पटना हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला: माता-पिता के जीवित रहते PPO में दर्ज होगा दिव्यांग संतान का नाम
हाईकोर्ट का फैसला, माता-पिता के रहते PPO में दर्ज होगा नाम
निष्कर्ष भारत, संवाददाता नई दिल्ली। दिव्यांग आश्रित बच्चों के भविष्य और पारिवारिक पेंशन के अधिकार को लेकर पटना हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पेंशनर माता-पिता के जीवित रहते भी उनकी दिव्यांग संतान का नाम पेंशन भुगतान आदेश यानी PPO में दर्ज किया जा सकता है। इसके लिए माता-पिता की मृत्यु का इंतजार करना जरूरी नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि PPO में दिव्यांग संतान का नाम दर्ज करना मूल रूप से एक प्रशासनिक प्रक्रिया है। नाम दर्ज होने का मतलब यह नहीं है कि माता-पिता के जीवित रहते ही पारिवारिक पेंशन का भुगतान शुरू हो जाएगा। ऐसे में केवल इस आधार पर नाम दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता कि पारिवारिक पेंशन का अधिकार भविष्य में माता-पिता की मृत्यु के बाद प्रभावी होगा।
यह फैसला सोनपुर, सारण निवासी सेवानिवृत्त चपरासी रामानंद राय की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पूर्णेन्दु सिंह की एकलपीठ ने की।
हाईकोर्ट ने माना, भविष्य की सुरक्षा जरूरी
मामले में रामानंद राय ने अपने बेटे दीपक कुमार पुष्पेन्द्र का नाम PPO में दर्ज कराने की मांग की थी। उनके बेटे को 50 प्रतिशत लोकोमोटर दिव्यांगता है। याचिकाकर्ता का उद्देश्य यह था कि भविष्य में उनके नहीं रहने की स्थिति में बेटे को पारिवारिक पेंशन के अधिकार को लेकर अनावश्यक प्रशासनिक परेशानी का सामना न करना पड़े।
सरकारी पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया कि दिव्यांग संतान के पारिवारिक पेंशन के अधिकार पर माता-पिता की मृत्यु के बाद ही विचार किया जा सकता है। वित्त विभाग और महालेखाकार कार्यालय की ओर से इसी आधार पर वर्तमान समय में नाम दर्ज करने को लेकर आपत्ति जताई गई थी।
देखे खबर हमारे यूट्यूब चैनल पर: राजद का राजभवन मार्च! डाकबंगला चौराहे पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम
लेकिन पटना हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि नाम PPO में दर्ज करने और पारिवारिक पेंशन के भुगतान, दोनों को एक ही प्रक्रिया मानना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर उठाया सवाल
अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि PPO में नाम दर्ज होने से तत्काल पेंशन भुगतान का दावा पैदा नहीं होता। इसलिए किसी दिव्यांग आश्रित का नाम पहले से दर्ज कर देने में प्रशासनिक बाधा नहीं होनी चाहिए।
कोर्ट की चिंता इस बात को लेकर भी थी कि यदि माता-पिता की मृत्यु के बाद ही प्रक्रिया शुरू की जाएगी तो दिव्यांग आश्रित को कई तरह की कागजी और प्रशासनिक औपचारिकताओं से गुजरना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति के लिए कठिनाई और बढ़ सकती है, जो पहले से ही किसी दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहा है।
माता-पिता की मृत्यु के बाद देरी से बढ़ सकती है परेशानी
पेंशनर माता-पिता के लिए सबसे बड़ी चिंता अक्सर यही होती है कि उनके बाद आश्रित बच्चे की आर्थिक सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। खासकर ऐसे परिवारों में जहां दिव्यांग संतान अपनी आजीविका के लिए माता-पिता पर निर्भर है, वहां भविष्य की पेंशन व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।
हाईकोर्ट ने इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद बढ़ती महंगाई, इलाज पर होने वाला खर्च और दिव्यांग संतान की विशेष जरूरतों को देखते हुए भविष्य की सुरक्षा पहले से सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाना जरूरी है।

अदालत के अनुसार, माता-पिता के जीवित रहते नाम PPO में दर्ज होने से दिव्यांग संतान को तत्काल पारिवारिक पेंशन नहीं मिलेगी। इसका फायदा मुख्य रूप से यह होगा कि भविष्य में अधिकार तय करने की प्रक्रिया पहले से स्पष्ट रहेगी।
दिव्यांग संतान के लिए हाईकोर्ट का फैसला क्यों अहम?
