फोन से फ्रिज तक सब EMI पर…कैसे बदल गया भारत का कर्ज बाजार? 10 साल में बदली कर्ज की तस्वीर

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EMI से बदला भारत का कर्ज बाजार, फोन-फ्रिज तक पहुंचा लोन का चलन

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (नई दिल्ली)। भारत में EMI पर कर्ज लेने की तस्वीर पिछले एक दशक में तेजी से बदली है। कभी पहली बार लोन लेने वाले ग्राहकों के लिए खेती, किसान क्रेडिट कार्ड और टू-व्हीलर बड़े क्रेडिट प्रोडक्ट हुआ करते थे। अब मोबाइल फोन, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और दूसरे कंज्यूमर-ड्यूरेबल्स भी लोगों के औपचारिक क्रेडिट सफर की शुरुआत बन रहे हैं। यानी कर्ज अब केवल बड़े खर्च की जरूरत नहीं रह गया, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतों और सुविधाओं से भी जुड़ता जा रहा है।

ट्रांसयूनियन सिबिल और फाइनेंस इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल (FIDC) की स्टडी के मुताबिक, जून 2026 में खत्म हुई तिमाही में पहली बार क्रेडिट लेने वाले ग्राहकों यानी न्यू-टू-क्रेडिट (NTC) को दिए गए लोन में NBFCs की हिस्सेदारी 50 फीसदी तक पहुंच गई। दस साल पहले जून 2016 में इसी अवधि में यह हिस्सेदारी 24 फीसदी थी। यानी NTC ग्राहकों को कर्ज देने में NBFCs की भूमिका एक दशक में दोगुने से ज्यादा बढ़ी है।

NTC ग्राहकों के लिए बदल गया पहला कर्ज

न्यू-टू-क्रेडिट यानी NTC उन ग्राहकों को कहा जाता है, जिनका रिटेल क्रेडिट ब्यूरो में पहले कोई लोन रिकॉर्ड नहीं होता। ऐसे ग्राहक जब पहली बार औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से कर्ज लेते हैं तो उनका पहला लोन उनके क्रेडिट प्रोफाइल की शुरुआत करता है।

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2026 की पहली छमाही में ऐसे ग्राहकों के बीच कंज्यूमर-ड्यूरेबल लोन सबसे बड़ा प्रोडक्ट बनकर सामने आया। जनवरी से जून 2026 के बीच NTC लोन में इसकी हिस्सेदारी 30 फीसदी रही। इसके बाद पर्सनल लोन 12 फीसदी, गोल्ड लोन 11 फीसदी और टू-व्हीलर लोन 10 फीसदी पर रहे। बाकी 37 फीसदी लोन दूसरे क्रेडिट प्रोडक्ट्स के थे।

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इस बदलाव का सीधा मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति कर्ज लेकर महंगे सामान खरीद रहा है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पहली बार क्रेडिट लेने वाले लोगों के लिए उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद अब औपचारिक कर्ज व्यवस्था में प्रवेश का महत्वपूर्ण रास्ता बन चुकी है।

2016 में तस्वीर बिल्कुल अलग थी

दस साल पहले NTC ग्राहकों के लिए क्रेडिट का पैटर्न काफी अलग था। 2016 की पहली छमाही में किसान क्रेडिट कार्ड सबसे बड़ा प्रोडक्ट था और इसकी हिस्सेदारी 18 फीसदी थी। इसके बाद एग्रीकल्चर लोन 11 फीसदी, टू-व्हीलर लोन 10 फीसदी, गोल्ड लोन 8 फीसदी और कंज्यूमर-ड्यूरेबल लोन केवल 6 फीसदी था।

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अब तस्वीर बदल चुकी है। खेती और वाहन जैसे अपेक्षाकृत बड़े खर्चों के साथ-साथ छोटे टिकट वाले कंज्यूमर लोन भी तेजी से क्रेडिट सिस्टम का हिस्सा बन रहे हैं।

EMI पर मोबाइल खरीदना बना नया ट्रेंड

कंज्यूमर-ड्यूरेबल लोन में मोबाइल फोन फाइनेंसिंग तेजी से बढ़ने वाला हिस्सा बताया जा रहा है। ट्रांसयूनियन सिबिल के मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एग्जीक्यूटिव भावेश जैन के मुताबिक, युवा कर्जदारों के लिए मोबाइल फोन अक्सर शुरुआती क्रेडिट प्रोडक्ट बन रहा है।

युवा ग्राहक फोन को EMI पर खरीदकर पहली बार औपचारिक क्रेडिट सिस्टम में प्रवेश कर सकते हैं। खासकर ऐसे लोगों के लिए जिनका पहले कोई लोन रिकॉर्ड नहीं रहा है, यह उनके क्रेडिट इतिहास की शुरुआत बन सकता है।

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2026 की पहली छमाही में जेनरेशन Z के उधारकर्ताओं को दिए गए करीब 46 फीसदी क्रेडिट NBFCs से मिले। हालांकि, CIBIL के उपलब्ध डेटा में मोबाइल फोन के लिए लिए गए लोन को अलग से पहचानना संभव नहीं है। इसलिए छोटे टिकट साइज वाले कंज्यूमर-ड्यूरेबल लोन के आंकड़ों से फोन फाइनेंसिंग के बढ़ते चलन का अंदाजा लगाया जाता है।

