हरीश राणा केस के बाद फिर चर्चा में ‘पैसिव यूथेनेशिया’, जानिए अरुणा शानबाग केस से कैसे बदला भारत का कानून

पैसिव यूथेनेशिया

देश में एक बार फिर ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी इच्छामृत्यु को लेकर बहस तेज हो गई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से अधिक समय से कोमा में पड़े हरीश राणा को लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटाने की अनुमति दी है।

नई दिल्ली: देश में एक बार फिर ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी इच्छामृत्यु को लेकर बहस तेज हो गई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से अधिक समय से कोमा में पड़े हरीश राणा को लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटाने की अनुमति दी है। इस फैसले के बाद भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी पहलुओं और पुराने मामलों पर फिर चर्चा शुरू हो गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के कानूनी इतिहास में इच्छामृत्यु से जुड़ा सबसे बड़ा और पहला मामला Aruna Ramchandra Shanbaug v. Union of India (2011) था, जिसने ‘पैसिव यूथेनेशिया’ को लेकर देश में नई कानूनी बहस की शुरुआत की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को दी अनुमति

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें Justice J. B. Pardiwala और Justice K. V. Viswanathan शामिल थे, ने लंबे समय से कोमा में पड़े हरीश राणा के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

पीठ ने डॉक्टरों और परिवार की राय को ध्यान में रखते हुए उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटाने की अनुमति दी। इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार से ‘पैसिव यूथेनेशिया’ पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सिफारिश की।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने All India Institute of Medical Sciences (AIIMS), नई दिल्ली को निर्देश दिया कि वह लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया को लेकर एक विस्तृत और मानक योजना तैयार करे।

क्या है पैसिव यूथेनेशिया?

पैसिव यूथेनेशिया का मतलब है किसी गंभीर और असाध्य बीमारी से पीड़ित मरीज को कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरणों से हटाकर प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति देना। इसमें मरीज को सीधे मौत देने के लिए दवा नहीं दी जाती, बल्कि केवल जीवन को कृत्रिम रूप से बढ़ाने वाले साधनों को हटा दिया जाता है।

यह विषय नैतिक, कानूनी और चिकित्सकीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। इसलिए भारत में इसके लिए अदालतों और चिकित्सा विशेषज्ञों की सहमति आवश्यक होती है।

अरुणा शानबाग केस से शुरू हुई बहस

भारत में पैसिव यूथेनेशिया को लेकर सबसे चर्चित मामला Aruna Ramchandra Shanbaug का था। अरुणा मुंबई के King Edward Memorial Hospital में नर्स के रूप में काम करती थीं।

साल 1973 में अस्पताल के एक वॉर्ड बॉय Sohanlal Bharta Walmiki ने उनके साथ क्रूर हमला और दुष्कर्म किया था। हमले के दौरान गला दबाए जाने से उनके मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंची और वह कोमा में चली गईं।

इस घटना के बाद अरुणा लगभग 42 वर्षों तक कोमा की स्थिति में रहीं। उनकी हालत को देखते हुए 2009 में उनके लिए इच्छामृत्यु की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया। अदालत ने इच्छामृत्यु की मांग को स्वीकार नहीं किया, लेकिन पहली बार भारत में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी।

अदालत ने कहा कि यदि डॉक्टरों और परिवार को लगता है कि मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, तो अदालत की अनुमति से लाइफ सपोर्ट हटाया जा सकता है।

इस फैसले ने भारत में इच्छामृत्यु को लेकर कानूनी और नैतिक बहस की नई दिशा तय की।

अरुणा शानबाग की मृत्यु

हालांकि अदालत ने अरुणा को इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन वर्षों तक कोमा में रहने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ती चली गई।

2015 में उन्हें निमोनिया हो गया और इलाज के दौरान 18 मई 2015 को 68 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु ने पूरे देश को झकझोर दिया और इच्छामृत्यु के मुद्दे पर फिर से बहस तेज हो गई।

दुनिया में इच्छामृत्यु का कानून

दुनिया के कई देशों में इच्छामृत्यु या चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु को लेकर अलग-अलग कानून हैं।

  • Netherlands: वर्ष 2001 में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश बना।
  • Canada: 2016 में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAID) कानून लागू किया गया।
  • United States: पूरे देश में यह वैध नहीं है, लेकिन कुछ राज्यों में चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु की अनुमति दी गई है।

भारत में आगे क्या?

हरीश राणा केस के बाद अब भारत में इच्छामृत्यु के लिए स्पष्ट कानून बनाने की मांग तेज हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार को कानून बनाने की सलाह देने के बाद उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में इस विषय पर व्यापक नीति बनाई जा सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि चिकित्सा विज्ञान के विकास और गंभीर बीमारियों के मामलों को देखते हुए इच्छामृत्यु पर स्पष्ट और मानवीय कानून बनाना समय की जरूरत है।

फिलहाल हरीश राणा का मामला देश में इच्छामृत्यु की बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर ले आया है।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

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