पाली की धरती पर पाली बेगानी! क्या बिहार राजनीतिक रूप से ‘विकलांग’ हो चुका? केंद्र की उदासीनता पर बड़ा सवाल
बिहार में पाली भाषा की अनदेखी पर सवाल, केंद्र की नीति पर उठी आवाज
- जिस बिहार की धरती बौद्ध परंपरा और पाली साहित्य की महत्वपूर्ण विरासत समेटे है, वहीं पाली के संरक्षण का केंद्र दूसरे राज्य में क्यों? राजनीतिक नेतृत्व की खामोशी पर उठ रहे सवाल
निष्कर्ष भारत, संवाददाता ( पटना)। भगवान बुद्ध का नाम आते ही भारत की जिस धरती की तस्वीर सबसे पहले उभरती है, उनमें बिहार का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। बोधगया, राजगीर, नालंदा, वैशाली और गया जैसे स्थान केवल बिहार के नक्शे पर दर्ज शहर नहीं हैं, बल्कि दुनिया की बौद्ध विरासत के जीवंत अध्याय हैं। यही वह बिहार है, जहां बुद्ध के जीवन, दर्शन और बौद्ध परंपरा की असंख्य स्मृतियां आज भी मौजूद हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जिस बिहार की पहचान बुद्ध और बौद्ध विरासत से इतनी गहराई से जुड़ी है, क्या उसी बिहार की राजनीतिक आवाज आज इतनी कमजोर हो गई है कि अपनी ही भाषाई-सांस्कृतिक विरासत के लिए उसे केंद्र के सामने सवाल तक उठाने में संकोच हो रहा है?
पाली भाषा को लेकर यही सवाल आज गंभीर, बहस की मांग
पाली बौद्ध धर्म के प्राचीन साहित्य की प्रमुख भाषाओं में रही है। त्रिपिटक सहित बौद्ध साहित्य का विशाल हिस्सा पाली में संरक्षित है। दुनिया के कई देशों में आज भी पाली का अध्ययन बौद्ध दर्शन और इतिहास को समझने के लिए किया जाता है।
भारत सरकार ने भी भारतीय भाषाओं और शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण एवं अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न संस्थागत पहलों पर जोर दिया है। ऐसे में सवाल केवल किसी भाषा को पढ़ाने का नहीं है। सवाल यह है कि उस भाषा से जुड़ी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमि को संस्थागत संरक्षण में कितना स्थान दिया जा रहा है? यहीं से बिहार का सवाल शुरू होता है।
पाली की विरासत और बिहार का रिश्ता
यहां एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। भगवान बुद्ध का पहला उपदेश सारनाथ में हुआ था, जिसे धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त से जोड़ा जाता है। वहीं बोधगया वह स्थान है जहां बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ। इसलिए बुद्ध के जीवन और पाली बौद्ध साहित्य को केवल किसी एक स्थान या राज्य तक सीमित करना इतिहास को सरल बनाना होगा। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
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बिहार बुद्ध की कर्मभूमि का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। नालंदा और विक्रमशिला जैसी महान बौद्ध शिक्षा परंपराएं इसी क्षेत्र में विकसित हुईं। राजगीर और वैशाली बौद्ध इतिहास के महत्वपूर्ण केंद्र रहे। इसलिए पाली, बौद्ध दर्शन और बिहार के बीच संबंध को नकारा नहीं जा सकता।
फिर सवाल उठता है—अगर पाली के संरक्षण और उत्कृष्ट अध्ययन के लिए Centre of Excellence बनाया जा रहा है, तो बिहार इस व्यवस्था में स्वाभाविक दावेदार क्यों नहीं हो सकता?
पाली Centre of Excellence पर बिहार क्यों चुप है?
यही वह प्रश्न है जिस पर बिहार की राजनीति को जवाब देना चाहिए। अगर केंद्र सरकार किसी भाषा के संरक्षण के लिए Centre of Excellence स्थापित करने का निर्णय लेती है तो स्वाभाविक रूप से सवाल पूछा जाना चाहिए कि उस भाषा की ऐतिहासिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत से सबसे मजबूत संबंध रखने वाले क्षेत्रों को इसमें कितना महत्व दिया गया।
यदि पाली से संबंधित Centre of Excellence के लिए ओडिशा को चुना गया है, तो बिहार के राजनीतिक नेतृत्व को केंद्र से यह पूछने का पूरा अधिकार है कि बिहार को क्यों नहीं चुना गया? यह सवाल किसी राज्य के खिलाफ नहीं है। यह सवाल बिहार के पक्ष में है।
ओडिशा में संस्थान बने, इसमें कोई समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब बिहार अपने हिस्से का सवाल पूछना ही भूल जाए।
क्या बिहार की राजनीति ने सवाल पूछना छोड़ दिया है?
क्या बिहार के राजनीतिक दल केवल चुनाव के समय बिहार की अस्मिता, गौरव और विरासत की बात करेंगे?
क्या बिहार की राजनीति का मतलब केवल जातीय समीकरण, सीटों का बंटवारा, मुख्यमंत्री कौन बनेगा और किस गठबंधन में कौन जाएगा रह गया है?
क्या नालंदा की विरासत चुनावी भाषणों में इस्तेमाल होने वाला एक शब्द मात्र रह गई है?
