शरद पूर्णिमा आज, सर्वार्थ सिद्धि योग मां लक्ष्मी की पूजा, आज रात में क्यों खास है चंद्रमा की रोशनी?

शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा आज: जानें लक्ष्मी पूजा, खीर और चांदनी का महत्व

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (नई दिल्ली)। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा पर रविवार, 25 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में इस पूर्णिमा को विशेष पुण्य फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी शीतल चांदनी से अमृत वर्षा होती है। इसी विश्वास के चलते घरों की छतों और खुले आंगन में खीर रखी जाती है, जिसे अगले दिन भगवान को अर्पित करने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा, भगवान विष्णु का स्मरण, चंद्रमा की आराधना, दान-पुण्य और रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। कई स्थानों पर इसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागकर उनकी आराधना करने वाले भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और पंचांगों में पूजा की विधि और समय में अंतर हो सकता है।

शरद पूर्णिमा पर सर्वार्थ सिद्धि योग का महत्व

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा पर बनने वाले शुभ योग पूजा-पाठ, नए कार्यों की शुरुआत और खरीदारी के लिए अनुकूल माने जाते हैं। इस बार पर्व को रेवती और अश्विनी नक्षत्र के संयोग तथा हर्षण योग से जोड़कर देखा जा रहा है। मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में किए गए धार्मिक कार्यों से सकारात्मक फल प्राप्त होता है।

शरद पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालु सुबह स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान देते हैं। गंगा और दूसरी पवित्र नदियों में स्नान करने की भी परंपरा है। पूर्णिमा तिथि के दौरान किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों को पुण्यदायी माना जाता है।

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इस वर्ष पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को दिन में शुरू होकर 26 अक्टूबर की सुबह तक रहने की जानकारी पंचांगों में दी गई है। इसलिए रात्रि में लक्ष्मी पूजा और अगले दिन उदयातिथि के अनुसार स्नान-दान करने की परंपरा के कारण अलग-अलग कैलेंडरों में दोनों तारीखों का उल्लेख मिल सकता है।

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की रोशनी क्यों है खास?

शरद पूर्णिमा की सबसे चर्चित परंपरा चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने की है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृत तुल्य गुण होते हैं। माना जाता है कि चांदनी में रखी खीर में विशेष ऊर्जा का संचार होता है और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से सुख, शांति और आरोग्य की कामना पूरी होती है।

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परंपरा के अनुसार, दूध, चावल और चीनी से तैयार खीर को रात में साफ बर्तन में रखकर चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है। अगले दिन इसे भगवान को अर्पित करने के बाद परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। कई परिवार रात में भजन-कीर्तन करते हैं और मां लक्ष्मी तथा चंद्रदेव की पूजा करते हुए जागरण करते हैं।

हालांकि, चंद्रमा की किरणों से खीर में औषधीय गुण या रोगों को ठीक करने की शक्ति आ जाने का दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करना धार्मिक आस्था और पारिवारिक परंपरा का हिस्सा है। इसे किसी बीमारी के इलाज का विकल्प नहीं समझना चाहिए।

मां लक्ष्मी, भगवान विष्णु और कुबेर की पूजा

शरद पूर्णिमा को धन, वैभव और समृद्धि की कामना से मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस तिथि का संबंध मां लक्ष्मी के प्राकट्य से भी जोड़ा जाता है। इसी वजह से भक्त घरों में साफ-सफाई कर दीपक जलाते हैं और देवी को फूल, फल, मिठाई तथा खीर अर्पित करते हैं।

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कई घरों में मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु और धन के देवता कुबेर की पूजा भी की जाती है। कुछ परंपराओं में इंद्रदेव की आराधना का उल्लेख मिलता है। भक्त विष्णुसहस्रनाम का पाठ करते हैं और सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। चौमुखी दीपक जलाने तथा रात में दीपदान करने की भी परंपरा है।

कोजागरी पूर्णिमा के नाम से प्रचलित पूजा में रात्रि जागरण का विशेष महत्व बताया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां लक्ष्मी इस रात यह देखने के लिए भ्रमण करती हैं कि कौन जागकर उनकी आराधना कर रहा है। इसी मान्यता से जुड़ा प्रश्न ‘को जागर्ति’ यानी ‘कौन जाग रहा है’ इस पर्व के नाम और परंपरा से जोड़ा जाता है।

शरद पूर्णिमा पूजा का शुभ मुहूर्त

पर्व के अवसर पर पूजा करने वाले श्रद्धालु अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार शुभ समय का ध्यान रख सकते हैं। उपलब्ध कराए गए पंचांग विवरण के अनुसार प्रमुख मुहूर्त इस प्रकार हैं:

  • अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:11 बजे से 11:56 बजे तक
  • शुभ योग मुहूर्त: दोपहर 12:58 बजे से 2:23 बजे तक
  • प्रदोष काल: शाम 5:12 बजे से 7:53 बजे तक
  • अमृत मुहूर्त: शाम 6:48 बजे से रात 8:23 बजे तक

ये समय दिए गए पंचांग विवरण पर आधारित हैं। पूजा का सटीक मुहूर्त शहर, स्थानीय सूर्योदय-सूर्यास्त और पंचांग की गणना के अनुसार बदल सकता है। विशेष रूप से रात्रि में मां लक्ष्मी की पूजा करने वाले श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग से निशीथ काल की पुष्टि कर लेनी चाहिए।

शरद पूर्णिमा पर क्या करें और किन बातों का रखें ध्यान?

शरद पूर्णिमा पर सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा करना, जरूरतमंदों को दान देना और घर में दीपक जलाना शुभ माना जाता है। शाम को चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य देने और मां लक्ष्मी की आराधना करने की परंपरा भी प्रचलित है। रात में खीर तैयार कर उसे स्वच्छ बर्तन में चांदनी के नीचे रखा जा सकता है। खुले स्थान पर रखने पर खीर को धूल, कीड़ों और अन्य दूषित पदार्थों से बचाने के लिए साफ जाली या ढक्कन का इस्तेमाल करना उचित है।

इस दिन कुछ श्रद्धालु व्रत रखते हैं, जबकि कई लोग फलाहार या सामान्य भोजन के साथ पूजा करते हैं। व्रत रखने की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी वाले लोगों को अपनी क्षमता के अनुसार ही उपवास करना चाहिए।

शरद पूर्णिमा: आस्था, चांदनी और परिवार का पर्व

शरद पूर्णिमा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यह बदलते मौसम, चंद्रमा की सुंदरता और परिवार के साथ धार्मिक परंपराएं निभाने का अवसर भी है। रात की चांदनी में खीर रखने, दीपक जलाने और भजन-कीर्तन करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।

धार्मिक विश्वासों के अनुसार, इस पर्व पर मां लक्ष्मी की पूजा से धन-संपदा, सुख और शांति की कामना की जाती है। वहीं, चंद्रमा की शीतल रोशनी मन को सुकून देने वाला प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करती है। श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार पूजा और दान-पुण्य करते हुए इस पर्व को मनाते हैं।

Nishkarsh Bharat

राजकुमार सिंह की रिपोर्ट