बिहटा थाने में किसका चलता है राज? चौकीदार राहुल कुमार और पत्रकार अविनाश तिवारी की पैरवी के आगे नियम-कानून बौने क्यों?

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बिहटा थाने में कथित पैरवी का खेल? राहुल कुमार और अविनाश तिवारी की भूमिका पर उठे सवाल!

  • बिहार पुलिस मुख्यालय और शिक्षा विभाग के सख्त आदेशों के बीच बिहटा थाने की कार्यशैली पर गंभीर सवाल, आखिर किसकी शह पर थाने में बाहरी लोगों का इतना दखल होने की चर्चा है?

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। बिहार में सरकारी संस्थानों की व्यवस्था सुधारने और अनुशासन कायम करने के लिए लगातार नए निर्देश जारी किए जा रहे हैं। बिहार पुलिस मुख्यालय की ओर से थानों में पुलिस पदाधिकारियों के साथ बाहरी लोगों की तस्वीरें खिंचवाने और सार्वजनिक मंच पर ऐसी नजदीकियां प्रदर्शित करने को लेकर सख्ती की बात सामने आई है। वहीं, शिक्षा विभाग ने भी सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति वीडियो बनाने, सोशल मीडिया पर सामग्री साझा करने और बाहरी लोगों के अनधिकृत प्रवेश पर रोक लगाने का निर्देश जारी किया है।

इन आदेशों का मकसद साफ है—सरकारी संस्थानों को निजी प्रभाव, अनावश्यक हस्तक्षेप और दिखावे की राजनीति से मुक्त रखना। लेकिन सवाल यह है कि जब बिहार सरकार नियम-कानून को लेकर इतनी गंभीर है, तो क्या ये नियम सभी जगह समान रूप से लागू हो रहे हैं? क्या पुलिस मुख्यालय के निर्देशों की पहुंच बिहटा थाने तक भी है या वहां व्यवस्था का कोई अलग ही संविधान चलता है?

पटना जिले के बिहटा थाने को लेकर स्थानीय स्तर पर कुछ ऐसे सवाल उठ रहे हैं, जिनका जवाब पुलिस प्रशासन को देना चाहिए। इन सवालों के केंद्र में स्थानीय पत्रकार अविनाश तिवारी और थाने के चौकीदार राहुल कुमार के नाम की चर्चा है।

बिहटा थाने में आखिर किसकी चलती है?

स्थानीय लोगों के बीच चर्चा है कि बिहटा थाने में किसी छोटे से छोटे काम से लेकर बड़े मामले तक पैरवी और सिफारिश की जरूरत पड़ने पर कुछ खास लोगों का नाम सामने आता है। इन्हीं चर्चाओं में चौकीदार राहुल कुमार और स्थानीय पत्रकार अविनाश तिवारी का नाम भी लिया जा रहा है।

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दावा किया जाता है कि थाने में पुलिस अधिकारियों तक पहुंच बनाने, उनसे मुलाकात कराने और किसी मामले में अपनी बात रखवाने के लिए इन लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इन चर्चाओं के पीछे सच्चाई क्या है?

अगर इनका कोई आधिकारिक दायित्व है, तो पुलिस प्रशासन उसे सार्वजनिक क्यों नहीं करता? और अगर कोई आधिकारिक जिम्मेदारी नहीं है, तो फिर थाने के कामकाज में इनकी कथित सक्रियता को लेकर बार-बार सवाल क्यों उठ रहे हैं?

थाना किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं है। यहां फरियादी न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचता है, न कि किसी कथित मध्यस्थ के दरवाजे पर दस्तक देने के लिए।

चौकीदार राहुल कुमार: जिम्मेदारी क्या और प्रभाव कितना?

इस पूरे प्रकरण में चौकीदार राहुल कुमार को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। चौकीदार की जिम्मेदारी पुलिस व्यवस्था में सहयोग करना और अपने निर्धारित दायित्वों का निर्वहन करना है। लेकिन यदि किसी चौकीदार को लेकर यह धारणा बन रही है कि थाने में काम कराने के लिए उसकी सहमति या पैरवी जरूरी है, तो यह सामान्य बात नहीं है।

आखिर एक चौकीदार की भूमिका इतनी प्रभावशाली कैसे दिखाई देने लगी कि आम लोगों के बीच उसके नाम को लेकर इस तरह की चर्चाएं होने लगीं?

क्या राहुल कुमार अपनी निर्धारित जिम्मेदारियों तक सीमित हैं? क्या थाने में आने वाले फरियादियों के मामलों में उनकी कोई अतिरिक्त भूमिका है? क्या पुलिस अधिकारियों को इस बात की जानकारी है कि स्थानीय स्तर पर उनके प्रभाव को लेकर कैसी चर्चाएं चल रही हैं?

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इन सवालों का जवाब किसी व्यक्तिगत टिप्पणी से नहीं, बल्कि निष्पक्ष प्रशासनिक जांच से मिलना चाहिए।

पत्रकार अविनाश तिवारी की थाने में इतनी नजदीकी क्यों?