क्या बोधगया का नाम केवल पर्यटन प्रचार तक सीमित रहेगा?
और क्या बुद्ध की धरती पर पाली भाषा के लिए एक बड़ा राष्ट्रीय संस्थान मांगना भी बिहार की राजनीति की प्राथमिकता नहीं है?
अगर इन सवालों का जवाब ‘हां’ है तो समस्या केवल केंद्र की नहीं है।
समस्या बिहार की राजनीतिक प्राथमिकताओं की भी है।
केंद्र से सवाल, लेकिन बिहार से भी बड़ा सवाल
केंद्र सरकार से सवाल पूछना आसान है। लेकिन बिहार के राजनीतिक दलों से सवाल पूछना ज्यादा जरूरी है। बिहार के सांसद संसद में इस मुद्दे को कितनी बार उठाते हैं? राज्य सरकार ने केंद्र को पाली अध्ययन के लिए राष्ट्रीय स्तर के संस्थान का प्रस्ताव कब भेजा?
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क्या बिहार में पाली भाषा, बौद्ध दर्शन और प्राचीन भारतीय भाषाओं के लिए एक विश्वस्तरीय Centre of Excellence बनाने की कोई ठोस योजना है?
क्या नालंदा विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय या किसी अन्य उच्च शिक्षण संस्थान को पाली अध्ययन का राष्ट्रीय केंद्र बनाने की पहल की गई?
अगर नहीं की गई तो क्यों?
और अगर की गई है तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है?
इन सवालों का जवाब जनता को मिलना चाहिए।
बिहार सिर्फ ‘बुद्ध की धरती’ कहने से महान नहीं बनेगा
बिहार को अक्सर कहा जाता है—“यह बुद्ध की धरती है”
लेकिन केवल बोर्ड लगा देने से विरासत संरक्षित नहीं होती। विरासत को विश्वविद्यालय चाहिए। शोध संस्थान चाहिए। भाषा विशेषज्ञ चाहिए। पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण चाहिए। विदेशी विश्वविद्यालयों से अकादमिक सहयोग चाहिए। पाली सीखने वाले विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति चाहिए। और सबसे जरूरी—राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए।
अगर बिहार वास्तव में बुद्ध, नालंदा और वैशाली की विरासत का दावा करता है तो उसे इस विरासत को 21वीं सदी की अकादमिक शक्ति में बदलना होगा। वरना इतिहास केवल भाषणों में बचेगा
पाली भाषा की विडंबना देखिए
एक तरफ दुनिया के कई देशों में बौद्ध अध्ययन को लेकर विश्वविद्यालय और शोध संस्थान सक्रिय हैं। दूसरी तरफ बिहार, जिसकी धरती बौद्ध इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों की साक्षी रही है, वहां पाली अध्ययन को लेकर व्यापक जनचर्चा तक दिखाई नहीं देती। बिहार की राजनीति में पुल, सड़क, नौकरी, आरक्षण और चुनावी समीकरण जरूरी हैं। लेकिन क्या ज्ञान की राजनीति जरूरी नहीं है? क्या सांस्कृतिक विरासत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए?
क्या बिहार अपने इतिहास पर संस्थागत अधिकार की मांग नहीं कर सकता?
और सबसे बड़ा सवाल—
जब बिहार अपनी विरासत के लिए दिल्ली से सवाल नहीं पूछेगा, तो आखिर कौन पूछेगा?
अब समय ‘गौरव’ बोलने का नहीं, संस्थान बनाने का है
बिहार को केंद्र सरकार से स्पष्ट रूप से मांग करनी चाहिए कि पाली भाषा और बौद्ध अध्ययन के लिए बिहार में राष्ट्रीय स्तर का Centre of Excellence स्थापित किया जाए। इसके लिए राज्य सरकार को सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल बनाना चाहिए। बिहार के सभी सांसदों को संसद में संयुक्त रूप से मुद्दा उठाना चाहिए।
नालंदा, बोधगया, राजगीर और वैशाली को जोड़ते हुए बौद्ध एवं पाली अध्ययन का एक व्यापक अकादमिक नेटवर्क तैयार किया जाना चाहिए।
क्योंकि बिहार की विरासत केवल बिहार की नहीं है।
यह भारत की विरासत है और पूरी मानवता की साझा धरोहर है।
इसलिए सवाल यह नहीं कि Centre of Excellence ओडिशा में क्यों बना।
सवाल यह है कि बिहार ने अपने लिए Centre of Excellence मांगा क्यों नहीं?
और अगर मांगा है, तो उसकी आवाज इतनी धीमी क्यों है?
शायद बिहार की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्या यही है—यहां नेता अक्सर बिहार के गौरव की बात करते हैं, लेकिन उस गौरव को संस्थागत अधिकार में बदलने की लड़ाई बहुत कम दिखाई देती है।
बुद्ध ने दुनिया को शांति का रास्ता दिखाया था।
अब बिहार की राजनीति को कम से कम अपने अधिकार के लिए सवाल पूछने का रास्ता तो सीखना ही होगा।
वरना आने वाली पीढ़ियां शायद यही पूछेंगी—
“जिस बिहार के पास बुद्ध की विरासत थी, उसके पास अपनी विरासत के लिए आवाज क्यों नहीं थी?”
राज कुमार की रिपोर्ट