यह फैसला केवल एक परिवार तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसका महत्व उन पेंशनर परिवारों के लिए भी है, जिनकी दिव्यांग संतान भविष्य में पारिवारिक पेंशन पर निर्भर हो सकती है।
माता-पिता की मृत्यु के बाद यदि पहली बार दस्तावेज जुटाने, पात्रता साबित करने और नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू होती है तो इसमें समय लग सकता है। इस दौरान आश्रित परिवार आर्थिक संकट में भी फंस सकता है।
PPO में पहले से नाम दर्ज होने की व्यवस्था ऐसी स्थिति में प्रशासनिक प्रक्रिया को आसान बना सकती है। हालांकि पारिवारिक पेंशन का वास्तविक भुगतान संबंधित नियमों और पात्रता की शर्तों के अनुसार ही होगा।
हाईकोर्ट ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम की भावना का दिया हवाला
अदालत ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की भावना का भी उल्लेख किया। हाईकोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा हो सके।
अदालत का संदेश स्पष्ट है कि केवल तकनीकी या प्रक्रियात्मक वजहों से किसी दिव्यांग आश्रित के भविष्य को अनिश्चित स्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए। प्रशासनिक नियमों की व्याख्या करते समय दिव्यांगजन के अधिकार और उनकी वास्तविक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
बिहार पेंशन नियमावली में बदलाव का सुझाव
पटना हाईकोर्ट ने बिहार के मुख्य सचिव को भी महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। अदालत ने कहा कि जरूरत महसूस होने पर बिहार पेंशन नियमावली में उचित संशोधन किया जा सकता है, ताकि भविष्य में दिव्यांग आश्रितों के नाम PPO में दर्ज कराने को लेकर किसी तरह की परेशानी न हो।

इस सुझाव का उद्देश्य केवल मौजूदा मामले का समाधान करना नहीं है, बल्कि भविष्य में सामने आने वाले समान मामलों के लिए प्रक्रिया को स्पष्ट और आसान बनाना भी है।
अगर नियमों में आवश्यक बदलाव किया जाता है तो पेंशनर माता-पिता को अपने दिव्यांग बच्चों की भविष्य की आर्थिक सुरक्षा को लेकर अधिक स्पष्ट व्यवस्था मिल सकती है।
अधिकारियों को हाईकोर्ट का त्वरित कार्रवाई का निर्देश
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई करते हुए याचिकाकर्ता के मामले का शीघ्र निष्पादन करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया।
फैसले के बाद उन परिवारों को राहत की उम्मीद है, जिनके दिव्यांग आश्रित बच्चों के नाम पेंशन संबंधी दस्तावेजों में दर्ज कराने को लेकर प्रशासनिक अड़चनें सामने आती रही हैं।
अब दिव्यांग आश्रितों की सुरक्षा पर जोर
पटना हाईकोर्ट के इस फैसले का मूल संदेश यही है कि दिव्यांग संतान के भविष्य की सुरक्षा के लिए माता-पिता की मृत्यु तक इंतजार करना हर स्थिति में जरूरी नहीं है। PPO में नाम पहले दर्ज किया जा सकता है और पारिवारिक पेंशन का भुगतान संबंधित पात्रता के अनुसार बाद में शुरू होगा।
इस फैसले से प्रशासन के लिए भी एक महत्वपूर्ण दिशा सामने आई है कि पेंशन और दिव्यांग आश्रितों से जुड़े मामलों में केवल कागजी प्रक्रिया को प्राथमिकता देने के बजाय व्यक्ति की वास्तविक जरूरत और भविष्य की सुरक्षा को भी ध्यान में रखा जाए।
रामानंद राय की याचिका से शुरू हुआ यह मामला अब उन अनेक पेंशनर परिवारों के लिए महत्वपूर्ण संदेश बन गया है, जो अपने दिव्यांग बच्चों की आर्थिक सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं। आने वाले समय में बिहार पेंशन नियमावली में किसी बदलाव के जरिए इस व्यवस्था को और स्पष्ट किया जाता है या नहीं, इस पर भी नजर रहेगी।
राजकुमार सिंह की रिपोर्ट