दूसरा नाम स्थानीय पत्रकार अविनाश तिवारी का है। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। पत्रकार का काम जनता की समस्याओं को सामने लाना, प्रशासन से सवाल पूछना और व्यवस्था की कमियों को उजागर करना है। लेकिन पत्रकारिता और पुलिस प्रशासन के बीच पेशेवर संबंधों की एक स्पष्ट सीमा भी होनी चाहिए।

यदि किसी पत्रकार की पुलिस अधिकारियों से मुलाकात होती है, तो इसमें अपने आप में कोई आपत्ति नहीं है। खबरों के लिए अधिकारियों से बातचीत करना पत्रकारिता का हिस्सा है। लेकिन जब किसी पत्रकार को लेकर यह चर्चा होने लगे कि वह थाना परिसर में प्रभावशाली पहुंच रखता है, अधिकारियों से मुलाकात कराने या पैरवी करवाने में उसकी भूमिका बताई जाती है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है।

क्या अविनाश तिवारी की थाने में आवाजाही किसी आधिकारिक पत्रकारिता संबंधी आवश्यकता के तहत है? क्या उन्हें कोई विशेष अनुमति प्राप्त है? यदि नहीं, तो उनके लिए भी वही नियम लागू होने चाहिए जो किसी दूसरे नागरिक और पत्रकार के लिए निर्धारित हैं।

पत्रकारिता का परिचय प्रेस की स्वतंत्रता से होना चाहिए, न कि किसी थाने में कथित पहुंच और प्रभाव से। आखिर खबर लिखने वाला व्यक्ति अगर खुद ही पुलिस व्यवस्था में कथित प्रभाव का केंद्र बन जाए, तो जनता पुलिस से सवाल पूछे या उस कथित प्रभावशाली व्यक्ति से?

आदेश सरकार का, लेकिन बिहटा में नियम किसके?

बिहार पुलिस मुख्यालय का निर्देश हो या शिक्षा विभाग का आदेश, इनका उद्देश्य सरकारी संस्थानों की गरिमा और पारदर्शिता बनाए रखना है। स्कूलों में बिना अनुमति वीडियो बनाने पर रोक लगाई जा रही है, तो थानों में भी बाहरी हस्तक्षेप और अनधिकृत आवाजाही पर नियंत्रण जरूरी है।

डीजीपी विनय कुमार की ओर से भी थाना परिसरों में अनावश्यक रूप से आने-जाने वाले लोगों पर कार्रवाई की बात कही जा चुकी है। ऐसे में बिहटा थाने को लेकर उठ रहे सवालों की गंभीरता और बढ़ जाती है।

जब सरकार थानों में अनावश्यक आवाजाही रोकने की बात कर रही है, तब यह जानना जरूरी है कि बिहटा थाने में प्रवेश और मुलाकात के लिए क्या कोई स्पष्ट व्यवस्था लागू है? क्या सभी लोगों के लिए एक जैसे नियम हैं या कुछ लोगों को विशेष छूट मिलती है?

अगर नियम सबके लिए हैं, तो उनका पालन भी सबको करना होगा। पुलिस की वर्दी किसी व्यक्ति की निजी पहचान या प्रभाव के आगे झुकने के लिए नहीं है।

पुलिस मुख्यालय जवाब दे: आखिर सच्चाई क्या है?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल अविनाश तिवारी या राहुल कुमार के नाम से कहीं अधिक बिहटा थाने की कार्यप्रणाली को लेकर है। पुलिस प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि थाने में बाहरी लोगों की आवाजाही के क्या नियम हैं? क्या किसी गैर-पुलिसकर्मी को अधिकारियों तक पहुंच बनाने या फरियादियों के मामलों में मध्यस्थता करने की कोई अधिकृत जिम्मेदारी दी गई है?

यदि स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोप और चर्चाएं निराधार हैं, तो पुलिस प्रशासन को तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। और यदि किसी स्तर पर नियमों के विरुद्ध बाहरी हस्तक्षेप पाया जाता है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

वर्दी की ताकत बड़ी या कथित पैरवी का प्रभाव?

बिहार में पुलिस सुधार की बात केवल आदेश जारी करने से पूरी नहीं होगी। उसका असली परीक्षण थानों के भीतर होगा। थाने में आने वाला गरीब फरियादी किसी चौकीदार, पत्रकार या कथित मध्यस्थ की सिफारिश का मोहताज नहीं होना चाहिए। उसे सीधे अपनी शिकायत रखने और कानून के अनुसार कार्रवाई पाने का अधिकार है।

अविनाश तिवारी और राहुल कुमार को लेकर उठ रहे सवालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी को बिना प्रमाण दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन सवालों को अनदेखा करना भी पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी से बचने जैसा होगा।

आखिर बिहटा थाने में व्यवस्था पुलिस कानून से चलेगी या स्थानीय स्तर पर चर्चित कथित प्रभावशाली चेहरों के हिसाब से? अगर पुलिस मुख्यालय के आदेशों के बावजूद ऐसी चर्चाएं बनी हुई हैं, तो यह केवल एक थाने का सवाल नहीं, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र की जवाबदेही का सवाल है।

क्योंकि थाने की पहचान उसकी वर्दी, कानून और निष्पक्ष कार्रवाई से होनी चाहिए, न कि इस बात से कि वहां किसकी पैरवी चलती है और किसके बिना काम नहीं होता!

Nishkarsh Bharat

पटना से संवाददाता की रिपोर्ट

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