छोटे लोन और बढ़ती EMI

कंज्यूमर-ड्यूरेबल लोन के बढ़ते चलन की एक बड़ी खासियत इसका छोटा टिकट साइज है। जून 2026 में समाप्त हुई तिमाही में कंज्यूमर-ड्यूरेबल लोन में 50 हजार रुपये से कम राशि वाले लोन की हिस्सेदारी 93 फीसदी थी।

यह आंकड़ा बताता है कि इस श्रेणी के अधिकांश लोन बड़े और महंगे खर्च के लिए नहीं हैं। इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से अपेक्षाकृत छोटी कीमत वाले इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू सामान खरीदने के लिए किया जा रहा है।

इन छोटे टिकट वाले कंज्यूमर-ड्यूरेबल लोन की संख्या जून 2019 में समाप्त हुई तिमाही की तुलना में 2.6 गुना बढ़ चुकी है। यानी कुछ ही वर्षों में छोटे कर्ज का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों का दायरा काफी बढ़ा है।

क्या EMI के बोझ में फंस रहा आम आदमी?

यहीं से सबसे बड़ा सवाल सामने आता है। अगर मोबाइल, फ्रिज, टीवी और वॉशिंग मशीन जैसी चीजें भी आसानी से EMI पर मिलने लगें तो क्या लोग जरूरत से ज्यादा कर्ज लेने लगेंगे?

आंकड़ों से फिलहाल सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आम आदमी कर्ज के बोझ तले दब रहा है। NTC ग्राहकों की संख्या बढ़ना या कंज्यूमर-ड्यूरेबल लोन बढ़ना अपने आप में वित्तीय संकट का प्रमाण नहीं है। इसके लिए आय, कुल बकाया कर्ज, EMI भुगतान क्षमता, डिफॉल्ट और क्रेडिट व्यवहार जैसे कई दूसरे आंकड़ों को भी देखना होगा।

फिर भी EMI आधारित खरीदारी के बढ़ते चलन से घरेलू बजट पर कर्ज की भूमिका जरूर बढ़ रही है। एक छोटा EMI भुगतान अलग से देखने पर मामूली लग सकता है, लेकिन कई उत्पादों की EMI एक साथ चलने पर मासिक खर्च का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में जा सकता है।

NBFCs की बढ़ती भूमिका

इस पूरी तस्वीर में NBFCs की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। 2016 में NTC ग्राहकों को दिए गए कर्ज में NBFCs की हिस्सेदारी 24 फीसदी थी, जो जून 2026 में समाप्त तिमाही में 50 फीसदी हो गई।

इस बदलाव से पता चलता है कि पहली बार कर्ज लेने वाले ग्राहकों तक पहुंचने में NBFCs की मौजूदगी काफी बढ़ी है। छोटे टिकट वाले कंज्यूमर लोन, डिजिटल आवेदन और EMI आधारित खरीदारी ने इस बाजार के विस्तार में भूमिका निभाई है।

युवाओं के कर्ज लेने का तरीका भी बदला

कर्ज बाजार में बदलाव का एक हिस्सा युवा ग्राहकों से भी जुड़ा है। जेनरेशन Z के ग्राहकों में NBFCs की हिस्सेदारी 2026 की पहली छमाही में करीब 46 फीसदी रही।

महामारी के बाद स्मार्टफोन की बढ़ती जरूरत, डिजिटल क्रेडिट की आसान उपलब्धता और EMI पर सामान खरीदने की सुविधा ने युवा ग्राहकों के क्रेडिट व्यवहार को प्रभावित किया है। हालांकि, इन बदलावों के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं और किसी एक वजह को निर्णायक मानना उचित नहीं होगा।

कर्ज बाजार की बदलती तस्वीर क्या कहती है?

दस साल पहले जहां पहला कर्ज खेती, किसान क्रेडिट कार्ड या बाइक से जुड़ा हो सकता था, वहीं अब मोबाइल फोन और घरेलू उपकरण भी क्रेडिट इतिहास की शुरुआत बन रहे हैं। यह बदलाव भारत के औपचारिक क्रेडिट बाजार के विस्तार की तस्वीर दिखाता है।

लेकिन इस बदलाव के साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है। EMI पर सामान खरीदना अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन ग्राहक के लिए जरूरी है कि वह ब्याज, प्रोसेसिंग फीस, कुल भुगतान और अपनी मासिक आय के मुकाबले EMI का बोझ समझकर फैसला करे।

भारत का कर्ज बाजार अब केवल बड़े लोन का बाजार नहीं रहा। छोटे-छोटे कर्ज, डिजिटल क्रेडिट और EMI ने इसे रोजमर्रा की खरीदारी से जोड़ दिया है। आने वाले वर्षों में यह बदलाव किस तरह उपभोक्ताओं की वित्तीय आदतों और घरेलू बजट को प्रभावित करता है, यह देखने वाली बात होगी।

Nishkarsh Bharat

राज कुमार की रिपोर्ट