राजनीतिक दौर में एनडीए के लिए भी संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा बना रहेगा।
अमन कुमार की रिपोर्ट
